सब है मन का खेल

आप, मैं और हम सभी कुछ न कुछ काम तो करते ही हैं। हम सभी जितने भी काम करते हैं, उन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है। पहले भाग में वे काम आते हैं, जो हमारे मन मुताबिक़ हैं। वे लोग सचमुच बेहद ख़ुशकिस्मत होते हैं जिन्हें ज़िंदगी में वही काम करने को मिल जाता है, जो वे करना चाहते हैं। ऐसा में इसलिए नहीं कह रहा हूँ क्योंकि इसके कारण वे उस काम को अच्छी तरह से कर सकते हैं। बल्कि इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ऐसा करके वे उस काम को करने का सच्चा आनंद भी पा सकते हैं। मुझे तो यही लगता है कि किसी भी काम को करने का सच्चा पुरस्कार उस काम को करने से मिलने वाला आनंद ही होता है। क्या आपको नहीं लगता कि यदि आप सचमुच में अपनी ही पसंद का काम कर रहे हैं तो आप काम कर ही नहीं रहे हैं, क्योंकि आपको इस बात का आभास ही नहीं हो रहा है कि आप अलग से कुछ कर रहे हैं।

दूसरे भाग में वे अधिकांश लोग आते है, जिन्हें ईशवर ने उनकी पंसद का काम न सौंपकर दूसरों की पसंद का काम सौंप दिया है और वे लोग तो सचमुच बहुत दुर्भाग्यशाली हैं जिन्हें वे काम करने पड़ रहे है, जिन्हें वे नापसंद करते हैं। यहाँ मैं दुर्भाग्यशाली होने की बात इसलिए नहीं कह रहा हूँ क्योंकि वह काम छोटा या बड़ा है और यदि नापसंद है, तो बड़ा काम भी छोटा हो जाता है। यहाँ दुर्भाग्यशाली इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि ऐसे में यह काम बोझ बन जाता है। हमारा अपना शरीर भारी है। लेकिन यह हमें भारी नहीं लगता। जबकि हाथ में उठाया हुआ पाँच किलो गेहूँ का थैला भारी लगने लगता है। हमारे सीने पर हर क्षण तीन सो पौंड के वज़न के बराबर का दबाव पड़ता रहता है। इसके बावजूद हमारी साँसों के साथ बड़े ही आराम से हमारा सीना फूलता और पिचकता रहता है। यदि इसी सीने पर पाँच किलो का बाँट रख दिया जाए, तो वह हमारे लिए मुसीबत का सबब बन जाएगा।

मित्रो, यह सारा  का सारा खेल मन का है। जहाँ मन लगता है, वहाँ सारी चीज़ें आसान हो जाती हैं- फिर चाहे वे कितनी भी कठिन और जटिल क्यों न हों। बच्चा खेल रहा है- धूप में भी, पानी में भी और ठंड में भी। वह खेलने में भी मगन है। उसे मौसम का एहसास ही नहीं है, क्योंकि उसका मन खेलने में रमा हुआ है। जबकि दुसरी और बिस्तर पर रजाई के अंदर घुसी हुई उसकी माँ कुड़कुड़ाते हुए पाँच मिनट में तीन बार मौसम को कोस रही है, क्योंकि उसका मन रसोईघर में है।

मन ‘कनवर्टर’ होता है। बाहर की चीज़ों को अंदर किस रूप में भेजा जाए, यह काम हमारा यह मन ही करता है। इसलिए किसी भी काम में कोई किस सीमा तक सफल हो पाएगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस काम के साथ उसके मन का तालमेल कितना बैठ पा रहा है। जितना अधिक तालमेल, उतनी अधिक सफलता। जितनी अधिक इस तालमेल से दूरी, मंज़िल उतनी ही अधिक दूर।

मैं यह कोई नई बात नहीं कह रहा हूँ। आपने ख़ुद ही अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में यह महसूस किया होगा कि जब आप अपनी पसंद का काम करने लगते हैं, तब वह काम आपके लिए काम न होकर प्रकारांतर से आराम ही बन जाता है। एक घंटे तक लगातार काम न कर पाने वालों को मैंने चार घंटे बैठकर वन-डे क्रिकेट देखते हुए देखा है। इन चार घंटों के दौरान इन्हें ज़रा-सा भी व्यवधान बर्दाश्त  नहीं होता। जबकि ऑफ़िस के एक घंटे के काम के दौरान वे चाय या कुछ इसी तरह के बहानों का सहारा लेकर दो-तीन बार ख़ुद ही व्यवधान डाल लेते हैं। इसीलिए मैं कहता हूँ कि आप अपनी पसंद का काम चुन लीजिए, आपको जिंद़गी भर काम नहीं करना पड़ेगा।

मैं नहीं जानता कि आप जीवन की सफलता किसे मानते हैं- सालाना पैकेज को, जीवन की अंतिम साँस के समय तक जमा की गई संपत्ति को, पुरस्कार और सम्मान को या और भी कुछ इसी तरह की बाहरी वस्तुओं को। मैंने अमेरिका से आए हुए एक अविवाहित भारतीय नौजवान से जब सुख की परिभाषा जाननी चाही, तो चैबीस साल के इस स्मार्ट नौजवान ने मुझे यह उत्तर देकर चैंका दिया कि ‘‘अपनी पसंद का काम करने को मिल जाए, यही सुख है।’’ जब काम के साथ मन का तालमेल हो जाता है, तो यह तालमेल न केवल काम के बोझ को ही हल्का करता है बल्कि हमारे अंदर सोई हुई ऊर्जा को भी जगाता है, धीरे-धीरे सुलग रही आग को धधकाता है और राह में जो भी छोटी-बड़ी बाधाएँ होती हैं, उन्हें हटता है। इसलिए जब कोई प्रसन्न होता है, तो आप मानकर चलिए कि वह अपनी संपूर्ण ऊर्जा के साथ (शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्तर पर) कुछ भी कर गुज़रने के लिए तैयार रहता है। सच पूछिए तो ऐसे क्षणों की ऊर्जा प्रेम के एहसास के दौरान उत्पन्न होने वाली ऊर्जा से भी कई गुना अधिक होती है। प्रेम के दौरान भावनात्मक और आत्मिक ऊर्जा पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाती, इसलिए मानस से जुड़ी हुई देह भी थोड़ी कमज़ोर पड़ जाती है।

निश्चित रूप से प्रसन्नता का भाव इश्वर के द्वारा दिया गया एक अनुपम वरदार है और जब आप प्रसन्नता का अनुभव कर रहे होते हैं, उन शुभ क्षणों में इश्वर आपके साथ होता है। प्रसन्न मन में इश्वर का वास होता है। यह इश्वर के द्वारा प्रदत्त विलक्षण अवसर भी होता है। इस विलक्षण अवसर में कुछ भी विलक्षण कर गुज़रने के बीज छिपे होते हैं। जो प्रसन्नता के इन विलक्षण अवसरों को जितना लंबा निभा लेता है, वह अपनी ज़िंदगी में उतने ही अनोखे काम कर जाता है।

तो यहाँ सवाल यह है कि क्या हनुमान जी के साथ कुछ था? दुनिया में जितने भी नायक और महानायक देख लें, चाहे वे सच में हुए हों या सिर्फ़ कहानियों में, एक भी ऐसा नहीं मिलेगा जिसने अपनी पूरी जिंद़गी में असफलता का मुहँ नहीं देखा हो। सच तो यही है कि जो जितनी बड़ी असफलता के बाद सफलता पाता है, वह उतना ही बड़ा नायक माना जाता है। हनुमान जी ही दुनिया के एकमात्र ऐसे नायक हैं, जिन्होंने जिंद़गी में कभी भी असफलता का मुँह नहीं देखा। ऐसा नहीं है कि उनके सामने संकट नहीं आए थे। संकट आए और लगभग हर काम करते वक्त आए। कुछ अपने आप आए, तो कुछ दूसरों ने जानबूझकर खड़े किए। लेकिन इनमें से कोई भी संकट हनुमान जी को आगे बढ़ने से रोक नहीं सका। इसीलिए तो भारतीय कथाओं में वही एकमात्र ऐसे नायक हैं, जिन्हें संकटमोचक कहा गया है। यहाँ तक कि भगवान श्रीराम के भी संकटमोचक वे ही रहे हैं। क्या ऐसा नहीं है?

मुझे उनकी इस अद्भुत सफलता के केंद्र में उनके मन की ही सबसे बड़ी भूमिका जान पड़ती है। उनका अपना मनोविज्ञान दुनिया के सारे प्राणियों और मानवों से भिन्न क़िस्म का मनोविज्ञान है। इस भिन्न मनोविज्ञान की पहचान हम ‘रामचरितमानस’ में एक-दो नहीं, बल्कि लगभग हर जगह कर सकते हैं। में यहाँ उनके इस विलक्षण मनोविज्ञान के तीन महत्वपूर्ण भावों की चर्चा करना चाहूँगा। ये तीन मनोभाव हैं- प्रसन्न मन, कार्य के प्रति श्रद्धा तथा भावनात्मक-बौद्धिकता।

पुस्तक सदा सफल हनुमान से
साभार
डाॅ. विजय अग्रवाल

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