अब आर नहीं, पार करो (भाग-5)

एक धक्का और दो – नापाक मुल्क को तोड़ दो

पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से निपटने के लिए भारत की सरकार ने अनेक सख्त कदम उठाए हैं। पाकिस्तान को दिए गए ‘सर्वाधिक तरजीही देश’ का दर्जा वापस लेना, सेना को सैन्य कार्यवाही के लिए खुली छूट, पाकिस्तान के साथ राजनयिक सम्बन्धों को सीमित करना, अलगाववादी सरगनाओं से सरकारी सुरक्षा तथा सुविधाएं वापस लेना, मात्र 100 घंटों में पुलवामा हमले के गुनाहगार गाजी को मार गिराना, पाकिस्तान को दान में दिए जा रहे भारत की नदियों के पानी को रोकना और विश्व के प्रायः सभी राष्ट्रों से समर्थन जुटा लेना इत्यादि ऐसे ठोस कदम हैं जिससे पाकिस्तान के परखच्चे उड़ने शुरु हो गए हैं।

साहस, शौर्य और हिम्मत के धनी श्री नरेन्द्र मोदी भारत के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने आतंकवाद को समाप्त करने के ज्वलंत विषय पर भारत के समर्थन में विश्व जनमत जुटा लेने में सफलता प्राप्त कर ली है। अब सवा सौ करोड़ (कुछ गद्दारों को छोड़कर) भारतवासियों की पुरजोर मांग है कि मोदी जी —- धारा 370 को हटाओ, पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करो और इस नापाक मुल्क को नेस्तनाबूद करने के लिए एक अंतिम धक्का और दे दो। सारा देश (कुछ राजनीतिक कुबुद्धियों को छोड़कर) आपके साथ खड़ा है।

पाकिस्तान के साथ अब दो-दो हाथ करने से परहेज करने की कोई जरूरत नहीं है। परन्तु यह आमने सामने की जंग अब निर्णायक होनी चाहिए। पाकिस्तान के घुटने टिकवाने नहीं, उसके घुटने तोड़ने होंगे। यहां पर यह याद दिलाना भी जरूरी है कि पाकिस्तान के साथ हुए अब तक के चार युद्धों में भारत की सेनाएं विजयी रहीं हैं वजवानों ने अपने बलिदान देकर पाकिस्तान के छक्के छुड़वाने में कोई कसर नहीं छोड़ी परन्तु युद्ध के बाद वार्ता की मेज पर हमने इस विजय को पराजय में बदल कर दुश्मन पाकिस्तान को प्राणदान दे दिया।

1948 के युद्ध में मोर्चे पर आगे बढ़ते हुए हमारे जवानों के कदमों में यू.एन.ओ. की बेड़ियां डाल दी गईं। एक तरफा युद्ध विराम करके हमने कश्मीर के एक हिस्से को पाकिस्तान को सौंप दिया। अगर उस समय एक धक्का और लग जाता तो पाकिस्तान की कमर ही टूट जाती। नतीजा सबके सामने है।  हम 70 साल बाद भी अपने उस कश्मीर को पाकिस्तान के कब्जे से छुड़ा नहीं सके।

1965 के भारत-पाक युद्ध में हमारी फौजें अंतर्राष्ट्रीय सीमा और युद्ध विराम रेखा को पार करके पाकिस्तान के सीने पर चढ़ गई थीं। हमने फिर समझौते की मेज पर बैठकर भारतीय जवानों द्वारा अपना खून बहाकर विजित किए क्षेत्रों को पाकिस्तान के हवाले कर दिया। अगर उस समय युद्ध विराम न करके एक धक्का और मार देते तो पाकिस्तान के प्राण निकल जाते। हम यहां भी चूक गए।

1971 के भारत-पाक युद्ध में हमारे बहादुर सैनिकों ने पूर्वी पाकिस्तान को आजाद करवा कर पाकिस्तान के दो टुकड़े तो कर दिए परन्तु बाद में क्या हुआ? पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मियां भुट्टो जब शिमला में भारत के आगे गिड़गिड़ाने आए तो हमने भारतीय सेना द्वारा बंदी बनाए गए पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों को वापस करने के साथ अपने द्वारा विजित क्षेत्रों को फिर वापस कर दिया। इस बार भी यदि एक धक्का और लगा देते तो आज पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद हमें चुनौती न दे रहा होता।

1999 के कारगिल युद्ध के समय हमारे वीर सैनिकों ने विकट परिस्थितियों में भी ऊंची पहाड़ियों पर मोर्चों में तैनात पाकिस्तान के सभी घुसपैठियों (फौजियों) को मार गिराया था। अगर उस समय भी हम एक धक्का और देकर कृत्रिम नियंत्रण रेखा को पार करके पाकिस्तान के गले तक पहुंच जाते तो उस नापाक देश की तबाही तय थी। हमने वहां भी भयंकर चूक कर डाली।

पाकिस्तान के साथ हुए पहले युद्ध में कश्मीर के जिस हिस्से को हमने अपनी भूलों के कारण गंवा दिया था, उस कश्मीर को हम आगे के तीन युद्धों में मुक्त क्यों नहीं करवा सके? इसका एक ही उत्तर है कि हमारे सामने युद्ध का कोई उद्देश्य नहीं था। हम केवल रक्षात्मक रणनीति के तहत अपनी सैनिक कार्यवाही करते रहे। पाकिस्तान ने यह सभी युद्ध हमारे कश्मीर पर कब्जा करने के उद्देश्य से किए, परन्तु हम विजयी होकर भी पाक अधिकृत कश्मीर को वापस नहीं ले सके।

अब फिर नापाक पड़ोसी देश को तोड़ने का समय आ पहुंचा है। समस्त भारतवासी उम्मीद करते हैं कि इस बार हमारी सरकार हमारे वीर सैनिकों की बहादुरी को समझौते की मेज पर बैठकर कलम के एक ही झोंके से साफ नहीं कर देगी। इस बार की जंग चाहे वह किसी भी रूप में हो (छोटी या बड़ी) निर्णायक होनी चाहिए।

-क्रमशः जारी

 नरेन्द्र सहगल

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