कश्मीर : अतीत से आज तक – अंतिम भाग

भावी स्वर्णिम कश्मीर

पाकिस्तान प्रेरित मजहबी आतंकवाद को जन्म और संरक्षण देकर कश्मीर को भारत की मुख्य राष्ट्रीय धारा से काटने वाली अलगाववादी व्यवस्था समाप्त हो गई है. भारतीय सविधान के अस्थाई अनुच्छेद 370 और कश्मीर के कुछ गिने-चुने परिवारों की राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक रोजी-रोटी सुरक्षित रखने का बंदोबस्त करने वाला अध्यादेश 35ए अब नहीं रहे. जम्मू-कश्मीर के सरकारी और गैर सरकारी भवनों, मंत्रियों, सरकारी अफसरों की गाड़ियों पर अलगाववादी लाल झंडा उतर गया है. भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा शान से लहरा रहा है. कश्मीर अब अपने सनातन गौरवशाली वैभव को प्राप्त करेगा, ऐसा विश्वास प्रत्येक भारतीय के मन में जाग उठा है.

कश्मीर के गौरवशाली अतीत की संक्षिप्त जानकारी पूर्व के दो लेखों – ‘धर्मरक्षक आध्यात्मिक कश्मीर’ और ‘वीरव्रती दिग्विजयी कश्मीर’ में दी है. इसी तरह इस वैभव की पतनावस्था की जानकारी तीसरे लेख ‘कट्टरपंथी धर्मान्तरित कश्मीर’ नामक लेख में दी गई है. भारत के नंदनवन कश्मीर के वैभव और पतन के बाद अब भविष्य के ‘स्वर्णिम कश्मीर’ का खाका तैयार करने और उसके अमल पर चिंतन करने का समय है.

धार्मिक दहशतगर्दी को सरकारी संरक्षण

उपरोक्त संदर्भ में इस ऐतिहासिक सच्चाई को भी समझना जरूरी है कि अनुच्छेद 370 और अध्यादेश 35ए ने केवल मात्र पिछले 70 वर्षों से पनप रही पाकिस्तान प्रेरित दहशतगर्दी को ही संरक्षण नहीं दिया हुआ था, बल्कि पिछले सात सौ वर्षों से हो रहे हिन्दू उत्पीड़न को भी वैधानिक संरक्षण दे रखा था. कश्मीर की धरती पर खून की नदियां बहाने वाला वर्तमान आतंकवाद तो उस हिन्दू विरोधी एवं भारत विरोधी जेहादी मानसिकता का दुष्परिणाम है, जिसकी शुरुआत विधर्मी तथा विदेशी हमलावरों ने सन् 1339 में ही कर दी थी. कश्मीर का बलात् इस्लामीकरण और आतंकवाद एक ही सिक्के के दो छोर हैं. यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे सब जानते हैं, परंतु बोलता/लिखता कोई नहीं.

उल्लेखनीय है कि कश्मीर में व्याप्त आतंकी अलगाववाद को सहारा देने वाले पाकिस्तान का अस्तित्व भी इसी भारत एवं  हिन्दू विरोधी जेहादी मानसिकता पर टिका हुआ है. इसी आधार पर ‘आजाद कश्मीर’ और ‘निजामे मुस्तफा की हुकूमत’ के ख्वाब देखे जा रहे थे. ध्यान देने की बात है कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने इसी भारत विरोधी मजहबी कट्टरपन के आगे घुटने टेक कर अनुच्छेद 370 एवं अध्यादेश 35ए  की संवैधानिक व्यवस्था करते हुए मजहबी जेहाद को सुरक्षा कवच प्रदान कर दिया था. दुर्भाग्य से इस मजहबी जेहाद को ही कश्मीरियत आधारित संघर्ष मान लिया गया.

विदेशी बनाम स्वदेशी कश्मीरियत

जिस कश्मीरियत की दुहाई देकर पाकिस्तान और उसके कश्मीरी एजेंट खूनी जिहाद कर रहे हैं, उस कश्मीरियत का रचनाकार कोई कश्मीरी नहीं था और ना ही इस कश्मीरियत का विकास कश्मीर की धरती पर ही हुआ. यह जेहादी कश्मीरियत तो कश्मीर पर हमला करने वाले विदेशी आक्रान्ताओं के साथ आई दहशतगर्द तहजीब है. यह कश्मीरियत मात्र सात सौ साल पुरानी है, जिसका कश्मीर की अपनी विरासत से कुछ भी लेना देना नहीं है.

इस जेहादी कश्मीरियत के विदेशी मालिकों और अपना धर्म छोड़कर हमलावरों के तलुए चाटने वाले स्थानीय कश्मीरियों ने सर्वधर्म समभाव पर आधारित सनातन कश्मीरियत को तहस-नहस कर दिया. अपने धर्म और धरती पर अडिग रहने वाले कश्मीरी पंडितों को जोर जबरदस्ती से खदेड़ दिया गया. ऐसे लगभग पांच लाख कश्मीर हिन्दुओं को जब तक अपने घरों में सम्मान एवं सुरक्षा के साथ बसाया नहीं जाता, तब तक ‘भावी स्वर्णिम कश्मीर’ का उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता.

कश्मीरी बहुसंख्यक समाज अर्थात् धर्मान्तरित कश्मीरियों को आगे आकर अपने इन पंडित भाइयों (असली कश्मीरियों) की सुरक्षा की गारंटी लेनी चाहिए. समय करवट ले रहा है. एक दिन ऐसा जरूर आएगा, जब हमारे इन धर्मान्तरित कश्मीरी भाइयों को अपने बाप-दादाओं की विरासत का भान होगा और वे पंडित भाइयों को गले लगाकर अपनी वास्तविक कश्मीरियत की ओर लौट आएंगे. यह बदलाव कश्मीर, कश्मीरियत और भारत/भारतीयता के ‘स्वर्णिम भविष्य’ के लिए अतिआवश्यक समायोचित कार्य होगा. कश्मीर के ‘स्वर्णिम भविष्य’ के लिए यह भी आवश्यक होगा कि विदेशी/विधर्मी आक्रान्ताओं द्वारा तोड़ दिए गए विशाल मंदिरों, मठों और शिक्षा केंद्रों के खंडहरों को पुन: उनके पुराने वैभव में बदला जाए.

धर्मान्तरित हिन्दुओं (वर्तमान मुसलमानों) का यह कर्तव्य बनता है कि वे इस कार्य के लिए आगे आकर अपने अतीत की रक्षा करें. हमारे धर्मान्तरित हिन्दू, सुल्तान सिकंदर बुतशिकन और सूबेदार इफ़्तार खान जैसे जालिम हाकमों की गैरइनसानी विरासत के रक्षक ना बनकर, सम्राट ललितादित्य, अवन्तिवर्मन और शंकरवर्मन की मानवीय संस्कृति के रक्षक बन कर अपने पूर्वजों का आदर सम्मान करें.

समस्त कश्मीरी समाज (हिन्दू एवं मुसलमान) कालिदास, चरक, पाणिनी, पतंजलि, कल्हण, वामनाचार्य, अभिनवगुप्त, आनंदवर्धन जैसे महार्षियों, वेदान्ताचार्यों, वैद्यों, साहित्यकारों और समाज सुधारकों की संतानें हैं. अतः विदेशी/विधर्मी हमलावरों की हिंसक और अभारतीय तहजीब के स्थान पर कश्मीर की धरती पर कश्मीरियों द्वारा विकसित कश्मीरियत के आधार पर ही भविष्य का कश्मीर स्वर्णिम, सुरक्षित और सुखमय हो सकता है. ऐसा वैभवशाली कश्मीर ही पुन: विश्व का प्रेरणा स्थल बनेगा. प्रसन्नता की बात यह है कि यह समझ अब धीरे-धीरे विकसित हो रही है.

लेकर रहेंगे पाक अधिकृत कश्मीर

जब हम भारतीय संस्कृति पर आधारित एक वैभवशाली कश्मीरियत की बात करते हैं तो यह समझना भी जरूरी है कि पाक अधिकृत कश्मीर के बिना कश्मीर और कश्मीरियत अधूरे हैं. भारत के विभाजन के समय महाराजा हरि सिंह ने जिस कश्मीर का पूर्ण विलय भारत में किया था, उसमें वर्तमान पाक अधिकृत कश्मीर, चीन अधिकृत कश्मीर दोनों शामिल थे. कश्मीर के इन भागों को पुन: भारत में शामिल किए बिना हम पूरे कश्मीर की संस्कृति, समाज रचना, भूगोल को सुरक्षित नहीं कर सकते हैं.

उपरोक्त संदर्भ में पड़ोसी पाकिस्तान की मजहबी संकीर्णता, आतंक आधारित विदेश नीति, कश्मीर में उसके सैनिक हस्तक्षेप और इस्लामिक विस्तारवाद पर भी विचार करना चाहिए. “हंस के लिया है पाकिस्तान और लड़कर लेंगे हिन्दुस्तान” की मंशा पालने वाले पाकिस्तान ने इसी पूरे कश्मीर के लिए भारत पर चार बड़े युद्ध थोपे हैं. इसी क्षेत्र को हथियाने के लिए पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन जिबराल्टर’ तथा ‘ऑपरेशन टोपक’ जैसे सैनिक आतंकवाद का संचालन किया है.

परिणाम स्वरुप पिछले तीस वर्षों से कश्मीर में दहशतगर्दी की आग लगी हुई है. लाखों कश्मीरी पंडित अपने घरों से बेघर कर दिए गए हैं. अतः पाकिस्तान पर लगाम कसना भी कश्मीर के सुरक्षित भविष्य के लिए आवश्यक है. वर्तमान सरकार के कदम इस ओर बढ़ रहे हैं. लगता है कि बहुत शीघ्र ही यह काम भी एक ही झटके में संपन्न हो जाएगा. रक्षामंत्री महोदय ने तो यहां तक कह दिया है कि पाकिस्तान के साथ अब बात पी.ओ.के पर ही होगी. जब पाकिस्तान और चीन अधिकृत क्षेत्र पुन: भारत के कब्जे में लौटेंगे तो संसार के अनेक देशों के साथ भारत का सीधा संपर्क स्थापित हो जाएगा. व्यापारिक आदान-प्रदान का रास्ता सुगम और सुरक्षित होगा. यह क्षेत्र सैनिक रणनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है. इस क्षेत्र के जंगल, पहाड़, झीलें, नदियां और खनिज पदार्थ भी पूरे भारत की समृद्धि के लिए अत्यंत लाभ वाले होंगे. भारत का जमीनी मार्ग भी रूस, अफगानिस्तान, सीरिया, मंगोलिया और चीन जैसे देशों  से सीधा जुड़ जाएगा.

भेदभाव के शिकार थे जम्मू और लद्दाख

जब तक जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 और अध्यादेश 35ए की तलवार लटकी रही, तब तक जम्मू और लद्दाख के साथ राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक भेदभाव होता रहा. भेदभाव पूर्ण आर्थिक, शैक्षणिक, वैधानिक नीतियों ने इन दोनों क्षेत्रों में विकास की गति को रोके रखा. कश्मीर केंद्र सरकारी तंत्र के शिकंजे में फंसे हुए इन दोनों क्षेत्रों के लोग अपने अधिकारों के लिए कराहते रहे. वोट बैंक आधारित राजनीति करने वाले दलों और नेताओं ने अपने अधिकारों से वंचित इन लोगों की कभी परवाह नहीं की. वर्तमान में हुए प्रशासनिक और राजनीतिक परिवर्तन से यह आशा बंधी है कि यह भेदभाव समाप्त हो जाएगा. जम्मू और लद्दाख के लोगों को उनकी जनसंख्या और क्षेत्रफल के हिसाब से सभी प्रकार के अधिकार मिलेंगे. सरकारी नौकरियों, उद्योग धन्धों और जमीन की खरीद-फरोख्त इत्यादि सभी क्षेत्रों में अब न्याय होगा.

अनेक वर्षों से जम्मू कश्मीर में परिसीमिन करवाने की मांग उठ रही थी. प्रदेश की विधानसभा और देश की संसद में सीटों की संख्या में भी जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लोगों से भेदभाव किया जा रहा था. परिसीमिन की कार्रवाई के बाद जम्मू के विधायकों और सांसदों की संख्या में वृद्धि होगी. ‘देश के विभाजन के समय पश्चिमी पंजाब से आए लोगों (हिन्दुओं) को अभी तक मताधिकार नहीं मिला था, जबकि पाकिस्तान और भारत के अन्य प्रदेशों के मुसलमान भाई यहां आकर सरकारी तंत्र की सहायता से प्रदेश का ‘स्टेट सब्जैक्ट’ प्राप्त करके सभी अधिकारों पर कब्जा जमा लेते थे. यह अन्धी व्यवस्था भी अब समाप्त हो जाएगी.

यह ‘स्टेट सब्जैक्ट’ व्यवस्था जम्मू कश्मीर के लोगों को दोहरी नागरिकता प्रदान कर रही थी. इस प्रदेश के लोग भारत के किसी भी प्रदेश में जाकर सभी प्रकार के अधिकारों को प्राप्त कर सकते थे, परंतु भारत के लोग वहां के नागरिक ना होने की वजह से सभी अधिकारों से वंचित थे. जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान था, जिसकी अनुमति के बिना भारत की संसद द्वारा बनाए गए कानून वहां लागू नहीं होते थे. अब भारत का संविधान पूरी तरह लागू हो गया है. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अब केंद्र शासित प्रदेश बना दिए गए हैं. अब ना रहा बांस, ना बजेगी बांसुरी.

समस्त कश्मीरियों सहित पूरे भारतवर्ष के लिए यह हर्ष का ऐतिहासिक विषय है कि वर्तमान सरकार ने अलगाववाद के सुरक्षा कवच को हटाकर कश्मीर के लिए फिर से अपने सनातन वैभव की ओर लौटने के सभी रास्ते खोल दिए हैं. कश्मीर के धन-दौलत पर अब कुछ परिवारों का नहीं, सभी कश्मीरियों का अधिकार होगा. विकास के सभी प्रकल्प प्रारंभ होंगे. मजहबी कट्टरपंथियों द्वारा दिशाभ्रमित किए गए युवा मुख्यधारा में लौटेंगे. इनके हाथों में हथियार नहीं कंप्यूटर दिए जाएंगे.

संसार देखेगा कि बहुत शीघ्र ‘पाकिस्तान जिंदाबाद नहीं’ ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष शेष भारत की तरह कश्मीर के आकाश पर भी गूंजेगा. मजहबी दहशतगर्दी ने जिस कश्मीर को बर्बाद किया है, वहां अब मानवीय सभ्यता आबाद होगी. अलगाववादियों द्वारा नरक बना दिया गया कश्मीर बहुत शीघ्र फिर से धरती का स्वर्ग बन कर सामने आएगा. कश्मीर का सांस्कृतिक और आर्थिक पुनरुत्थान अब मजहबी संकीर्णता नहीं, सहअस्तित्व (सनातन कश्मीरियत) के आधार पर होगा. भारतीयों सहित सारा विश्व कश्मीर पर गर्व करेगा.

नरेन्द्र सहगल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.)

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