कैसे हुई जम्मू कश्मीर में परिसीमन के नाम पर जम्मू और लद्धाख के साथ धोखाधड़ी

जयपुर (विसंकें)। हमारा इतिहास, हमारा वर्तमान तय करता है और वर्तमान भविष्य को गढ़ता है। जम्मू कश्मीर में 1947 के बाद का इतिहास तत्कालीन राजनेताओं द्वारा धोखे और छल से लिखा गया है। राज्य का परिसीमन भी इस छल कपट से अछूता नहीं रहा। इस लेख में हम आपको बताएँगे कि किस प्रकार त्रुटिपूर्ण परिसीमन ने राज्य की राजनीति की दशा और दिशा को ही बदल दिया।

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जम्मू कश्मीर के महाराजा के प्रशासनिक विभाग द्वारा ज़ारी की गयी रिपोर्ट के अनुसार, 16.10.1940 से 15.10.1941 के दौरान की गयी जनगणना के आधार पर राज्य की कुल जनसँख्या 40,21,616 थी, जिसमें जम्मू प्रान्त की जनसँख्या 20,01,557, कश्मीर की 17,28,686 और गिलगित, सीमान्त इलाका स्कर्दू, कारगिल और लद्दाख की जनसँख्या 3,11,915 थी।

जैसा कि सभी जानते हैं, भारत का बड़ा भाग ब्रिटिश सरकार के परोक्ष प्रशासन का हिस्सा था, जब कि रियासतें ब्रिटिश परमसत्ता या परमाउंटसी के अधीन थीं। 1947 को ब्रिटिश इंडिया का विभाजन किया गया, और रियासतों को हिंदुस्तान या पाकिस्तान के साथ अधिमिलन करना था। रियासत के शासक को यह अधिकार था कि वह हिंदुस्तान या पाकिस्तान में से एक को चुनकर उस के पक्ष में अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर ले। जम्मू कश्मीर के शासक महाराजा हरी सिंह ने हिंदुस्तान के पक्ष में अधिमिलन पत्र पर 26 अक्टूबर 1947 को हस्ताक्षर किये और राज्य का भारत में अधिमिलन हो गया।

पाकिस्तान ने सितम्बर 1947 से ही जम्मू कश्मीर पर छुट पुट हमले करना शुरू कर दिया था। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी सेना ने पठान कबाइलियों के साथ मिलकर जम्मू कश्मीर पर धावा बोल दिया। इस आक्रमण के कारण बहुत बड़ी संख्या में हिंदू और सिख समुदाय के लोगों को जान बचाकर वहाँ से भागना पड़ा। युद्ध विराम की घोषणा से यह युद्ध समाप्त हुआ, क्योंकि भारत ने पाकिस्तान द्वारा किये हमले का मामला यू एन में उठाया। जहाँ यूनाइटेड नेशंस की सुरक्षा समिति यानि UNSC में प्रस्ताव पारित कर पाकिस्तान को आक्रांता घोषित किया गया, साथ ही पाकिस्तान से अपनी सेना को तुरंत जम्मू कश्मीर के उन हिस्सों से हटाने कहा गया जिसे पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्ज़ा लिया था। इस प्रस्ताव के बावजूद पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्जाई जम्मू कश्मीर की ज़मीन नहीं लौटाई और ना ही वहाँ से अपनी सेना को हटाया। 1947 से आज तक जम्मू कश्मीर का बहुत बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े में है जिसे पाक अधिक्रान्त जम्मू कश्मीर के नाम से जाना जाता है।

इस घटना के बाद ज़ाहिर है कि 1941 में की गयी राज्य की जनगणना अर्थहीन हो गयी थी और नयी जनगणन करना अनिवार्य हो गया था। परन्तु शेख अब्दुल्ला और उनकी अंतरिम सरकार ने यह आवश्यक नहीं समझा। स्वतंत्रता के बाद सभी राज्यों में संविधान बनाने कि प्रक्रिया शुरू हो गयी थी। जम्मू कश्मीर में भी इस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए 1 मई 1951 को युवराज कर्ण सिंह ने ,जो तत्कालीन रीजेंट और राजप्रमुख भी थे, आदेश क्र 22 द्वारा, राज्य में संविधान सभा के चुनाव के लिए निर्वाचन क्षेत्रों के गठन की घोषणा की। इस आदेश के अनुसार हर निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुना जाना था और हर निर्वाचन क्षेत्र की जनसँख्या 40,000 की होगी। तय किया गया कि राज्य में कुल 100 निर्वाचन क्षेत्र यानि संविधान सभा में कुल 100 सदस्य होंगें। हालाँकि बिना जनगणना के सीटों की यह संख्या कैसे निर्धारित की गयी इसका कहीं कोई वर्णन नहीं मिलता है। इससे अधिक चौंकाने वाला था सीटों का राज्य के अलग अलग प्रांतों के लिए किया गया बँटवारा।

पाक अधिक्रान्त जम्मू कश्मीर या पीओजेके के लिए 25 सीटें आरक्षित कर दी गयीं, इस आशा में कि एक न एक दिन राज्य का यह हिस्सा दुश्मन से छुड़ा लिया जायेगा। बाकी 75 सीटों में से 43 सीटें कश्मीर को, 30 जम्मू को और 2 सीटें लद्दाख को दी गयीं। यह बँटवारा शेख अब्दुल्ला और उनकी अंतरिम सरकार ने किया था। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने सीटों के इस संदिग्ध निर्धारण पर कोई सवाल नहीं उठाया। उन्होंने इस अन्याय की अनदेखी कर दी जिसके कारण शेख अब्दुल्ला और भी मनमानी करने लगे। इसलिए सीटों के पक्षपातपूर्ण बँटवारे के लिए नेहरू भी ज़िम्मेदार थे। दरअसल सच तो यह है कि नेहरू और शेख अब्दुल्ला ने सोची समझी साज़िश के तहत, सुरक्षा का तकाज़ा देकर, महाराजा हरी सिंह को जम्मू कश्मीर से बाहर निकाल भेजा, जिसके बाद वे कभी भी जम्मू कश्मीर लौट नहीं पाए। यदि महाराजा हरी सिंह राज प्रमुख होते तो वे इस प्रकार का अन्याय कभी नहीं होने देते। उनके चले जाने से शेख अब्दुल्ला की राह का काँटा निकल गया था। अब उसे प्रश्न पूछनेवाला राज्य में कोई नहीं था।

1951 में जो निर्वाचन क्षेत्र बने वो जल्दबाज़ी में, बिना किसी विश्लेषण या तर्क के बना दिए गए थे, हालाँकि इसके पीछे शेख का स्वार्थपूर्ण अभिप्राय था। कहने को शेख ने 1941 की जनसँख्या को आधार बनाकर 40 लाख लोगों का 40 ,000 प्रति निर्वाचन क्षेत्र में विभाजन कर 100 क्षेत्रों का निर्माण किया। परन्तु पीओजेके के लिए 25 सीटें किस आधार पर आरक्षित कीं इसका कोई तर्क नहीं। क्या अब्दुल्ला ने यह मान लिया कि 10 लाख लोग पीओजेके में रह गए, इसलिए उनके लिए 25 सीटें रखी गयीं? यहाँ इस बात को समझना आवश्यक है कि शेख अब्दुल ने यह भी मान लिया था कि जम्मू की जनसँख्या का बड़ा हिस्सा पीओजेके में रह गया है, वरना 1941 की गणना के अनुसार जम्मू तो जनसँख्या में कश्मीर से बड़ा था।

आइये एक सामान्य सा गणित करें जिससे शेख अब्दुल्ला की चाल और कपट समझ आ जाये। जम्मू कश्मीर राजभवन वेबसाइट के अनुसार जम्मू कश्मीर राज्य का कुल क्षेत्रफल 2,22,236 वर्ग कि मी है, जिसमें पीओजेके के 78,114 वर्ग कि मी. और चीन के कब्ज़े वाले 42,685 वर्ग कि मी का भी समावेश है। योजना आयोग की रिपोर्ट, अध्याय VI , पृष्ठ 336 के अनुसार 1962 के युद्ध में चीन ने 37,555 वर्ग कि मी पर कब्ज़ा कर लिया था और इसके आलावा पाकिस्तान ने पीओजेके से 5,180 वर्ग कि मी का इलाका 1963 में चीन को हस्तांतरित कर दिया। (इस तथ्य की पुष्टि भारत सरकार द्वारा, चंदन मित्र के राज्य सभा में पूछे गए प्रश्न क्र 367 के उत्तर से भी होती है।)

इस प्रकार लगभग 1,20,849 वर्ग कि मी का क्षेत्र पाकिस्तान और चीन के कब्ज़े में है , और भारत के पास 1,01,387 वर्ग कि मी का क्षेत्र है। भारत के पास जम्मू कश्मीर का जो भाग है उसमें सबसे बड़ा हिस्सा 59,000 वर्ग कि मी लद्दाख का है, उसके बाद 27,000 वर्ग कि मी जम्मू और सबसे छोटा हिस्स्सा है 15000 वर्ग कि मी कश्मीर का है। इसके बावजूद शेख अब्दुल्ला ने 1951 में बिना जनसँख्या गणना किये 43:30:2 के अनुपात में कश्मीर, जम्मू और लद्दाख को क्रमशः सीट्स बाँट दीं। यह अनुपात देखने से लगता है कि शेख अब्दुल्ला ने यह मान लिया कि पीओजेके बनने के बाद , जम्मू कश्मीर की जनसँख्या 30,00,000 है, जिसमें 80,000 लद्दाख, 12,00,000 जम्मू प्रान्त और 17,20,000 कश्मीर प्रान्त में हैं। पर जनसँख्या का यह अनुमान तर्कसंगत नहीं है क्योंकि 1941 में जम्मू प्रान्त में 20,01,557 लोग यानि सबसे अधिक जनसँख्या थी, जब कि कश्मीर में 17,28,686 लोग दर्ज़ किये गए थे।

यदि यह मान भी लिया जाए कि जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा पीओजेके में चला गया, फिर भी यह तथ्य नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है कि वहाँ से बड़ी संख्या में जो लोग बचकर भागे थे उनमें से करीब 98 % जम्मू में जाकर बसे, जिससे जम्मू की जनसँख्या बढ़ी ना कि कश्मीर की। जम्मू में कश्मीर के मुकाबले ज़िले और तहसीलें अधिक थीं. जनसँख्या अधिक थी, साथ ही पीओजेके से आये विस्थापितों के जम्मू में बसने से वहाँ की जनसँख्या और बढ़ी थी। इसलिए जम्मू की तुलना में कश्मीर को, जो क्षेत्रफल और जनसँख्या दोनों में जम्मू से छोटा था, 13 सीट्स अधिक देने का कोई तर्कसंगत कारण नहीं मिलता है। सरेआम किये गए इस पक्षपात को देखकर केंद्र सरकार को चौकन्ना हो जाना चाहिए था परन्तु केंद्र सरकार, विशेष रूप से नेहरू , शेख अब्दुल के इस विश्वासघात से अनजाने बने रहे। यहाँ रीजेंट युवराज कर्ण सिंह की भूमिका पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है, जिन्होंने आधिकारिक ओहदे पर रहने के बाद भी खुले तौर पर हो रहे इस पक्षपात का विरोध नहीं किया, ना ही इसे रोकने का कोई प्रयत्न किया।

अधिक परेशान करनेवाली बात यह है कि संविधान सभा बनाने के लिए आनन फानन में किये गए सीटों का बँटवारा जस का तस चलता रहा और जब राज्य के लिए विधायिका (state Legislature) बनाने कि प्रक्रिया शुरू हुई तो बजाय जनसँख्या गणना कर परिसीमन करने के, सीटों के पुराने बँटवारे को ही पुनः लागू कर दिया गया।

शेख अब्दुल्ला के इस कपट से भरे सियासी खेल ने यह सुनिश्चित कर दिया कि राज्य में सरकार भी कश्मीर की बनेगी और राज्य की राजनीति में हमेशा कश्मीर का दबदबा रहेगा। आज जम्मू कश्मीर विधान सभा में 111 सीटें हैं, जिसमें से 24 सीटें पीओजेके के लिए आरक्षित हैं। बाकी सीटों में से 46 कश्मीर, 37 जम्मू और 4 लद्दाख के दी गयी हैं। यानि सत्तर साल पहले जो पक्षपात पूर्ण बँटवारा धोखे से किया गया था वह आज तक चल रहा है। जम्मू और लद्दाख के लोग लगातार पिछले सत्तर सालों से इस अन्याय को झेल रहे हैं।

जिस राज्य की नीव ही झूठ, छल कपट और धोखे से रखी गयी हो, वह राज्य प्रगति कैसे करेगा ? शेख अब्दुल्ला और नॅशनल कॉन्फ्रेंस की निर्लज्ज पक्षपात वाली राजनीति ने जम्मू कश्मीर की राजनीति का नक्शा ही बदल दिया। बिना किसी आधार के, जनसँख्या का सबूत होते हुए भी कश्मीर को अधिक सीट दे कर शेख अब्दुल्ला ने भेदभाव कि राजनीति शुरू कर दी थी जिसे कश्मीर के राजनितिक उत्तराधिकारियों ने बखूबी निभाया। भूतकाल की इस बेईमानी ने वर्तमान को व्यथित करनेवाला और मुसीबत भरा बना दिया है। परन्तु अब न्याय और ईमानदारी से इस पुरानी भूल को सुधारना आवश्यक है , तभी जम्मू कश्मीर का भविष्य सुधरेगा और सँवरेगा।

साभार- https://JammuKashmirNow/

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