लेकिन, कांग्रेस ने पाकिस्तान और शेख अब्दुल्ला की धमकियों के कारण विधेयक पास नहीं होने दिया

भाग – 2

1964 में तमाम दल आर्टिकल 370 को हटाने के लिए एकजुट थे

भारतीय जनसंघ के सांसद यू.एम. त्रिवेदी 13 मई, 1964 को किसी प्रस्ताव पर लोकसभा में बोल रहे थे. हालाँकि यह प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर पर नहीं था, फिर भी चर्चा में उन्होंने अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का मुद्दा उठा दिया. त्रिवेदी ने जोर देते हुए कहा, “अनुच्छेद 370 को समाप्त करने में क्या अड़चन आ रही है?” यहाँ से उस दौर का सूत्रपात हुआ, जब अनुच्छेद 370 को हटाने के लिए विपक्ष एकमत था. इस सम्बन्ध में लोकसभा में शानदार भाषण दिए गए. इतिहास का सही ज्ञान और तथ्यों का भरपूर इस्तेमाल किया गया. यही नहीं जो तार्किक कमियां निकाली गईं, उनका भी स्पष्ट जवाब दिया गया.

बताया गया कि अनुच्छेद 370 के हटने से अस्थिरता और अनिश्चितता पैदा होगी. कम्युनिस्ट पार्टी के सरजू पाण्डेय ने इसका खूबसूरती से उत्तर दिया, “वहां की जनता में विश्वास पैदा करना चाहिए कि कश्मीर आपके साथ ही रहेगा और वहां अस्थिरता का सम्बन्ध है, वह बहुत दिनों तक कायम नहीं रहेगी. कांग्रेस (आई) के भगवत झा आज़ाद ने भी खुलकर कहा, “मेरे कुछ साथी कहते हैं कि कश्मीर से कि उनको धारा 370 से नुकसान हुआ, लेकिन मैं कहता हूँ कि कश्मीर हमारे भारत देश का अविभाज्य अंग है और इसलिए सारे देश को नुकसान हुआ है. इसलिए जितनी जल्दी आप (सरकार) धारा 370 को समाप्त कर देंगे, उतनी जल्दी ही यह अनिश्चितता समाप्त हो जाएगी.”

इसमें दो राय नहीं है कि शेख अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 की आड़ में जम्मू-कश्मीर में अराजकता को बढ़ावा दिया. जवाहरलाल नेहरू ने शेख पर भरोसा किया, लेकिन उसकी मंशा को समझने में देरी की. साल 1953 में जब शेख को गिरफ्तार किया गया तो कुछ दिनों बाद ईद का त्यौहार आने वाला था. चूँकि, वे पहले ही गिरफ्तार कर लिए गए तो त्यौहार वाले दिन वे अपना भाषण नहीं दे सके. उन दिनों श्रीनगर से ‘महज’ नाम का एक अखबार निकलता था. शेख का वह भाषण उस अखबार में छापा गया. जिसका सार था कि राज्य की जनता भारत के साथ नहीं सकती.

संसद सदस्यों ने कहा कि अनुच्छेद 370 की बदौलत ही शेख की हिम्मत थी कि वे घाटी में बैठकर जनता को बरगलाता था. भ्रम में रखकर उन्हें डरता और धमकाता था. एक सांसद तो यहाँ तक कह गए कि शेख और फारुख सरीखे लोगों को नेता माना जाए, यह शर्म की बात है.” शेख को झूठे प्रचार में महारत हासिल थी, जबकि तथ्य दूसरी दिशा की ओर इशारा करते हैं. साल 1964 में जम्मू-कश्मीर की कुल आबादी 35.5 लाख थी. जिसमें जम्मू के 15.7 लाख और लद्दाख से 88 हज़ार लोग शामिल थे. बाकि 19 लाख की जनसँख्या कश्मीर घाटी में रहती थी. यह सभी शेख के समर्थक हों, इसकी संभावना न के बराबर है. पहले भारत सरकार ने शेख को गिरफ्तार किया, फिर रिहा कर दिया और आखिर में दिल्ली बातचीत के लिए बुलाया. लगभग इसी समय तक संसद में अनुच्छेद 370 को हटाने का एक प्रस्ताव 11 सितम्बर, 1964 को पेश किया जा चुका था. यह एक सुनहरा अवसर था, जब विपक्ष और सरकार आपसी तालमेल से इस दिन को ऐतिहासिक बना सकती थी.

प्रकाशवीर शास्त्री के इस विधेयक पर गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने 04 दिसंबर, 1964 को जवाब दिया. सरकार की तरफ से आधिकारिक बयान में उन्होंने एकतरफा रुख अपनाया. जब अन्य सदस्यों ने इसका विरोध किया तो नंदा ने कहा, “यह मेरा सोचना है, अन्यों को इस पर वाद-विवाद नहीं करना चाहिए.” इस तरह का एक अलोकतांत्रिक तरीका अपनाया गया. नंदा पूरी चर्चा में अनुच्छेद 370 के विषय को टालते रहे. वे बस इतना ही कह पाए कि विधेयक में कुछ क़ानूनी कमियां हैं. जबकि इसमें सरकार की कमजोरी साफ़ दिखाई देती है. अगर कुछ कमियां थीं तो सरकार स्वयं उसे सिलेक्ट कमेटी को भेज सकती थी. इसके बाद एक पूर्ण विधेयक सदन के समक्ष पेश किया जा सकता था.

कानून के जानकारों सहित पूरा विपक्ष इस बात से सहमत था कि जम्मू-कश्मीर के मामले में सरकार ने गलत तरीके से काम किया है. अनुच्छेद 370 पर पिछले 17 सालों में पहली बार प्रस्ताव सदन के समक्ष था. यह एक मौका इसलिए बेकार चला गया क्योंकि शेख और पाकिस्तान सामने दीवार बनकर खड़े हो गए थे. क्योंकि शेख ने नया राग अलापना शुरू कर दिया था. दिल्ली में हुई बातचीत में शेख भारत सरकार से एक और समझौता करना चाहते थे. उनके मुताबिक उनकी बात अगर सरकार मानती है तो भारत में धर्मनिरपेक्षता के साथ पाकिस्तान की बात और कश्मीर की बात भी कायम रहेगी. यह अजीब कदम इसलिए उठाया गया, जिससे अनुच्छेद 370 पर यथास्थिति बनी रहे. वहीं पकिस्तान के विदेश मंत्री ने कहा कि अनुच्छेद 370 को हटाने से खतरनाक स्थिति सामने आ जाएगी.

यह जानते हुए कि देश के संविधान में क्या होगा अथवा नहीं, इसका पाकिस्तान से कोई लेना देना नहीं है. बावजूद इसके तत्कालीन भारत सरकार ने दुर्बल रवैया अपनाया. दूसरी ओर शेख अब्दुल्ला पाकिस्तान के संपर्क में थे और विभाजन के रास्ते पर चल पड़े. संसद में चर्चा से एक-दो दिन पहले ही उन्होंने श्रीनगर में भारत सरकार के खिलाफ बयानबाज़ी की थी. उसी शेख की बातों में आकर सरकार ने व्हिप जारी कर दिया कि इस विधेयक पर मत न दिया जाए. इस प्रकार अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध किया गया.

सरकार ने अपनी कमजोरी अथवा शिथिलता को छिपाने के लिए व्हिप थोपा था. प्रकाशवीर ने इसका विरोध करते हुए सदन के समक्ष शानदार निवेदन किया, “मैं अपने उन भाइयों से कहना चाहता हूँ कि यदि वे मेरे विधेयक के विरोध में मत देंगे तो हो सकता है कि यह विधयेक गिर जाए, लेकिन वे याद रखें कि हिन्दुस्तान का इतिहास उन्हें कभी इस बात के लिए क्षमा नहीं कर सकेगा. वे आज अपनी आत्मा की आवाज़ के आधार पर मत दें, किसी व्हिप के आधार मत न दें. पार्टियाँ छोटी होती हैं, देश सबसे बड़ा होता है. इतिहास में जब यह लिखा जाएगा कि इस प्रकार सर्वसम्मत समर्थन मिलने के बाद भी केवल एक मंत्री के खड़े होकर विरोध के कारण सब लोगों की राय बदल गयी, तो लोकसभा के इतिहास में जनतंत्र की भी हत्या हो जाएगी और वे भी अपनी आत्मा की हत्या कर देंगे.”

समाप्त…

देवेश खंडेलवाल

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