The Caravan, तुलसी गेबार्ड और संघ

दिल्ली से एक मासिक पत्रिका निकलती है – The Caravan. चंपक, सरिता, मुक्ता, गृहशोभा प्रकाशित करने वाली ‘दिल्ली प्रेस’ की यह पत्रिका सन 1988 में बंद हो गयी थी. लेकिन 2009 में इसे मजबूत फंडिंग के साथ फिर से नए अवतार में लाने का प्रयास हुआ और 2010 में Caravan, नए कलेवर में लोगों के सामने आयी.

(http://indiafacts.org/caravan-2-0-why-a-defunct-leftist-magazine-was-revived/)

यह पत्रिका शुरु से ही हिन्दू विरोधी रही है. नए अवतार में इसे लॉंच करने के लिए दिल्ली प्रेस ने संपादक चुना – विनोद जोसेफ. श्रीमान जोसेफ केरल से हैं और दिल्ली के जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की है. इनकी विचारधारा समझनी हो तो इनका बनाया हुआ शो अवश्य सुनें – ‘Moist India : The Search for Economic Justice’. जोसेफ ने यह स्टोरी पैसिफिक रेडियो के लिए की थी. वामपंथी जोसेफ, हिन्दुत्व के मजबूत विरोधी रहे हैं.

इस Caravan ने मीडिया जगत में अपना दबदबा बनाए रखा है. ‘India’s First Long-Form Narrative Journalism Magazine’ ऐसा ये अपने आप को कहते हैं. किन्तु व्यावसायिक रूप में यह सफल उपक्रम नहीं है. अंग्रेजी की अधिकतम 30,000 प्रतियां और हिन्दी ‘कारवां’ की मात्र 10,000 प्रतियां छपती हैं. किसी मासिक पत्रिका की इतनी कम प्रतियों में तो दिल्ली जैसे स्थान पर उसके ऑफिस का चाय-पानी का खर्चा भी निकलना मुश्किल है. फिर विनोद जोसेफ जैसे, न्यूयॉर्कर पत्रिका को छोड़ कर आने वाले पत्रकार को यह पत्रिका कैसे रख पाती है? इसकी फंडिंग कहां से होती है? या दिल्ली प्रेस के परेश नाथ और अनंत नाथ इन भाइयों में, अपने वाम – विचारों के प्रति इतनी अटूट निष्ठा है, कि वे अपने अन्य प्रकाशनों की सारी कमाई, इस Caravan में डालते हैं..? इसका स्पष्ट उत्तर सामने नहीं है.

अभी Caravan का उल्लेख करने का सन्दर्भ है, इसके अगस्त अंक की कवर स्टोरी : Tulsi Gabbard – How the Sangh built up the first Hindu candidate for US President. बड़ी रोचक स्टोरी है ये. The American Sangh’s affair with Tulsi Gabbard, यह उनकी इस स्टोरी का प्रमोशन है.

कुल 57 पृष्ठों की यह विस्तृत स्टोरी लिखी है – पीटर फ्रेड्रिक ने. ये महाशय ‘वायर’, ‘क्विन्ट’ जैसे माओवादी पोर्टल्स के नियमित लेखक हैं. पीटर ने एक पुस्तक लिखी है, ‘Captivating the Simple-Hearted : A struggle for Human Dignity in the Indian Subcontinent’. इस पुस्तक में उन्होंने ‘ब्राम्हणों ने मूल निवासियों को कैसे दबाकर रखा है’ इस पर विस्तार से लिखा है. हिन्दुत्व विरोध में जहरीले शब्दों के साथ लिखना, यह इनकी लेखन शैली है.

तो, इन महाशय ने तुलसी गबार्ड को लेकर ऐसा चित्र प्रस्तुत किया है, मानो तुलसी गबार्ड यह अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनाव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रत्याशी हैं..!

अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव का माहौल प्रारंभ हो गया है. वहां, दो स्तरों पर चुनाव होता है. पहले, अपनी पार्टी का प्रत्याशी बनने के लिए चुनाव लड़ना पड़ता है. उसे primaries कहते हैं. वहां पर दो प्रमुख पार्टियां हैं – डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन. वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, रिपब्लिकन पार्टी से हैं. सन् 2016 में उन्होंने अपने पार्टी से राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के लिए 16 अन्य उम्मीदवारों को हराया था. इस बार शायद वे दोबारा चुनाव लड़ें.

डेमोक्रेटिक पार्टी से इस बार तुलसी गबार्ड सशक्त उम्मीदवार हैं. चार बार सीनेट में चुनी गयी, तुलसी गबार्ड, हवाई आर्मी नेशनल गार्ड के मेडिकल कोर में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. वे अमेरिका की पहली हिन्दू सांसद हैं.

लेकिन मजेदार बात यह कि 38 वर्षीय तुलसी गबार्ड मूलतः हिन्दू नहीं हैं. इनके माता- पिता हिन्दू जन्मतः नहीं हैं. माईक गेबार्ड इनके पिता हैं. इनके पहले पति थे, एदुआर्दो तामयो. तो इनके वर्तमान में पति हैं – अब्राहम विलियम्स. अर्थात् दूर दूर तक हिन्दुत्व से पारिवारिक संबंध नहीं है. तो फिर ये हिन्दू कैसे हुई..?

भगवान चैतन्य महाप्रभु के विचारों से ये प्रेरित हुई. हिन्दुत्व की संकल्पनाएं इन्हें अच्छी लगने लगीं. ये शाकाहारी हुईं और अपनी जीवनशैली को भी हिन्दुत्व में ढालने का प्रयास किया. बड़े सोच समझकर इन्होंने अपना नाम तुलसी रखा है. इनके भाइयों के नाम भी संस्कृत आधारित हैं. अमेरिकी सीनेट में इन्होंने भगवत गीता हाथ में रखकर सीनेटर की शपथ ली थी. और वे बड़े गर्व से अपने आप को हिन्दू कह रही हैं.

अब ज़रा कल्पना करें, कि ऐसी तुलसी गबार्ड यदि अमेरिका की राष्ट्रपति बनती हैं, तो विश्व का परिदृश्य कैसा रहेगा..? हमारे भारत की भूमिका क्या होगी? इस विचार से बौखलाकर एक बहुत बड़ी लॉबी पूरी दुनिया में इस समय काम कर रही है. किसी भी हालात में, डेमोक्रेटिक पार्टी के अंदर प्राथमिक चुनाव में तुलसी गबार्ड को पार्टी का प्रत्याशी नहीं बनने देना, यही इस लॉबी का लक्ष्य है. The Caravan में प्रकाशित 57 पृष्ठों का यह आलेख, इसी बड़ी सी रचना की एक छोटी सी कड़ी है.

पश्चिम जगत में राइट विंग या राइट एक्सट्रिमिस्ट या हार्डकोर नेशनलिस्ट ऐसे शब्दों का अर्थ अच्छे परिपेक्ष्य में नहीं लिया जाता. वहां ‘राइट विंग’ को ‘नाजी’ विचारधारा से जोड़ते हैं. इसलिए यदि किसी पर एक्सट्रीम राइट विंग का तमगा लग गया, तो वह समाज में सामान्यतः स्वीकार्य नहीं होता. यही तमगा तुलसी गबार्ड के साथ जोड़ने की पूरी कोशिश हो रही है.

इसकी शुरुआत हुई, इस वर्ष के प्रारंभ में, जब अमेरिका के प्रख्यात शो, ‘लास्ट वीक टुनाइट’ में जॉन ओलिवर ने तुलसी गबार्ड को एक्सट्रीम राइट विंग के रुप में चित्रित किया. एचबीओ के इस लोकप्रिय शो से प्रेरणा लेकर हमारे यहां शेखर सुमन ने ‘मूवर्स एन्ड शेखर्स’ यह टॉक शो शुरू किया था. बाद में नेटफ्लिक्स पर हसन मीनाझ ने अपने ‘पेट्रियट एक्ट’ इस कार्यक्रम में इसी लाइन पर तुलसी गबार्ड की तुलना की. हसन मीनाझ भारतीय – अमेरिकन है. लेकिन अपने शो में वह मोदी और भाजपा के नेताओं की खिल्ली उड़ाता रहता है.

इन सभी ने मानो अपना मिशन बनाया है कि तुलसी गबार्ड को पूर्णतः अतिवादी दक्षिणपंथी दिखाया जा सके. और इस प्रकार का नरेटिव बनाने का काम चल रहा है.

The Caravan के इस 57 पृष्ठीय आलेख में, तुलसी गबार्ड को संघ, भाजपा, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल के साथ जोड़ा गया है. समय-समय पर, अमेरिका में हुए सार्वजनिक कार्यक्रमों में तुलसी गबार्ड के साथ मंच साझा करने वाले संघ और भाजपा के अधिकारियों / नेताओं के फोटो आलेख के साथ दिए हैं. संघ से जुड़े लोग, कैसे तुलसी गबार्ड को बड़ी संख्या में चन्दा दे रहे हैं, इसका भी वर्णन है. अनेक असत्य बातें धड़ल्ले से लिखी हैं. जैसे –

Sangh activists demolished the Babri Masjid in 1992, setting of communal violence across India. The same year, L K Advani decided that the BJP needed a global presence. He founded the Overseas Friends of BJP to help project ‘a positive and correct image’.

बिलकुल गलत..! Overseas Friends of BJP की स्थापना सन् 1982 में हुई है. लेकिन इस पर से यह स्पष्ट होता है, कि किस प्रकार का नरेटिव ये लोग स्थापित करना चाह रहे हैं.

कुल मिलकर एक मिली – जुली वैश्विक साजिश है, जिसमें सारे वामपंथी, माओवादी, चर्च, क्रिश्चियन संस्थाएं एक होकर तुलसी गबार्ड को खांटी संघी के रूप में स्थापित करने पर तुली हुई हैं. अगर ऐसा प्रस्थापित होता है, तो तुलसी गबार्ड का डेमोक्रेटिक पार्टी में प्रत्याशी के रूप में चुन कर आना कठिन होगा, ऐसा गणित है.

अर्थात्, अब वैश्विक राजनीति में ‘हिन्दुत्व’ और ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ यह महत्वपूर्ण शब्द बन गए हैं.

–  प्रशांत पोळ

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