स्वयंसेवकों ने मनाई स्वातंत्र्यवीर श्री विनायक दामोदर सावरकर जी की जयंती

जयपुर (विसंकें)। आज सावरकर जयंती के अवसर पर भारती भवन में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ। सुभाषितम, अमृत वचन व काव्य गीत के पश्चात बौद्धिक सत्र हुआ। जिसमें वक्ता गुरु प्रकाश ने वीर सावरकर के जीवन के कुछ ऐसे अहम पहलुओं पर प्रकाश डाला, जिनको वर्तमान समय में निष्पक्षता के साथ तथ्यात्मक रूप से लोगों के सामने लाना अति आवश्यक है। जैसे:–

महाराष्ट्र मे नासिक के पास भगुर गांव में दामोदर राव और राधा देवी की चार संतानों, गणेश राव, तात्या राव, नारायण राव तथा पुत्री मैना, में से तात्या राव को ही आज पूरा देश वीर विनायक दामोदर सावरकर के रूप में जानता है।

वीर सावरकर के परिवार की परिस्थितियां समृद्ध जमींदार परिवार की थीं। तत्कालीन परिस्थितियों में कोई भी परिवार अपनी समृद्धि को बनाए रखने के लिए अंग्रेज सरकार की नीतियों में अपनी निष्ठा बढ़-चढ़कर  दिखाता,  लेकिन सावरकर परिवार ने राष्ट्र सर्वोपरि रखते हुए अपना सर्वस्व राष्ट्र की सेवा में अर्पण कर दिया।

वक्ता ने संक्षेप में वीर सावरकर के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि किस प्रकार उन की यात्रा पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाने, मित्र मेला व अभिनव भारत की स्थापना करने से लेकर फर्ग्युसन कॉलेज से होती हुई श्यामजी कृष्ण वर्मा की छात्रवृत्ति और लोकमान्य तिलक की प्रेरणा से लंदन में राष्ट्र रक्षा के लिए इंडिया हाउस में फ्री इंडिया सोसायटी का गठन और अभिनव भारत का प्रसार देश के बाहर करने तक सार्थक रूप से सम्पन्न हुई। बौद्धिक सत्र के अंत में परस्पर प्रश्नोत्तर शैली में उन्होंने कुछ ऐसे विषयों पर विचार रखे जिन पर वर्तमान में विवाद पैदा करने की असफल कोशिश की जा रही है:

 (1)   अंडमान  की सेल्यूलर जेल से समय पूर्व रिहाई और अंग्रेजों से माफी.

वीर सावरकर का व्यक्तित्व इन सवालों का जवाब स्वयं दे देता है कि जो व्यक्ति अपनी बैरिस्टर की शिक्षा संपूर्ण करके उसकी डिग्री इसलिए नहीं प्राप्त करता है क्योंकि वह अंग्रेजों के प्रति गुलामी की प्रतीक प्रतिज्ञा को पढ़ने से मना कर देता है।

इसके अलावा कर्जन वायली की हत्या करने वाले मदन लाल धींगरा के विरुद्ध आगा खां जैसे अंग्रेज भक्त सर्वसम्मति से ब्रिटेन में प्रस्ताव लाते हैं तो सबके सामने जो उस प्रस्ताव का विरोध कर दे उस व्यक्ति के व्यक्तित्व पर क्या संदेह किया जा सकता है?

वीर सावरकर 1911 से 1921 तक सेल्यूलर जेल में रहे इस दौरान उनके पुत्र की मृत्यु हुई उनके परिवार को पैतृक संपत्ति से बेदखल करके सड़क पर ला दिया गया और गणेश राव (बाबा राव) भी सेल्यूलर जेल में बंद थे जो व्यक्ति इन सब परिस्थितियों से नहीं टूटा उस पर आरोप लगाना कितना बड़ा अपराध है?

वीर सावरकर ने जेल की अव्यवस्थाओं को लेकर कुछ पत्र लिखे थे और केवल व्यवस्था सुधारने तक उनके पत्रों का उद्देश्य होता था इसके अलावा तत्कालीन समय में वीर सावरकर का मुकदमा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय तक पहुंच चुका था उनके सभी साथी जैसे लाला हरदयाल, मैडम भीकाजी कामा, श्यामजी कृष्ण वर्मा विश्व में अनेक जगह सक्रिय थे और इसी वजह से वीर सावरकर को जेल में रखना अंग्रेजों के लिए मुश्किल होता जा रहा था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद बंदियों को मुक्त करना अंग्रेजों की मजबूरी बन चुका था लेकिन एक सामान्य जेल मैनुअल के हिसाब से जब भी किसी व्यक्ति को बाहर भेजा जाता था तो उससे यह बातें लिखवाई जाती थी कि वह दोबारा शासन के विरुद्ध किसी भी तरह सशस्त्र विद्रोह या देश विरोधी गतिविधि मैं भाग नहीं लेगा। वीर सावरकर ने एक महान उद्देश्य के लिए समाज के बीच रहकर सक्रिय कार्य करने के लिए इस पत्र पर हस्ताक्षर किए लेकिन इसमें माफीनामे जैसी कोई बात नहीं थी।

समय पूर्व रिहाई पर चिल्लाने वाले लोगों की विचारधारा से जुड़े जवाहरलाल नेहरू और गांधीजी को क्रमशः 1921 और 1922 में जेल हुई थी उस पर भी कुछ प्रकाश डालना आवश्यक है:

(1) :–  जवाहरलाल नेहरू जी को प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत दौरे के विरोध में 6 दिसंबर 1921 को गिरफ्तार किया गया उनको 6 माह की जेल हुई लेकिन 3 मार्च 1922 यानी लगभग 87 दिनों के बाद ही उनको रिहा कर दिया गया। जबकि उनके पिता मोतीलाल नेहरू एवं अन्य सैकड़ों कार्यकर्ता जेल में ही रहे इसके पीछे क्या कारण थे कौन सा माफीनामा लिखाया गया था या दया याचिका का कौन सा प्रारूप तैयार किया गया था यह सब सोचने का विषय है?

(2) :– गांधीजी को मार्च 1922 में गिरफ्तार करके 6 वर्ष की जेल की सजा हुई लेकिन 2 वर्ष बाद ही उनको मुक्त कर दिया गया इसके पीछे क्या कारण था यह भी एक विचार का विषय है?

जेल से जुड़े प्रश्न पर एक विचारणीय बिंदु यह भी है की वीर सावरकर को अंडमान की सेल्यूलर जेल में किन परिस्थितियों में रखा जाता था कैसी यातनाएं दी जाती थी यहां तक की कागज कलम के अभाव में उन्हें गोमांतक जैसी रचनाएं जेल की दीवारों पर लिखनी पड़ीं और इन सब से हम सब वाकिफ हैं

लेकिन एक बार तुलनात्मक रूप से तत्कालीन समय के राष्ट्रीय कांग्रेस के बड़े नेताओं की जेल यात्राओं की कुछ बातें जरूर याद करनी चाहिए। जैसे

9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत के समय जब कांग्रेस के सभी नेताओं को गिरफ्तार किया गया तो उनमें से किसी को अंडमान सेल्यूलर जेल नहीं ले जाया गया

बल्कि जवाहरलाल नेहरू को अहमदनगर के किले में रखा गया जहां पर उनके पास सारी सुख सुविधाएं उपलब्ध थी और “भारत एक खोज” की रचना उन्होंने वहां पर कर दी अंग्रेजों ने वीर सावरकर को कागज कलम नहीं उपलब्ध करवाए लेकिन भारतीय जनमानस में “आर्य -द्रविड़” के रूप में जहर फैलाने वाली इस किताब का प्रकाशन ऑक्सफोर्ड प्रेस के द्वारा किया गया

और गांधी जी को आगा खां पैलेस में रखा गया यह दोनों किसी भी तरह से तत्कालीन समय की अन्य जेलों जैसी अव्यवस्थाओं से कोसों दूर थी यहां तो इन नेताओं के सुख-सुविधाओं का पूरा प्रबंध किया जाता था जरा इन विषयों पर भी आज के जागरूक लोगों को चिंतन करना चाहिए

(2) :– तत्कालीन समय में वीर सावरकर के व्यक्तित्व को अन्य कांग्रेसी नेताओं की तुलना में छोटा बताने वाले तर्क के जवाब में

वीर सावरकर जब रत्नागिरी में नजरबंद थे तो उनसे सन 1925 में गुरुजी डॉक्टर हेडगेवार ने मुलाकात की जिसमें समाज को सशक्त बनाने एवं सामाजिक समरसता के लिए निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता पर लंबा विचार-विमर्श हुआ

1927 में गांधीजी वीर सावरकर जी से मिले जहां पर सावरकर ने कांग्रेस की मुस्लिम लीग के आगे नतमस्तक होने वाली नीतियों को लेकर आगामी भविष्य की चिंताओं से अवगत कराया

1928 में जब भगत सिंह सावरकर के पास आए और भारत का स्वातंत्र समर पुस्तक के प्रकाशन की अनुमति चाही तो सावरकर जी ने सहर्ष अनुमति के साथ आशीर्वाद प्रदान किया इसके बाद पुस्तक का तीसरा संस्करण भगत सिंह के द्वारा ही प्रकाशित किया गया आगे जाकर चौथा संस्करण नेताजी सुभाष चंद्र बोस के द्वारा सुदूर पूर्व में प्रकाशित किया गया अन्य तत्कालीन बड़े नेता वीर सावरकर जी के विचारों से प्रेरणा प्राप्त करते थे यही उनका महान व्यक्तित्व तत्कालीन समय में हमें दिखाई पड़ता है.

 (3) :– गांधी जी की हत्या को लेकर लगने वाले आरोप और वास्तविकता

30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने दिल्ली की प्रार्थना सभा में गांधी जी की हत्या कर दी इसके बाद देश में अनेक जगह, अहिंसा के पुजारियों ने हिंसा का तांडव किया

इसी हिंसा के शिकार वीर सावरकर के छोटे भाई डॉक्टर नारायण राव भी हुए जिन पर मुंबई के शिवाजी पार्क क्षेत्र में इतनी बुरी तरह से हमला किया गया की कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई

5 फरवरी 1948 को वीर सावरकर को गिरफ्तार करके मुंबई की ऑर्थर रोड जेल में रखा गया इसके बाद मुकदमे की सुनवाई मई के अंत में दिल्ली के लाल किले में हुई

सावरकर जी की पैरवी के लिए हिंदू महासभा के अध्यक्ष एल बी भोपटकर, लाला गणपत राय, जमुना दास मेहता, एनपी अय्यर जैसे प्रख्यात वकीलों ने अपने आप को प्रस्तुत किया

तत्कालीन समय के भारत के कानून मंत्री डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने वीर सावरकर का मुकदमा लड़ने की पेशकश की इससे यह पता चलता है कि डॉक्टर अंबेडकर वीर सावरकर के विचारों से कितना सहमत थे और उन्हें उनके निर्दोष होने पर पूरा भरोसा था

सभी साक्ष्यों गवाहों और हर स्तर की जांच के बाद न्यायालय ने वीर सावरकर को गांधी हत्याकांड के लिए निर्दोष पाया और ससम्मान दोषमुक्त किया लेकिन आज भी न्यायालय की अवहेलना करते हुए कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी उन पर गांधी हत्याकांड का आरोप लगाकर भारतीय संविधान और न्याय प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाने का कुत्सित प्रयास करते हैं.

(4) :–  राजस्थान सरकार के द्वारा पाठ्यक्रम में अनर्गल मिथ्या जानकारियों का समावेश क्यों

राजस्थान के वर्तमान शिक्षा मंत्री महाराणा प्रताप एवं स्वातंत्र्यवीर सावरकर के लिए जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं जिस तरह के विचार रखते हैं इसमें कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले वीरो के लिए कांग्रेस पार्टी की विचारधारा आजादी के पूर्व से वर्तमान समय तक वैसी ही है

राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले महाराणा प्रताप को महान नहीं बता कर अकबर को महान बनाने वाली विचारधारा, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद एवं वीर सावरकर जैसे महापुरुषों के योगदान को भुलाकर परिवार विशेष की कीर्ति गाने वाली विचारधारा से और उम्मीद क्या की जा सकती हैं

भारतीय स्वतंत्रा के लिए सर्वस्व समर्पण करने वाले परिवारों में राजस्थान का बारहठ परिवार और महाराष्ट्र का सावरकर परिवार अग्रणी रहा है

केसरी सिंह बारहठ, जोरावर सिंह बारहठ एवं प्रताप सिंह बारहठ पूरा परिवार राष्ट्र रक्षा के यज्ञ में आहुति दे गया

उसी प्रकार सावरकर परिवार का योगदान रहा लेकिन आप दोनों जगह देख सकते हैं जिन शक्तियों के पास शासन की बागडोर रही उन्होंने इन दोनों परिवारों को आज की पीढ़ी के मन मस्तिष्क से मिटाने के लिए निरंतर प्रयास किए

अब हमारा कर्तव्य है कि जिस प्रकार हमने वीर शिवाजी और महाराणा प्रताप को एक साथ जोड़ दिया जब जब महाराणा प्रताप का नाम आता है अपने आप हिंदू पद पादशाही के नायक वीर शिवाजी का नाम स्वाभाविक रूप से साथ आ जाता है उसी तरह से हमारी जिम्मेदारी है

हमें राजस्थान मैं बारहठ परिवार के साथ सावरकर परिवार को जोड़कर सामान्य जनमानस के मन मस्तिष्क में इन दोनों परिवारों के त्याग बलिदान और समर्पण की चिर स्थाई स्मृति स्थापित करनी होगी अगर इस प्रयास में हम सफल हो गए तो सत्ता परिवर्तन के बाद हमें दोबारा सावरकर जी के लिए सड़क पर संघर्ष की आवश्यकता नहीं रहेगी क्योंकि जब समाज अपने महापुरुषों से जुड़ाव स्थापित कर लेता है तो सत्ता का सामर्थ्य नहीं रहता की जन भावनाओं के विरुद्ध जननायकों का अपमान कर सके।

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