संत तुकाराम जयंती पर प्रेरक प्रसंग ‘कद्दू’

एक दल तीर्थ-यात्रा पर जा रहा था। यह दल हर वर्ष तीर्थयात्रा पर जाता था, लेकिन उसके सदस्यों के विकार खत्म नहीं होते थे। दल के सभी सदस्य संत कवि तुकाराम जी के पास आए और उनसे भी साथ चलने का अनुरोध किया। तुकारामजी ने कहा कि अभी तो मैं नहीं जा सकता, लेकिन आप मुझसे यह कद्दू ले जाइए, इसे मेरी ओर से तीर्थ-यात्रा करवा दीजिए। जहां भी आप पूजा-पाठ या स्नान करें, वहां कद्दू को भी करवा दीजिए।

संत तुकाराम ने तीर्थयात्रा पर जा रहे लोगों को सबक देने के लिए कद्दू दिया था। लेकिन वे लोग यह बात समझ नहीं सके। वे लोग कद्दू को अपने साथ तीर्थयात्रा पर ले गए। उन्होंने जहां पूजा की, कद्दू को भी पूजा करवाई, जहां उन्होंने स्नान किया, वहां कद्दू को भी स्नान करवाया। इस तरह तीर्थ-यात्रा पूरी होने के बाद वे कद्दू के साथ वापस लौट आए। उन लोगों ने वह कद्दू संतजी को दिया। तुकारामजी ने सभी यात्रियों को प्रीतिभोज पर आमंत्रित किया, जिसमें उसी कद्दू की सब्जी बनाई गई। जब तीर्थ-यात्रियों ने खाना शुरू किया, एक कौर मुंह में डालते ही सभी लोग उठ गए और बोले, ‘यह कद्दू तो बहुत कड़वा है।’ तुकारामजी ने कहा, यह कैसे हो सकता है। यह तो तीर्थस्नान करके आया है। मुझे पता है, यह पहले कड़वा था, लेकिन तीर्थ-यात्रा व स्नान के बाद तो इसकी कड़वाहट खत्म हो जानी चाहिए थी।

तुकाराम के चेहरे पर आई मुस्कान देख वे समझ गए कि संत जी कद्दू के माध्यम से हम लोगों के भीतरी विकारों की बात कर रहे हैं। उन्होंने तीर्थाटन तो किया, लेकिन अपने मन एवं स्वभाव को नहीं सुधारा। वे भी कद्दू की तरह तीर्थयात्रा के बाद भी कड़वे ही थे।

कथा-मर्म : तीर्थयात्रा का अर्थ सिर्फ पर्यटन नहीं, बल्कि अपने विकारों को त्यागना और सबके प्रति प्रेम भाव रखना होता है।

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