फिल्म समीक्षा – रेड

आर्थिक अपराध ऐसा विषय है, जो सदा ही ससामयिक बना रहता है। वर्तमान में भी पुरानी सरकारों और बैंक घोटालों से देश हिला हुआ है। ऐसे में फिल्म रेड सही समय पर आयी है।
वे साधारण से लोग जिन्होंने जोखिम और परिश्रम से असाधारण काम करके समाज के हितों को साधा, उनके जीवन चरित्र पर फिल्में बनने लगी है, उसी क्रम में यह फिल्म रेड बनायी गयी है।
अस्सी के दशक में देश के सबसे बड़े और लम्बे चलने वाले आयकर छापे की घटना से यह फिल्म प्रेरित है। लखनऊ में यह छापा डाला गया, जिसके परिणाम से सारा देश चैंक गया। इनकम टेक्स रेड पर बनी विश्व की पहली फिल्म है।
मुख्य पात्र – अजय देवगन (अमय पटनायक) और इलीना डीक्रूज (नीता पटनायक) सौरभ शुक्ला (ताऊजी) है, निर्देशन राजकुमार गुप्ता और पटकथा लेखन रीतेश शाह का है।
अजय देवगन मनोरंजन के अतिरिक्त सामाजिक मुद्दों पर अच्छी फिल्में बनाने के लिए जाने जाते है। एक कर्तव्यनिष्ठ सरकारी कर्मचारी का परिवार किस प्रकार से भय और अनिश्चितता में जीता है, इसका संवेदनशील चित्रण है। ताऊजी, जिसके घर-प्रतिष्ठान पर छापा पडा, के किरदार में सौरभ शुक्ला का अभिनय अच्छा है। लगभग दो घण्टे लम्बी फिल्म गम्भीर विषय पर होने के बाद भी दर्शकों को बांधे रखने में सफल है। जबकि गीत संगीत साधारण है।
खलनायक अपराधी होने के बाद भी अन्त में सहानुभूति प्राप्त करने में सफल होता है क्योंकि दोष अकेले अपराधी का ही नही, बल्कि, समाजवादी शासन माॅडल का भी है, जो जीवन में सफल होने के लिए एक उद्यमी को चोरी करने को मजबूर कर देता है।
स्वतंत्रता के बाद भारत के तात्कालिक नेताओं ने भारत के लिये समाजवादी ढाँचा चुना, जोकि सरकारी बन्धनों और अनेक विसंगतियों से भरा होने के कारण कभी सफल नहीं रहा। कर व्यवस्था इतनी जटिल बना दी गयी, कि फैक्ट्री या व्यापार चलाना बहुत मुश्किल हो गया। प्रभावशाली, बाहुबली और राजनैतिज्ञों को खुश रखने वाले व्यापारी ही सफलतापूर्वक कारोबार कर पाते थे। इन्सपैक्टर और लाईसेंस राज का बोलबाला। हालांकि एक राजनैतिक दल, कथित जनतन्त्र का हरण करने में सफल रहा। इसी व्यवस्था के कारण देश में उत्पन्न हुआ — काला धन।
भारत विश्व व्यापार में पिछडता गया। दो नम्बर की एक समानान्तर व्यापार व्यवस्था विकसित हो गयी, जो राजनीतिज्ञों के अस्तित्व के लिये जरूरी थी। जिसने राष्ट्र को भ्रष्टाचार के गर्त में डूबो दिया। ऐसी परिस्थिति में कर्तव्यनिष्ठ सरकारी अधिकारी का ईमानदारी से काम करना और भी मुश्किल हो जाता है। इसी दो नम्बर की अर्थ व्यवस्था पर प्रहार करती हुई यह फिल्म रेड बनायी गयी है।
हालांकि आयकर छापे के दौरान अजय देवगन की पत्नि खाना लेकर आ जाती है, यह सीक्वेंस अटपटा लगता है। कुछ संवाद प्रभावशाली बन पड़े है, जैसे, ‘‘इनकम टेक्स अफसरों का नहीं, उनकी बीवियों का बहादुर होना जरूरी है।’’
यह कहानी तब की है जब मोबाईल, इन्टरनेट और सोशियल मिडिया नहीं हुआ करता था। आज का दर्शक शिक्षित और विचारवान है। फिर भी हो सकता मनोरंजक उत्तेजना तलाशता युवा दर्शक फिल्म को बहुत पसन्द ना भी करे, किन्तु इस प्रकार की गम्भीर फिल्मों का निर्माण और प्रदर्शन आवश्यक है। फिल्म में फूहड नाच-गाने और संवाद नहीं है। ऐसी फिल्मों से ही दर्शकों की पसन्द और समझ परिपक्व होती है।
कम बजट की फिल्मों में तेज तर्रार संवाद और हास्य का पुट दर्शकों को बांधे रखता है। अजय देवगन गम्भीर रहते है, अतः अप्रत्याशित पंचलाईन और हास्य कहानी को प्रभावशाली बना देती है। इस फिल्म को भारत की फिल्म कहा जा सकता है, क्योंकि इससे भारत के भीतर की परिस्थितियों का चित्रण किया गया है। इस प्रकार की सार्थक और अच्छी फिल्में क्षेत्रीय भाषाओं में भी बनायी जा सकती है।
-मनु त्रिपाठीthe-raid-poster-2

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