‘भगवा आतंक’ की कहानी के पीछे थी राजनीतिक साजिश

जयपुर (विसंकें)। डॉ. प्रवीण तिवारी दो दशक से प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ टेलीविजन पत्रकार के तौर पर जुड़े हुए हैं. इस दौरान उन्होंने मीडिया, अध्यात्म और प्रेरणापरक 7 पुस्तकें लिखी हैं. ‘सत्य की खोज’ उनकी पहली पुस्तक थी, जिसे पाठकों ने बहुत पसंद किया था. इसी कड़ी में हाल ही में उनकी पुस्तक ‘आतंक से समझौता’ भी प्रकाशित हुई, जिसे उन्होंने दो वर्ष के गहन शोध के आधार पर लिखा है. यह पुस्तक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें तथ्यों के आधार पर संप्रग सरकार के दौरान चलाए गए ‘भगवा आतंक’ के जुमले की बखियां उधेड़ी गई हैं और स्पष्ट किया है कि कैसे कांग्रेस के कई नेता और तत्कालीन गृह मंत्री तक आतंकी हमलों की आड़ में ‘हिन्दुत्व’ को बदनाम करने की साजिश में लगे हुए थे. पाञ्चजन्य ने इस पुस्तक के विषय को केंद्र में रख उनसे विस्तृत बात की. बातचीत के संपादित अंश –

‘आतंक से समझौता’ जैसी पुस्तक लिखने का विचार आपके मन में कैसे आया?

देखिए, आतंकवाद लंबे समय से वैश्विक समस्या का रूप ले चुका है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह स्पष्ट तौर से देखने को मिला कि भारत में इस समस्या का न केवल घेरा बढ़ा, बल्कि देश इसकी अत्यधिक चपेट में आया. एक के बाद एक हमलों, धमाकों की गूंज ने देश के लोगों को परेशान करके रखा हुआ था. लेकिन इसी बीच एक षड्यंत्र रचा जाता है. भारतीय राजनीति में वैसे तो बहुत-सी साजिशें हुई हैं, लेकिन यह बहुत ही गंभीर षड्यंत्र था. मैं इसे इसलिए गंभीर मानता हूं कि क्योंकि आतंकवाद सिर्फ भारत की ही नहीं बल्कि दुनिया की समस्या है. मैं किसी राजनीतिक पार्टी की बात नहीं करता, लेकिन उन्हीं लोगों द्वारा जब आतंक के खिलाफ लड़ाई को कमजोर किया जाता है तो इससे बड़ा षड्यंत्र मानव मात्र के लिए हो ही नहीं सकता. लेकिन फिर भी ऐसा षड्यंत्र हमारे देश में हो रहा हो तो इससे गंभीर बात और क्या हो सकती है? इस साजिश के तहत आतंकी घटनाओं को भगवा रंग से जोड़ने की कोशिश सतत की जा रही थी. एक ऐसा रंग जिसका संबंध दूर-दूर तक आतंक से नहीं जुड़ता. लेकिन फिर भी इसके तार एक धर्म विशेष, संस्था विशेष और पार्टी विशेष से जोड़ने के कुत्सित प्रयास किए जाते हैं तो निश्चित ही यह यकीन करना पड़ता है कि कुछ लोग राजनीतिक स्वार्थ के चलते आतंक से समझौता कर रहे हैं. ऐसे में यह मुझे बहुत ही गंभीर समस्या दिखी और एक पत्रकार होने के नाते मेरी जिम्मेदारी बनती है कि इस झूठ को उघाड़कर सच को सामने लाया जाए. अब यह सच किताब रूप में सामने है.

‘भगवा आतंकवाद’ के बारे में आपने विस्तार से लिखा है. यह आपस में पूरी कहानी दर्जनों लोगों के ईदगिर्द घूमती है. आपने तथ्यों को मजबूत आधार देने के लिए कौन सी पुस्तकें खंगाली, संदर्भ कहां से जुटाए, शोध का आधार क्या रहा, जिससे आप सच को सामने लाने में कामयाब रहे?

मैं लगातार इस मसले पर बड़ी बारीकी से नजर रख रहा था. पुस्तक लिखने के शुरुआती दौर में मैंने ब्लॉग पर लिखना शुरू किया. इस दौरान मेरे सवालों का दायरा बड़ा होता गया और इससे जुड़ने वाले महत्वपूर्ण लोगों से मेरी एक के बाद एक मुलाकात होती गई. इसमें एफएसएल के पूर्व निदेशक बी.एम. मोहन भी थे, जिन्होंने मालेगांव धमाके में शामिल सिमी के सभी आतंकियों का नार्को टेस्ट किया था. इसके अलावा संयुक्त खुफिया कमेटी के पूर्व प्रमुख डॉ. बी.डी. प्रधान से भी बातचीत हुई. उन्होंने जो बताया, वह बहुत ही चौंकाने वाला था. उन्होंने कहा कि हम लादेन के बारे में अमेरिका को जानकारी दे रहे थे पर हमारे घर में किसने क्या किया, हमें इसकी जानकारी नहीं थी. लेकिन सच में ऐसा था नहीं. इसी तरह कई खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों, खुफिया पत्रकारों, अधिवक्ताओं, तमाम पत्र-पत्रिकाओं के संदर्भ के साथ कई लोगों के साक्षात्कार से यह प्रामाणिक पुस्तक पूर्ण हुई. इसमें मैंने यह बताने की कोशिश की है कि कथित ‘भगवा आतंक’ शब्द जो खोज निकाला गया, वह पूर्णत: राजनीति से प्रेरित और इतना खतरनाक है कि इसे वैश्विक आतंकवाद से समझौता करने जैसा कदम कहा जाए तो गलत नहीं होगा.

समझौता धमाके को कथित भगवा आतंक से जोड़ा गया, लेकिन अब सच सामने आ रहा है और जिन्हें फंसाया गया था वे निर्दोष साबित हो गए हैं. क्या कहेंगे इस पर?

जब ये लोग निर्दोष साबित नहीं हुए थे, तभी मैंने यह बात कही थी कि ऐसा होगा. दरअसल आपको यह देखना होगा कि इस पूरे मामले का आधार क्या है. आप किसी एक व्यक्ति को पकड़कर जज के सामने उसका बयान कराते हैं और उस के आधार पर पूरे षड्यंत्र की रचना करते हुए पूरी कहानी गढ़ते हैं. कथित ‘भगवा आतंक’ की कहानी क्या है? स्वामी असीमानंद ने जज के सामने जो एक बयान दिया था. यह बयान न्यायालय में जज के सामने दिया गया, लेकिन इसे जमकर प्रचारित किया गया. इसके पीछे की मंशा स्पष्ट थी कि इसे अपने लोगों के जरिए मीडिया में चलाया जाए और ‘भगवा आतंक’ की थ्योरी को पुष्ट किया जाए. इस साजिश का मैंने पुस्तक में विस्तार से खुलासा किया है. लेकिन वहीं दूसरी ओर आतंकवादियों के सारे सबूत मिलने के बाद भी उन्हें नजरअंदाज किया गया और मात्र एक बयान को आधार बनाकर पूरी कहानी गढ़ दी गई. मेरा मानना है कि यह बहुत बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र था.

तत्कालीन गृह मंत्री पी.चिदंबरम ने हिन्दू आतंकवाद का जुमला उछाला, फिर राहुल गांधी द्वारा यह कहा जाना कि इस्लामिक आतंकवाद से ज्यादा बड़ी चुनौती ‘हिन्दू आतंकवाद’ है. इसी तरह सुशील शिंदे, दिग्विजय सिंह द्वारा लगातार ‘भगवा आतंक’ की थ्योरी गढ़ने के पीछे क्या वजह रही? क्या अपने स्वार्थ के लिए समाजहित, धर्महित, देशहित सब पीछे हो जाते हैं इनके लिए?

देखिए, आपने जितने लोगों के नाम लिए हैं, उनके जीवन, जीवन का उद्देश्य क्या है और वे कितनी समाज में अपनी भागीदारी दे पाए हैं, उस पर गौर करना होगा. कुर्सी के लालच में, यह उनकी मजबूरी बन जाती है कि वे साम, दाम, दंड, भेद करते हुए अपने आलाकमान की स्वार्थ सिद्धियों में लगे रहें. ये रात दिन इस उधेड़बुन में लगे रहते हैं कि भाजपा और उसकी समर्थित संस्थाओं को कमजोर करने के लिए क्या कर सकते हैं. क्योंकि सत्ताधारी दल नीति पर बात नहीं कर सकता क्योंकि नीति वह खुद ही बनाता है.

इसलिए विपक्षी पार्टी की जड़ को कमजोर करने के लिए हमला करता है. देश में शुरुआत से ही भाजपा और सहयोगी संस्थाओं को सनातन व्यवस्था से जोड़कर देखा जाता रहा है. उस समय कांग्रेस के नेताओं के बीच गृह मंत्रालय को लेकर खींचतान जारी थी. इस कतार में जो बड़े चेहरे सामने आए उनमें शिवराज पाटिल, सुशील कुमार शिंदे, पी. चिदंबरम शामिल थे. उस समय दिग्विजय सिंह को कोई महत्वपूर्ण पद नहीं मिला. लेकिन बावजूद इसके वे लगातार हिन्दुओं पर प्रहार करते रहे और मुस्लिमों का समर्थन करते हुए इतने मदहोश हो गए कि कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन को ‘जी’ तक कहते सुने गए. दरअसल उस समय इनके बीच प्रतिस्पर्धा थी कि कौन हिन्दुत्व पर सबसे तीखा प्रहार करेगा, उसे महत्वपूर्ण पद दिया जाएगा. इसमें पी. चिदंम्बम ने सारी हदें पार कीं थीं.

कथित हिंदू आतंकवाद के नाम पर साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित, स्वामी असीमानंद को गिरफ्तार किया गया, असहनीय प्रताड़ना दी गईं, जिन्हें अब न्याय मिल रहा है और निर्दोष साबित हो रहे हैं. क्या उस समय महाराष्ट्र पुलिस, एटीएस, एनआईए सहित अन्य खुफिया एजेंसी महज कांग्रेस सरकार की कठपुतली बन कर रह गई थीं और दवाब में काम कर रही थीं?

यह बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है और आप विश्वास करें, जब इस पुस्तक के प्रकाशित होने की खबर साध्वी प्रज्ञा जी को मिली तो उन्होंने रुंधे गले से कहा कि किसी ने तो मेरी बात रखी. वे कैंसर से पीडि़त रही हैं. रीढ़ की हड्डी टूट गई. यह सब इस देश में एक निर्दोष महिला के साथ हुआ. इसमें यह निश्चित ही कहना होगा कि जिसके हाथ में शासन था, हम-सब की सुरक्षा का दायित्व था, अगर उन लोगों द्वारा इस तरह का अत्याचार-अनाचार किया जाता है तो मैं समझता हूं कि इससे गंभीर और कोई मसला नहीं हो सकता. दूसरी बात, आपने जिन-जिन एजेंसियों के नाम लिए हैं वे बहुत ही छोटी कड़ी हैं, इस मामले की, असल खेल तो कहीं और से चल रहा था. कथित ‘भगवा आतंक’ के जुमले को बहुत ही ‘सुनियोजित तरीके’ से एक षड्यंत्र का रूप दिया गया था. कांग्रेस के बड़े नेताओं में शुमार – पी. चिदंबरम, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी कानून के बड़े जानकारों में जाने जाते हैं, लेकिन इसमें किसकी क्या भूमिका रही थी, यह कहना कठिन है. लेकिन कानूनी तौर पर इस मामले को मजबूत करके बहुत अच्छे तरीके से रखा जाए, इसके पूरे प्रयास किए गए. रही बात एजेंसियों के दवाब की तो इस पूरे मामले में एटीएस की जितनी भी कहानी थी उसमें पाएंगे कि यह मालेगांव हमला सिमी के आतंकियों ने किया. एजेंसी फिर कहती है कि ‘हिन्दू आतंकियों’ ने. उसके बाद एनआईए की जांच से साफ होता है कि एटीएस की जांच में कई खामियां हैं. इस मामले मैं इतना कहना चाहता हूं कि आजादी के बाद का सबसे बड़ा षड्यंत्र अगर कुछ था तो ‘हिन्दू आतंकवाद’ के जुमले को उछालना. आज जब दुनिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जा-जाकर यह कह रहे हैं कि आतंकवाद की जड़ें पाकिस्तान में हैं तो पिछले दिनों राहुल गांधी कहते थे कि देश में सबसे बड़ा खतरा ‘हिन्दू आतंकवाद’ है. ऐसे में सवाल उठता है कि यह आतंकवाद से समझौता नहीं तो क्या है? दरअसल इस साजिश को इतने अच्छे से अंजाम दिया गया था कि अगर 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार न आती तो ‘भगवा आतंक’ को स्थापित कर दिया जाता और सच झूठ बन जाता और झूठ सच हो जाता. सौ में से 99 आतंकी मुस्लिम ही होते हैं.

लेकिन जो ‘भगवा आतंक’ के जुमले गढ़ते रहे वे कभी मुस्लिम आतंक कहते न तो दिखाई देते हैं और न ही सुनाई. उलटे यही सेकुलर तब यह कहते सुने जाते हैं कि आतंक का कोई ‘मजहब’ नहीं होता. क्या कहेंगे इस पर?

यह बड़ा ही संवेदनशील सवाल है. देखिए जो सच है वह सबके सामने है. दूसरी बात, मैं एक आध्यात्मिक परिवार से आता हूं और सनातन परंपरा में मेरी निष्ठा-आस्था है. मुझे बचपन से स्वामी विवेकानंद जी के बारे में जो जानने को मिला है, उसके मुताबिक हर मत-पंथ का सम्मान करना है. मैं उन्हें अपना पुरखा मानता हूं, इसलिए उनकी बात भी मानता हूं. लेकिन गंभीर बात यह कि जन्म लेने के बाद बच्चे को क्या सिखाया जाता है? उसमें क्या संस्कार डाले जाते हैं? सनातन व्यवस्था ऐसी है कि यहां प्रत्येक के लिए संस्कृति, सांस्कृतिक विरासत और एक अनुशासन है. इसमें अनेक मत-मतांतर हैं, लेकिन जब बात राष्ट्रीयता की आती है तो सबकी भावना समान होती है. दूसरी ओर अन्य जगह हमें यह देखना होगा कि सनातन परंपरा का अनुपालन कहां हो रहा है और कहां अनदेखी? मेरा मानना है कि सर्वधर्म समभाव, सर्वे भवन्तु सुखिन: और वसुधैव कुटुंबकम् जैसी अवधारणा जो सबको प्रेम करना सिखाती है, सबके सुख की कामना करती है, की अनदेखी जहां पर भी होगी, वहां-वहां पर आतंक पनपेगा, आतंकी बनेंगे.

एक दौर ऐसा भी रहा जब पत्र-पत्रिकाओं, टीवी मीडिया और चुनिंदा समाचार पत्रों में ‘एक्सक्लूसिव’ खबरों के नाम पर कथित भगवा आतंक को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा था.

आप मुख्य धारा मीडिया के अंग रहे हैं और उस समय की खबरों को आपने नजदीक से देखा है. इस साजिश को आप कैसे देखते हैं?

मैंने पूरा का पूरा एक अध्याय तहलका, कारवां और कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं की उस समय की रिपोर्टिंग को केंद्रित करते लिखा है. चूंकि मैं पत्रकार हूं तो कोई भी बात बड़ी जिम्मेदारी के साथ रखूंगा. मैंने वही लिखा जिसके प्रमाण मेरे पास हैं. आज जो लोग सवाल कर रहे हैं कि मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो रहा है, वही प्रश्न उन लोगों ने उस समय क्यों नहीं उठाए, जब कुछ लोगों द्वारा मीडिया में बड़ी ही प्रमुखता के आधार पर ‘भगवा आतंकवाद’ को कही-सुनी बातों के आधार पर प्रचारित किया जा रहा था. यकीनन उस समय मीडिया का इस्तेमाल सार्वजनिक रूप से किया गया. कौन था जो उस समय मीडिया के चुनिंदा लोगों को सूचनाएं दे रहा था? एनआईए और एटीएस के महत्वपूर्ण दस्तावेज, जो बिल्कुल गोपनीय थे, वे मीडिया को किसने उपलब्ध कराए? ये तमाम सवाल साफ कहते हैं कि कहीं न कहीं सरकारी एजेंसियां इसके लिए जिम्मेदार थीं, जो सीधे-सीधे एक राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने का काम कर रही थीं.

भगवा आतंक को लक्षित करते हुए उस समय की सरकार और एजेंसियों का असल निशाना क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ था?

बिल्कुल, संघ ही लक्ष्य था. इसके ऊपर मेरी किताब में पूरा एक खंड है. छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं के जरिए संघ के बड़े अधिकारियों तक पहुंचना इस साजिश का हिस्सा था. इसके जरिए वह संघ के बारे में यह स्थापित करना चाहते थे कि संघ अतिवादियों-आतंकियों को प्रशिक्षण देता है. कांग्रेस के बड़े नेता और तत्कालीन गृह मंत्री सुशील शिंदे ने तो खुद कहा था कि संघ आतंकियों को प्रशिक्षण देता है. ऐसा नहीं था कि यह बयान कोई ऐसे ही आया हो, यह एक साजिश का हिस्सा था. इसकी गंभीरता को समझने की आवश्यकता है. वह संघ को कठघरे में खड़ा कर संघ के बड़े अधिकारियों को इस साजिश का हिस्सा बनाना चाहते थे और इसकी भरसक कोशिश भी की. और इसी साजिश को देखते हुए संघ को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक जाना पड़ा और उन्होंने स्वतंत्र जांच की मांग करनी पड़ी.

मुंबई एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे की आतंकी हमले में हुई मौत को ‘भगवा आतंकियों’ की एक साजिश से जोड़ने की कोशिश की गई थी. क्या यह साजिश प्रशासन, खुफिया एजेंसियों और पुलिस अधिकारियों के मन में हिन्दुओं के प्रति घृणा का भाव पैदा करने और फांक डालने का प्रयास थी?

निश्चित तौर पर यह कह सकते हैं. कथित पत्रकार अजीज बर्नी ने ’26/11 आरएसएस की साजिश’ पुस्तक लिखी थी, जिसका विमोचन कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने किया था. जबकि उस समय अमेरिका तक बता रहा था कि मुंबई हमले में शामिल आतंकवादी कहां से आए और कौन थे. फिर भी ऐसी पुस्तकें लिखी जाती हैं और छप भी जाती हैं. इस पुस्तक के शीर्षक से ही समझिए कि यह देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की इंतिहां ही तो है कि कोई कुछ भी कहकर निकल लेता है. और यही लोग आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह उठाते हैं. उन्होंने ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की शुरुआत की थी. मुझे लगता हैं कि आतंक से समझौता जो पिछले समय किया गया, उसने सिर्फ एक साजिश को ही रूप नहीं दिया, सोच में भी अभद्रता को भर दिया है. यह सोच इतनी घटिया कर दी गई कि एक तबके द्वारा पुलवामा जैसे हमले के बाद राष्ट्रीय महत्व की चीजों पर भी ओछी टिप्पणी देखने को मिलती है.

तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने एनआईए को सिमी के आतंकियों की जमानत का विरोध न करने को कहा था. यानी आतंकी संगठन सिमी पर नरमी और हिन्दू साधु-संन्यासियों पर सख्ती! इस मसले को आप कैसे देखते हैं?

यह सच है कि चिदंबरम ने एनआईए को बिल्कुल मना किया था कि हम इन आतंकियों की जमानत का विरोध नहीं करें. लेकिन इसकी कोई ठोस वजह उन्होंने सामने नहीं रखी. यही वह तुष्टीकरण था, जिससे हिन्दू-मुस्लिम में भेद पैदा हुआ. यह कोशिश पिछली सरकार से शुरू हो गयी थी. लेकिन इन्हीं लोगों द्वारा आज कहा जा रहा है कि सांप्रदायिक सौहार्द खराब हो रहा है. निश्चित रूप से सांप्रदायिक सौहार्द खराब हो रहा है, लेकिन इसकी जड़ों को सींचने का काम किसने किया? इन्होंने ही मुस्लिम समाज को कमजोर बनाया. उनके अंदर भय पैदा किया. उनके सामने गलत तस्वीरें रखीं. उनमें डर भरा कि वह असुरिक्षत हैं. और फिर आतंक से समझौता करके हमदर्दी जतानी चाही और राजनीतिक तुष्टीकरण करके हित साधे गए. यह कितनी महत्वपूर्ण बात है कि जिस सिमी को आपने प्रतिबंधित कर रखा है, उसी सिमी के आतंकियों की रिहाई का विरोध नहीं कर रहे हैं? इससे बड़ा गंभीर मसला और क्या हो सकता है. जबकि उनके खिलाफ सारे सबूत सामने हैं. यकीनन इससे यही समझ में आता है कि यह बहुत बड़ी राजनीतिक साजिश थी, जिसे स्थापित करने का असफल प्रयास किया गया और सच अब देश के सामने आ गया है.

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