आखिर किस गलती की सजा भुगत रहे हैं जम्मू-कश्मीर के वाल्मिीकि

इसे भारतीय लोकतंत्र की विडंबना ही कहा जाएगा कि एक ओर तो पूरा भारत बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर उन्हें श्रद्धा और आदर के साथ याद करके वंचित समाज के प्रति न्याय करने के अपने संकल्प को दोहराता है. लेकिन दूसरी ओर इसी लोकतंत्र के एक राज्य जम्मू कश्मीर में वाल्मीकि समाज के साथ छह दशक से चले आ रहे अन्याय की ओर आंखें भी मूंदे रहता है.

पूरे भारत में जम्मू-कश्मीर अकेला ऐसा राज्य है, जहां ‘370’ और ‘35-ए’ जैसे कानूनों के नाम पर अपने वाल्मीकि समाज के साथ ऐसा बर्ताव होता है. नई दिल्ली के जेएनयू में ‘भारत के टुकड़े-टुकड़े’ करने की धुन पर नाचने वाली और हैदराबाद में वेमुला की आत्महत्या पर घड़ियाली आंसू बहाने वाली तथाकथित ‘प्रगतिशील’ बिरादरी के पास जम्मू-कश्मीर के अलगाववादियों, पत्थरबाजों और आतंकवादियों को सरकारी नौकरियां दिलाने के लिए शोर मचाने का पूरा उत्साह है. लेकिन वे बाकी हिन्दुस्तान के लोगों के कानों तक जम्मू के वाल्मीकि समुदाय पर होने वाले सरकारी अत्याचार की खबर नहीं पहुंचने देना चाहते.

वाल्मीकि समुदाय के यहां बच्चा पैदा होता है तो उस एक ठप्पा होता है कि वह जीवनभर सफाई कर्मचारी ही रहेगा, यदि वह और कोई व्यवसाय करता है तो उसे वहां की नागरिकता से हाथ धोना पड़ता है. उसे जम्मू कश्मीर में सफाई कर्मचारी वाली नौकरी के अलावा कोई और नौकरी पाने का अधिकार नहीं है. कोई वाल्मीकि युवा अपनी लगन और मेहनत के बूते पर चंडीगढ़ या दिल्ली से अगर एमबीए या एमबीबीएस की डिग्री भी ले आए तो उसे जम्मू कश्मीर सरकार में मेहतर की नौकरी के अलावा किसी और पद के लिए आवेदन करने का भी अधिकार नहीं है.

1956 में जम्मू कश्मीर में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल से तंग आए जम्मू-कश्मीर के ‘प्रधानमंत्री’ रहे शेख अब्दुल्ला वाल्मिीकि समुदाय के लोगों को पंजाब से इस वायदे के साथ अपने राज्य में लाए थे कि अच्छे वेतन के अलावा उन्हें राज्य की नागरिकता और सारे अधिकार दिए जाएंगे. 62 साल बीत गए, लेकिन आज भी इस समाज के लोगों को जम्मू कश्मीर की नागरिकता नहीं दी गई. यही कारण है कि भारत के सौ-टका नागरिक होने के बावजूद ‘धारा-370’ और ‘35-ए’ जैसे अमानवीय और ‘विशेष दर्जा’ तथा ‘स्वायतत्ता’ जैसे जुमलों की आड़ में जम्मू-कश्मीर सरकार उन्हें लोकसभा के लिए वोट देने का हक तो देती है, लेकिन वे विधान सभा या पंचायत के लिए न तो वोट डाल सकते हैं और न चुनाव लड़ सकते हैं. सिर्फ इतना ही नहीं, जम्मू-कश्मीर में ‘गैर नागरिक’ होने के कारण उनके बच्चे ऊंची शिक्षा के लिए दाखिला भी नहीं ले सकते. अगर वे किसी दूसरे राज्य से डिग्री ले भी आएं तो वे छोटे स्तर की सरकारी नौकरी के लिए आवेदन भी नहीं कर सकते. उन्हें अपने घर के लिए जमीन खरीदने या फिर राज्य की किसी कॉपरेटिव सोसायटी का सदस्य बनने और सहकारी बैंक से उधार लेने का हक भी नहीं है. यहां तक कि अनुसूचित जाति को मिलने वाले ऐसे प्रत्येक हक और सुविधा से वे वंचित हैं जो शेष भारत में इस समाज को हासिल है. एक ऐसे देश में जहां के एक राज्य में वंचित समाज पर सरकारी स्तर पर खुल्लम-खुल्ला अन्याय हो रहा हो, क्या वहां हम बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे महापुरुष का जन्मदिन या परिनिर्वाण दिवस मनाते हुए ईमानदारी का दावा कर सकते हैं?

लेखक – विजय क्रांति

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