पश्चिम बंगाल में बिलख रहे हैं हिन्दू

इसमें दो राय नहीं है कि ममता बनर्जी के राज में पश्चिम बंगाल में सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों के लिए नीतियां बनती हैं और उनके कार्यान्वयन के लिए किसी पर गोली भी चलाई जा सकती है. यदि गोली से मरने वाला हिन्दू हो तो पुलिस का बाल भी बांका नहीं होता. यही नहीं, देश के कथित सेकुलर राजनीतिक दल बंगाल में किसी हिन्दू के मरने पर ऐसे मुंह सिल लेते हैं मानो मरने वाला इंसान ही न हो. एक बात और जो नेता या कथित बुद्धिजीवी रोहित वेमूला की कथित हत्या पर चिल्ला रहे थे, ‘देश में अनुसूचित जाति पर अत्याचार बढ़ गए हैं’, वे बंगाल में अनुसूचित जाति के युवकों की हत्या पर ऐसे चुप्पी साधे हैं, मानो बंगाल में जो हो रहा है, वह विधि का विधान है.

पिछले दिनों उत्तरी दिनाजपुर जिले के इस्लामपुर में घटी घटना से तो ऐसा ही लगता है. यहां दो हिन्दू युवकों राजेश सरकार और तापस बर्मन (दोनों अनुसूचित जाति वर्ग के थे) को केवल इसलिए गोली मार दी गई कि वे भीड़ द्वारा अपमानित की जा रहीं अपनी बहनों को बचा रहे थे.

इस्लामपुर के समीप धारिवित विद्यालय में बांग्ला भाषा के शिक्षक की नियुक्ति की मांग को लेकर अनेक छात्र प्रदर्शन कर रहे थे. उक्त प्रदर्शन के बगल में आसपास में रहने वाले लोग भी खड़े थे. उनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी थीं. हो-हल्ला सुनकर इन दोनों युवकों की बहनें भी आई थीं. इसी बीच भीड़ में शामिल कुछ नकाबपोश लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करने लगे. राजेश और तापस ने उनकी इस हरकत का विरोध किया. तभी भीड़ से गोली चली और राजेश और तापस बुरी तरह घायल हो गए. बाद में दोनों की मृत्यु हो गई. तापस की मौत तो बहुत ही दर्दनाक तरीके से हुई. जब उन्हें घायलावस्था में गाड़ी से अस्पताल ले जाया जा रहा था, तब रास्ते में एक मुस्लिम-बहुल गांव गोलापाड़ा में उन्हें जबरन गाड़ी रोककर उतार लिया गया और बुरी तरह पीटा गया. बाद में उनकी मौत हो गई. आश्चर्य तो यह है कि राज्य सरकार ऐसी हैवानियत करने वालों के साथ डटकर खड़ी है.

अब थोड़ा पीछे लौटें. धारिवित विद्यालय जहां है, वह हिन्दू-बहुल क्षेत्र है. यहां पढ़ने वाले छात्रों में 90 प्रतिशत हिन्दू हैं. यहां उर्दू पढ़ने वाले छात्र बहुत ही कम हैं. विद्यालय में अनेक वर्ष से विभिन्न विषयों के शिक्षकों की कमी है. बांग्ला भाषा के शिक्षक की तो यहां कई साल से मांग की जा रही है.

सन् 2011 से इस विद्यालय में एक भी शिक्षक की नियुक्ति नहीं हुई है. लेकिन इस मांग पर कभी ध्यान नहीं दिया गया. उलटे नियमों को ताक पर रखकर बांग्ला की जगह उर्दू के दो शिक्षकों की नियुक्ति कर दी गई. इस कारण यहां के लोगों में सरकार के प्रति गुस्सा बढ़ा और लोग विरोध में सड़कों पर उतर आए. बाद में यह मामला इतना बढ़ा कि इसने दो युवकों की बलि ले ली.

18 सितंबर को बात उस समय और बढ़ गई जब विद्यालय सेवा आयोग, पश्चिम बंगाल द्वारा नियुक्त उर्दू के दो और संस्कृत का एक शिक्षक में अपनी सेवाएं शुरु करने धारिवित विद्यालय पहुंचे. वहां के छात्रों ने कहा कि जब यहां उर्दू के शिक्षकों की जरूरत ही नहीं है तब फिर इनकी नियुक्ति यहां क्यों की गई? और वे लोग विरोध प्रदर्शन करने लगे.

स्थिति को देखते हुए शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों की देखरेख में विद्यालय की प्रबंधन समिति और प्रधानाध्यापक ने एक बैठक कर निर्णय लिया कि यहां नवनियुक्त उर्दू शिक्षकों की ज्वाइनिंग को स्वीकार नहीं किया जाएगा और उनकी जगह बांग्ला भाषा के शिक्षक नियुक्त किए जाएंगे. दूसरे दिन 19 सितंबर को विद्यालय में पढ़ाई भी हुई. उस दिन सब कुछ सामान्य रहा. लेकिन कुछ लोगों को यह शांति पसंद नहीं आई. उनमें से एक स्थानीय विधायक और राज्य सरकार में पंचायत एवं ग्राम विकास राज्यमंत्री गुलाम रब्बानी हैं. उन्होंने इस मामले को नाक का सवाल बना लिया. उन्होंने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए शिक्षा विभाग के अधिकारियों को प्रभाव में ले लिया और उर्दू शिक्षकों को उसी विद्यालय में योगदान कराने के लिए खुद ही भाग-दौड़ शुरू कर दी. यह भी कहा जाता है कि इसके लिए उन्होंने पुलिस को भी अपने प्रभाव में ले लिया.

नतीजा यह हुआ कि 20 सितंबर को उर्दू के दोनों नवनियुक्त शिक्षक भारी पुलिस बल के साथ विद्यालय में पढ़ाने पहुंचे. लिहाजा वहां मौजूद छात्रों ने उनका विरोध किया. इसी बीच पुलिस और छात्रों के बीच संघर्ष हो गया. एक ओर यह संघर्ष हो रहा था, तो दूसरी ओर पुलिस के साथ आए कुछ नकाबपोश लोगों ने वहां मौजूद महिलाओं के साथ बदतमीजी शुरू कर दी. इसके बाद जो हुआ, वह सबके सामने है. दो होनहार युवकों, राजेश और तापस की जान चली गई. राजेश सरकार की बहन, जो इस घटना की प्रत्यक्षदर्शी हैं, कहती हैं, ”पुलिस की गोली से मेरे भाई राजेश सरकार की मौत हुई है.”

यदि समय पर इलाज हो जाता तो पुलिस की गोली से बुरी तरह घयल तापस बर्मन की जान बच सकती थी, लेकिन उनके साथ जो हुआ, वह बहुत ही चिंताजनक और दु:खद है. दुर्भाग्य तो यह रहा कि पुलिस ने तापस को बचाने की रत्तीभर कोशिश नहीं की. इसलिए उसकी मौत हो गई.

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने इस घटना के विरोध में 25 सितंबर को मार्च निकाला. पुलिस ने अनेक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया और उनके साथ मारपीट की. कट्टरवादी तत्वों ने कई जगह पुलिस के सामने अभाविप के कार्यकर्ताओं को पीटा, लेकिन उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हुई.

उसके दूसरे दिन यानी 26 सितंबर को बंगाल बंद रहा. भाजपा और कुछ अन्य समविचारी संगठनों ने इस बंद का आह्वान किया था. टी.एम.सी. के नेताओं ने इसके विरोध में गुंडागर्दी की और भाजपा के कार्यकर्ताओं को सरेआम पीटा. टी.एम.सी. नेता असदुज्जमां ने भाजपा की एक महिला कार्यकर्ता की पीठ पर लात मार कर उन्हें गिरा दिया. दरअसल, बंद के असर को देखते हुए टी.एम.सी. के कार्यकर्ता आपा खो बैठे. इस पर बंगाल के लोगों का कहना है कि यदि टी.एम.सी. के नेता और कार्यकर्ता नहीं सुधरे तो आने वाले समय में उन्हें वहां की जनता सुधार देगी.

इस पूरे मामले में राज्य सरकार में मंत्री गुलाम रब्बानी की भूमिका संदिग्ध नजर आती है. लोग यह कहते सुने गए कि वे ‘सरकार’ हैं और इसलिए वे कुछ भी करें, उनका कुछ नहीं बिगडे़गा. उनका बाल तक बांका नहीं होगा. अभाविप ने इस घटना की जांच सी.बी.आई. से कराने की मांग की है. इसके साथ ही दोनों मृतकों के परिवार वालों को मुआवजा देने की भी मांग की है. अब इन मांगों पर ममता बनर्जी कब और कितना ध्यान देती हैं, यह देखने वाली बात है.

एक बात और सामने आई है कि रब्बानी उर्दूभाषी नेता हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में अधिकांश मुसलमान बांग्ला बोलते हैं. यह भी पता चला है कि विद्यालय की प्रबंधन समिति में टी.एम.सी. के एक अन्य विधायक कन्हैयालाल अग्रवाल का भी प्रभाव है. लोगों का कहना है कि रब्बानी और अग्रवाल ने मिलकर विद्यालय की प्रबंधन समिति पर दबाव डाला और मोहम्मद सनाउल्ला और एक अन्य व्यक्ति को उर्दू शिक्षक नियुक्त किया गया. यह भी चर्चा है कि ये दोनों शिक्षक रब्बानी के रिश्तेदार हैं. यानी रब्बानी ने सारे नियम-कायदों को ताक पर रखकर अपने रिश्तेदारों को शिक्षक नियुक्त करवा लिया. इस कारण स्थानीय लोगों में गुस्सा है. आंदोलन की एक वजह यह भी थी.

अब बात इस्लामपुर की. यहां का जनसांख्यिक संतुलन बहुत नाजुक है. इस्लामपुर की सीमा एक तरफ बिहार (किशनगंज जिले) से जुड़ी हुई है, तो दूसरी तरफ बांग्लादेश से. सन् 1953 में इस्लामपुर को बिहार से जबदस्ती बंगाल प्रांत में मिला दिया गया था. 60 के दशक में यहां पर बांग्ला भाषा के लिए एक बड़ा आंदोलन हुआ था. उसमें एक व्यक्ति की जान भी गई थी. अगर गहराई से देखें तो इस्लामपुर का आंदोलन चाहे पुराना हो या नया, दोनों में एक सांस्कृतिक लड़ाई की झलक मिलती है. छल-बल से बांग्ला के स्थान पर उर्दू थोपने के विरुद्ध उठी इस आवाज की गूंज दूर-दूर तक सुनाई दे रही है.

यह घटना राज्य सरकार की रीति-नीति गंभीर प्रश्न-चिह्न खड़ा करती है. यह ममता सरकार की तानाशाही और तुष्टीकरण का मामला भी है. जब से यह सरकार सत्ता में आई है तब से मुस्लिम-परस्त नीतियों को आगे बढ़ा रही है. उनके लिए अलग से विश्वविद्यालय तक खोले गए. उदाहरणार्थ अलिया विश्वविद्यालय को ले सकते हैं. इसका संचालन राज्य सरकार करती है. इसमें मुसलमान छात्रों को आवास और भोजन मुफ्त में मिलता है. इस्लामपुर की घटना से एक बात साफ तौर पर साबित हो रही है कि राज्य की ममता सरकार तुष्टीकरण की सारी हदें पार कर चुकी है.

साभार – पाञ्चजन्य

 

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