राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष : अयोध्या आंदोलन – 13

राष्ट्र की अस्मिता : ‘शौर्य दिवस’

06 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर बने एक जर्जर ढांचे को भारत के राष्ट्रीय स्वाभिमान पर एक विदेशी आक्रांता द्वारा लगाया गया कलंक का टीका मानकर लाखों कारसेवकों की भीड़ ने इस कलंक को मिटा दिया. यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि श्रीराम जन्मभूमि को मुक्त करवाने का यह 78वां प्रयास था. इस दिन को कुछ लोगों ने शौर्य दिवस कहा तो कुछ लोगों ने शर्म का दिन करार कर दिया.

एक ओर कुछ नेताओं के बयान आए कि विदेशी हमलावर बाबर के सेनापति मीरबांकी द्वारा राम मंदिर को तोड़कर उसी की नींव पर, उसी के मलबे से बनाए गए ढांचे को गिराकर कारसेवकों ने भारत माता के भाल पर लगे धब्बे को सरयु नदी के पानी से धो डाला. अब किसी दूसरे बाबर की हिम्मत नहीं होगी कि फिर से भारतीय अस्मिता पर चोट कर सके.

कारसेवकों ने ढांचा गिराने के पूर्व वहां से रामलला की मूर्ति को हटाया और फिर ढांचा गिर जाने के पश्चात उस स्थान को सरयु नदी के जल से पवित्र किया. पुनः श्रीराम लला की मूर्ति स्थापति की गई. इसकी सुरक्षा के लिए टीन और कपड़े का मंदिर बना दिया. मुख्य पुजारी ने पूजा अर्चना की, प्रसाद बांटा गया, जिसे सभी कारसेवकों सहित वहां उपस्थित सुरक्षाकर्मियों और सरकारी अधिकारियों ने भी ग्रहण किया. यह राष्ट्र के स्वाभिमान का प्रकटीकरण था.

ढांचे के मलबे से छोटी-छोटी मूर्तियों, टूटे खम्भों और भित्ति चित्रों के रूप में मंदिर के जो सबूत मिले, यही सबूत बाद में हुई खुदाइयों और कई भूगर्भशास्त्रियों के प्रयासों का आधार बने. उल्लेखनीय है कि कारसेवकों द्वारा एकत्रित किये गए इन सबूतों को बाकायदा न्यायालय के आदेश से सुरक्षित रखा गया है और न्यायालय के ही निर्णय से कारसेवकों द्वारा बनाए गए टीन और कपड़े के मंदिर को सरकारी सुरक्षा प्रदान की गई है. अतः इस मंदिर को सरकार समेत सभी भारतीयों की मान्यता प्राप्त हुई है.

रामभक्त कारसेवकों द्वारा गिराए गए ढांचे के बाद प्राप्त हुए मंदिर के प्रारम्भिक सबूतों ने ही बाद की न्यायिक प्रक्रिया को गति प्रदान की. पिछले कई दशकों से अत्यंत धीमी गति से सरक रही न्यायिक प्रक्रिया तेज हुई और सरकारें भी हरकत में आईं. वार्तालापों, समझौतों और सबूतों के आदान-प्रदान का सिलसिला तेज हुआ. उच्च न्यायालय में तेज हुई कानूनी कार्यवाही में रामजन्मभूमि के पक्षकारों ने ढेरों साक्ष्य प्रस्तुत किए जो पुरातात्विक तथ्यों पर आधारित थे. ढांचा गिरने के बाद मिले मंदिर के सबूतों का भी न्यायालय ने संज्ञान लिया. न्यायालय ने एक विश्व विख्यात कम्पनी टोजो इंटरनेशनल को सच्चाई जानने के लिए ग्राउंड पैनिट्रेटिंग राडार सर्वेक्षण करने की जिम्मेदारी सौंपी. इस कम्पनी द्वारा शुरु किए गए सर्वेक्षण में जापान, कोरिया और कनाडा के कई बड़े भूगर्भ शास्त्री भी शामिल हुए.

ढांचे के नीचे कोई बड़ा भवन होने के संकेत सामने आ गए. इन्हीं संकेतों के मद्देनजर न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को ढांचे के नीचे के धरातल के उत्खनन का आदेश दे दिया. उत्खनन की कार्यवाही होते ही श्रीराम मंदिर के खम्भे, फर्श, ईंट इत्यादि प्राप्त हो गए. सर्वविदित है कि 1993 में राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय से जानकारी मांगी थी कि ढांचे वाले स्थान पर 1528 के पूर्व कभी कोई मंदिर था? भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर दे दिया कि ढांचे के नीचे एक भव्य मंदिर था.

अयोध्या मामले की सुनवाई करने वाली इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने इसी रपट को मुख्य आधार बनाते हुए अपने फैसले को तैयार किया था. पीठ में शामिल तीनों ही न्यायधीशों एस.यू.खान, सुधीर अग्रवाल और धर्मवीर शर्मा ने सर्वसम्मत राय से निर्णय देते हुए माना है कि वर्तमान में रामलला जहां मौजूद हैं, वही उनका जन्मस्थान है. निर्णय में तो यहां तक भी कहा गया कि जहां प्रभु राम के बाल स्वरूप की पूजा होती आई है, वह पूरी भूमि देवतुल्य है. तथाकथित बाबरी ढांचा हिन्दुओं के मंदिर तो तोड़कर बनाया गया था.

न्यायालय ने अपने फैसले में यह तथ्य भी उजागर कर दिया कि कथित बाबरी ढांचा मस्जिद नहीं था. मुस्लिम मतानुसार किसी भी प्रकार की विवादित जगह पर अदा की गई नमाज को खुदा स्वीकार नहीं करता. फिर इस स्थान पर तो पहले दूसरा धर्मस्थल था और उसे बचाने के लिए लाखों हिन्दुओं का खून बहा था. मुसलमान विद्वान इस ढांचे को मस्जिद इसलिए नहीं मानते थे क्योंकि इसमें इस्लामिक उसूलों को दफन किया गया था. हिन्दुओं ने इसे आज तक मस्जिद इसलिए नहीं माना क्योंकि जहां गर्भगृह है, वहीं राम का जन्मस्थान था.

जब हिन्दू और मुसलमान विद्वान उत्खनन में मिले सबूत, ऐतिहासिक दस्तावेज और अब न्यायालय का फैसला गिराए गए ढांचे को मस्जिद ही नहीं मानते तो फिर यह शोर क्यों मचाया जाता है कि कारसेवकों ने ‘मस्जिद’ गिरा दी. कारसेवकों ने जिस ढांचे को गिराया था वह मुसलमानों का पूजा स्थल था ही नहीं.

स्पष्ट है कि एक विदेशी हमलावर द्वारा राममंदिर तोड़कर उस पर चढ़ाया गया ढांचा गिर जाने का दिन राष्ट्रीय स्वाभिमान की विजय का दिन है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी अपने फैसले में अयोध्या आंदोलन और कारसेवकों के शौर्य की सार्थकता पर कानूनी मोहर लगा दी. राष्ट्र के हित में अब यही है कि मुस्लिम वोटों के लोभी, समाजवादी, साम्यवादी, अन्य सेकुलर दल और कांग्रेस के नेताओं सहित सभी कट्टरपंथी मुस्लिम राजनीतिक नेता भी अपनी मजहबी संकीर्णता को अपने घर की चारदीवारी तक ही रखें, ताकि राष्ट्र के स्वाभिमान और सामाजिक सौहार्द को सुरक्षित रखने का सुअवसर हाथ से न चला जाए.

नरेंद्र सहगल

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