‘रास्ते में बिछी थीं लाशें’

Manohar-lal_Partition-Story-300x184बंटवारे के दिनों के बारे में जब भी सोचता हूं तो एक अजीब सी उलझन होने लगती है. उन दिनों पाकिस्तान में जहां भी हिन्दू रह रहे थे, वे सभी डरे हुए थे कि कब क्या हो जाए. मेरी माता जी का देहांत हो जाने के कारण मेरा लालन-पालन बुआ जी के पास हुआ. तब मेरी उम्र 8 वर्ष थी. अचानक एक दिन हमारे मुहल्ले में भी हालात खराब हो गए. स्थिति इतनी ज्यादा खराब थी कि पलायन ही एक मात्र रास्ता सभी को सूझ रहा था क्योंकि आस-पास के हिन्दू परिवार जब शाम को एक स्थान पर एकत्र होते थे तो पाकिस्तान के विभिन्न स्थानों पर मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं के साथ की जा रही बर्बरता को बयां करते थे. फिर एक दिन ऐसा आया कि मोहल्ले के लोगों को पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा. मुझे याद है कि गांव वालों ने तय किया कि सभी लोग पाकिस्तान छोड़कर अमृतसर चलेंगे. छोटे बच्चों और महिलाओं को बैलगाड़ी में बैठाया गया और घर के बड़े- बुजुर्ग और नौजवान बैलगाड़ी को घेर कर चल रहे थे. मुझे याद है कि एक कारवां जैसा था. जैसे ही कोई हमला होता तो सभी गाड़ियां रुक जातीं और नौजवानों के पास जो अस्त्र-शस्त्र होते वे उन्हें लेकर तैयार हो जाते. हालात इस कदर खराब थे कि मेरी बैलगाड़ी जिस रास्ते गुजर रही थी, उस रास्ते में दोनों ओर लाशें बिछी हुई थीं. कई बार हमारे कारवां पर भी हमला हुआ. गांव के कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया. किसी को यह नहीं पता था कि वह बच पाएगा या नहीं. इसे देख सभी डरे हुए थे. खैर, अनेक कष्टों को सहते हुए अमृतसर पहुंचना हुआ तो सेना एवं संघ के स्वयंसेवकों ने हम सभी की काफी मदद की. मेरे साथ जो भी बड़े-बुजुर्ग थे वे बताते हैं कि उस परिस्थिति में संघ के स्वयंसेवक ही हर प्रकार की मदद के लिए प्राणपण से जुटे थे. इसके बाद हम सभी कुरुक्षेत्र के एक शिविर में रहे. कुछ समय यहां गुजारने के बाद मैं रोहतक के वंशी गांव में रहने लगा. यहां रहकर ही हमारी शिक्षा-दीक्षा हुई. उस समय काफी कठिन परिस्थिति थी, लेकिन संघ के स्वयंसेवकों ने प्रत्येक स्थान पर पाकिस्तान से आए हुए हिन्दुओं की हर संभव मदद की. आज भी मुझे वह दिन याद है, जब 1954 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक कार्यक्रम मेरे गांव में हुआ. गांव के लोगों ने मुझे भी संघ के कार्यक्रम में आने के लिए कहा ही नहीं, बाकायदा गणवेश भी दिया. मैंने पहली बार संघ के किसी कार्यक्रम में भाग लिया था. इसे देखकर मुझे खुशी हुई, लेकिन जब अगले दिन मैं स्कूल गया तो मेरे शिक्षक ने मुझे मुर्गा बनाकर बहुत पीटा और भविष्य में संघ के कार्यक्रम में न जाने के लिए कहा. लेकिन संघ की लगन तो मन में समा चुकी थी, जो कहां निकलने वाली थी. उसी के कुछ दिन बाद 1955 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी सड़क मार्ग से कश्मीर जा रहे थे तो गांव के पास पहली बार उनका भाषण सुना तो लगा कि संघ राष्ट्र के लिए अच्छा काम कर रहा है. तब से लेकर आज तक संघ का स्वयंसेवक हूं. मैंने अनेक कष्ट सहते हुए अपनी पढ़ाई-लिखाई पूरी की और मुझे सरकारी नौकरी मिल गई. आज मेरा खुद का कढ़ाई से जुड़ा व्यवसाय है. लेकिन आज जब मैं संघ के बारे में सोचता हूं तो स्पष्ट होता है कि बंटवारे के समय संघ के स्वयंसेवकों ने जो सेवाभाव का उदाहरण प्रस्तुत किया, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता.

साभार – पाञ्चजन्य

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