स्वयंसेवक ‘अटल’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निष्ठावान स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी बाल्यकाल से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक अपने स्वयंसेवकत्व पर अटल रहे. संघ का स्वयंसेवक अर्थात् अपने संगठन, समाज और राष्ट्र के हित में स्वयं की प्रेरणा से निःस्वार्थ भाव से निष्ठापूर्वक निरंतर काम करने वाला आदर्श नागरिक. 15 वर्ष की आयु में डी.ए.वी. कॉलेज कानपुर के छात्रावास की संघ शाखा में अपना संघ जीवन प्रारम्भ करने वाले अटल जी को वामपंथी विचारधारा से प्रभावित छात्र नेता के रूप में प्रस्तुत करने वाले कुछ बुद्धिजीवियों को पुर्नविचार करने की आवश्यकता है. अपने विद्यार्थी जीवन में छात्रों का नेतृत्व करते रहे, यह सत्य है परन्तु वामपंथी कभी नहीं हुए. उन दिनों कानपुर में अनंतरामचन्द्र गोखले नाम के एक संघ प्रचारक ने उन्हें शाखा कार्यकर्ता के रूप में तैयार किया था. संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार द्वारा नागपुर से भेजे गए एक संघ प्रचारक भाऊराव देवरस और उत्तर प्रदेश के ही एक प्रचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के संपर्क में आने से अटल जी संघ-प्रचारक बने.

अटल जी ने अपना सार्वजनिक जीवन संघ के स्वयंसेवक के नाते स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी करते हुए प्रारम्भ किया था. ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में विद्यार्थियों का नेतृत्व करते हुए उन्होंने सत्याग्रह किया और गिरफ्तार होकर आगरा जेल में लगभग एक महीने तक बंद रहे. संघ की शाखा में रोज जाना वे कभी नहीं भूलते थे. शाखा के समय अपने परिवार में होने वाले उत्सवों इत्यादि को छोड़कर वे निक्कर पहन कर शाखा के लिए भाग जाते थे. एक बार इनके बड़े भाई ने शाखा में जाने से रोकने के लिए घर के बाहर के दरवाजे पर ताला लगा दिया. अटल जी घर की छत से कूद कर शाखा में पहुंच गए. इस तरह से इनके स्वयंसेवकत्व की बुनियाद मजबूत हुई.

संघ के वैचारिक आधार, कार्यपद्धति एवं उद्देश्य से प्रभावित होकर अटल जी ने जीवन भर अविवाहित रहकर संघ प्रचारक के रूप में अपने राष्ट्र की सेवा करने का निश्चय किया और संगठन की योजनानुसार शाखाओं के विस्तार का कार्य सम्भाल लिया. सन् 1952 में भारतीय जनसंघ की स्थापना के लिए संघ के जिन युवा प्रचारकों को योजनाबद्ध राजनीति में भेजा गया, उनमें अटल जी भी थे. राजनीति में उतरते ही अपनी प्रतिभा को अपने पुरुषार्थ से मुखर करने वाले अटल जी ने राष्ट्रधर्म मासिक और पांचजन्य साप्ताहिक जैसे राष्ट्रवादी पत्रों को प्रारम्भ किया. वे स्वयं इन पत्रों के सम्पादक रहे. आज ये दोनों पत्र राष्ट्रीय स्तर के सम्मानित राष्ट्रवादी पत्र बन चुके हैं. इन्हीं दिनों अटल जी ने वीर रस की देशभक्ति से लबालब कविताएं लिखनी शुरु कर दीं. उनकी कुछ कविताओं से पता चलता है कि वे वामपंथी विचारों से कोसों दूर थे. हिन्दुत्व, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भारत की सनातन संस्कृति के ध्वजवाहक वे प्रारम्भ से ही रहे.

उनकी चार कविताओं से उनके भीतर की राष्ट्रवादी चिंगारियों को देखा और समझा जा सकता है. 1. हिन्दू तन मन, हिन्दू जीवन, रग रग हिन्दू मेरा परिचय, 2. गगन में लहरता है भगवा हमारा, 3. जयचंद तूने देश को बर्बाद कर दिया, गैरों को लाकर हिन्द में आबाद कर दिया, 4. एक दिन भी जी मगर तू ताज बनकर जी, अमरयुग गान बनकर जी, अटल विश्वास बनकर जी. यही विचारधारा अटल जी को प्रधानमंत्री बनने तक और प्रधानमंत्री रहते हुए प्रेरणा देती रही.

वैचारिक धरातल पर अटल जी एक गहरा/गंभीर समुद्र थे, परन्तु मन में विपक्षियों के साथ उनका स्वभाव बहुत स्नेहिल होता था. उत्तर प्रदेश की एक समाजवादी नेता श्रीमती सुभद्रा जोशी के साथ अटल जी की मीठी-मीठी नोकझोंक चलती रहती थी. एक चुनाव सभा में सुभद्रा जोशी ने पूछा ‘‘मैं अटल जी को 14 दिन से लगातार देख रही हूं. वे गर्दन हिला-हिला कर बोलते हैं और रोज नये-नये कपड़े पहनकर आते हैं, वे कौन सी संस्कृति को मानते हैं?’’ दूसरे दिन अटल जी ने अपनी चुनावी सभा में उत्तर दिया ‘‘सुभद्रा जी, मैं तो उस संस्कृति को मानता हूं, जिसमें लक्ष्मण ने सीता का देवर लगते हुए भी 14 वर्ष तक उसका मुंह नहीं देखा, आप कौन सी संस्कृति को मानती हैं कि मेरी कुछ भी न लगती हुई 14 दिनों से मुझे लगातार देख रही हैं.’’ इसी तरह एक बार सुभद्रा जोशी ने अटल जी से पूछ लिया ‘‘आप हाथ हिला-हिलाकर क्यों बोलते हैं?’’ इस पर अटल जी का उत्तर था ‘‘क्योंकि मुझे टांग हिलाकर बोलना नहीं आता.’’

राजनीति में अटल जी कितने सतर्क तथा कर्तव्यनिष्ठ स्वयंसेवक बने रहे, इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरागांधी ने एक गोपनीय बैठक में संघ पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय ले लिया. अटल जी को इसकी भनक पड़ गई. वे तुरन्त संघ कार्यालय झंडेवाला में रात्रि लगभग 11 बजे पहुंचे और सभी प्रमुख संघ अधिकारियों को सतर्क कर दिया. इतना ही नहीं तत्कालीन सरसंघचालक पू. बालासाहब देवरस तक भी सूचना पहुंचा दी. बालासाहब ने तुरन्त एक बयान जारी कर दिया, ‘हम इस प्रतिबंध को हलके से नहीं लेंगे, इसका डटकर प्रतिकार किया जाएगा.’ रात-रात में ही सारे देश के संघ कार्यकर्ताओं को ‘सम्भलने’ की सूचना पहुंचा दी गई. इस गुप्त सरकारी फैसले के लीक होने से श्रीमती इंदिरा गांधी की संघ को कुचल देने की साजिश विफल हो गई. इसके 2 वर्ष के बाद 1975 में जब इंदिरा जी ने अपनी सत्ता बचाने के लिए देश में आपातकाल की घोषणा कर दी तो अटल जी गिरफ्तारी के बाद जेल में रहते हुए भी आपातकाल का विरोध कर रहे कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाते रहे. उन्होंने एक संदेश लिखकर बाहर कार्यकर्ताओं के पास भेजा, जिसका शीर्षक था – ज्योति जलाए रखो, अर्थात् संघर्षरत रहो. 19 महीने के बाद जब चुनावों की घोषणा हुई तो अटल जी की सहमति से सभी विपक्षी दलों ने मिलकर जनता दल का गठन किया. जनसंघ के कई कार्यकर्ता अपने दल के विसर्जन के पक्ष में नहीं थे. तब अटल जी ने एक बयान जारी कर के सबको शांत कर दिया – ‘‘जनसंघ 25 वर्ष का हो गया है, हम ब्रह्मचारी आश्रम से गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर रहे हैं, यही राष्ट्र के हित में है’’.

चुनाव में जनता दल के बहुमत में आने पर प्रधानमंत्री बनने के लिए जीवनभर कांग्रेसी रहे बाबू जगजीवन राम ने अपनी दावेदारी ठोक दी. वे मोरारजी देसाई के पक्ष में नहीं थे. जब जगजीवन राम जी नहीं माने तो यह काम अटल जी ने अपने हाथ में लिया. नीतिनिपुण, कूटनीतिज्ञ और व्यवहार कुशल अटल जी ने जगजीवन राम से अकेले में कहा ‘‘आप अपना दावा वापस लेकर मोरारजी भाई को अपना समर्थन दे दें. आपने तो मातृ एक माह पहले ही कांग्रेस छोड़ी है, पूरे आपातकाल में तो आप इंदिरा जी की तानाशाही पर मोहर लगाते रहे, आपके अड़ जाने से देशभर में गलत संदेश जाएगा’’. अटल जी की इस बेबाक परन्तु प्रेमपूर्वक कही गई बात के आगे बोलने की हिम्मत बाबू जगजीवन राम की नहीं हुई और उन्होंने मोरारजी भाई का समर्थन कर दिया.

केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद जब संघ के संदर्भ में दोहरी नागरिकता का विषय गर्म हुआ तो अटल जी ने स्पष्ट कह दिया ‘‘संघ हमारी मातृ संस्था है, विवाह हो जाने पर माता और पुत्र के सम्बंध समाप्त नहीं होते, संघ के स्वयंसेवक राजनीति में आकर अपने राजनीतिक संगठन की मर्यादाओं में रहते हैं, परन्तु मूल आधार को छोड़ने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता. हमारा स्वयंसेवक बने रहने का अधिकार कोई नहीं छीन सकता.’’ जनता पार्टी की सरकार टूटने पर जब भारतीय जनता पार्टी का निर्माण हुआ तो इसके पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने आंखों में आंसू भरकर घोषणा की ‘‘हमें अपने ही द्वारा बनाए गए जनसंघ को विसर्जित करते हुए दुख हो रहा है – परन्तु यही राष्ट्र के हित में है – दलों के दलदल से कमल खिलकर बाहर आ गया है.’’

वर्षों बाद जब अटल जी प्रधानमंत्री बने तो उस समय भी उन्होंने अपने स्वयंसेवकत्व पर आंच नहीं आने दी. अपने मूल आधार पर कायम रहते हुए उन्होंने गठबंधन सरकार के धर्म को निभाने में सफलता प्राप्त की. यद्यपि संघ द्वारा मार्गदर्शित संस्थाओं – विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ और स्वदेशी जागरण मंच के साथ उनके मतभेद रहे, परन्तु उन्होंने कभी मनभेद को स्थान नहीं दिया. यहां हम कह सकते हैं कि उन्होंने एक वरिष्ठ स्वयंसेवक के नाते संघ और भाजपा में समन्वय स्थापित करने का सफल प्रयास किया. अपनों और विपक्षियों में समन्वय करने की कला को अटल जी बखूबी जानते थे.

एक समय पर जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अटल जी की तुलना सोनिया गांधी से करने लगे तो भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने इसका बहुत सुन्दर शब्दों में उत्तर दिया ‘सोनिया गांधी ने अपने विवाह के लिए अपना देश छोड़ दिया और अटल जी ने देश के लिए अपना विवाह छोड़ दिया.’

अटल जी के सम्पूर्ण राजनीतिक जीवन को शब्दों की एक छोटी सी कटोरी में समेटा नहीं जा सकता. वे एक ऐसे कर्मयोगी थे, जिन्होंने वास्तव में सबको साथ लेकर चलने के मुहावरे को व्यवहार में परिणित कर दिया था. अटल जी महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज्य’, लोहिया के ‘समाजवाद’ और दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ का सम्मिश्रण थे. स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी एक व्यक्ति अथवा एक नेता नहीं थे, वे सर्वस्पर्शी, सर्वग्राहीय और सार्वभौम व्यक्तित्व थे जिसने सभी क्षेत्रों, सभी दलों और सभी विचारधाराओं में अद्भुत समन्वय करने में सफलता प्राप्त की. अटल जी को हमारी हार्दिक श्रद्धान्जलि..

नरेंद्र सहगल

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