ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के प्रतीक हैं मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी – रामबहादुर राय

जयपुर (विसंकें). विश्व संवाद केंद्र की ओर से ‘ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता’ विषय पर आयोजित परिसंवाद में मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने कहा कि मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी श्रेष्ठ संपादकों की श्रेणी में तो थे ही, वह आपातकाल में लोकतंत्र के सिपाही भी थे. आपातकाल के समय लोकतंत्र की रक्षा के लिए वह जेल तक गए. उनकी पत्रकारिता की यात्रा को देखें तो पाएंगे कि मामाजी ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के प्रतीक हैं.

इस अवसर पर विश्व संवाद केंद्र में मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी के चित्र की स्थापना की गई. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र शर्मा उपस्थित रहे और अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार महेश श्रीवास्तव ने की. मामाजी के नाम से ‘ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता’ के लिए मध्यप्रदेश शासन द्वारा दिए जाने वाले राष्ट्रीय सम्मान को बंद करने के वर्तमान सरकार के निर्णय की आलोचना परिसंवाद के सभी वक्ताओं ने की.

वक्ताओं की सरकार से अपेक्षा है कि मामाजी के नाम पर दिया जाने वाला राष्ट्रीय सम्मान जारी रहना चाहिए, क्योंकि वह किसी दल या विचार से अधिक आदर्श पत्रकारिता के प्रतिनिधि थे. आगामी अक्तूबर से मामाजी का जन्मशताब्दी वर्ष प्रारंभ हो रहा है. इस संदर्भ में मामाजी के विचार एवं पत्रकारिता के मूल्यों को समाज तक ले जाने की योजना पर भी विचार-विमर्श हुआ.

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता को स्पष्ट करते हुए कहा कि पूंजी, सत्ता और उद्योग का रसायन पत्रकारिता नहीं हो सकती. ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता का ध्येय पैसे कमाना नहीं, बल्कि ऊंचे आदर्श होते हैं. परिस्थितियों से ध्येय तय होता है. वर्ष 1947 के पूर्व पत्रकारिता का ध्येय स्वतंत्रता था और उसके बाद यह ध्येय भारत का नवनिर्माण हो गया. ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता की बात महात्मा गांधी के बिना पूरी नहीं हो सकती. जब अंग्रेज भारतीय समाज को जाति के आधार पर तोड़ने की साजिश कर रहे थे, तब महात्मा गांधी ने पत्रकारिता के माध्यम से जनजागरण किया. मामा माणिकचंद्र वाजपेयी की पत्रकारिता के संबंध में उन्होंने कहा कि मामाजी उन संपादकों में रहे हैं, जिन्होंने कभी भी अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया. मामाजी ने लगातार दो साल मेहनत कर ‘आपातकालीन संघर्षगाथा’ पुस्तक लिखकर आपातकाल की अनकही कहानियों को सबके सामने रखा. उन्होंने कहा कि आज जो पत्रकार ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता करना चाहते हैं, उन्हें उस राज्य व्यवस्था को बदलने के लिए अभियान चलाना चाहिए, जो अंग्रेजों की देन है. पत्रकारिता के माध्यम से हमें नागरिक अधिकारों की रक्षा करना चाहिए. समाज को समता, समानता और समरसता का अनुभव कराना चाहिए.

औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध अभियान चलाना चाहिए. उन्होंने कहा कि आज ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता की आवश्यकता है. जो संस्थान यह करना चाहते हैं, उन्हें नया बिजनेस मॉडल बनाना चाहिए.

आज भी जारी है औपनिवेशिक दासता

रामबहादुर राय ने संसद सदस्य शशि थरूर की पुस्तक ‘भारत का अंधकार काल’ का जिक्र करते हुए कहा कि 1947 में भले ही हम आजाद हो गए, लेकिन औपनिवेशिक दासता अब तक जारी है. शशि थरूर ने अपनी पुस्तक में इस संबंध में बहुत विस्तार से लिखा है. 15 अगस्त 1947 को महान संपादक बाबूराव विष्णु पराड़कर ने जो कहा, वह आज भी बहुत महत्वपूर्ण है. उन्होंने लिखा था – ‘स्वतंत्र होने के साथ-साथ हमारे कंधों पर जो भार आ गया है, उसे हमें भूलना नहीं चाहिए. हम जरा से चूके तो सर्वनाश हो जाएगा.’  आज जारी औपनिवेशिक मानसिकता के विरुद्ध ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता की आवश्यकता है.

परिसंवाद के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र शर्मा ने बताया कि मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी के सान्निध्य में पत्रकारिता करने का अवसर उन्हें प्राप्त हुआ है. मामाजी पत्रकारिता में शुचिता के हामी रहे. वह एक विचारधारा से जुड़े रहे परंतु कभी भी अपने विचार को पत्रकारिता पर हावी नहीं होने दिया. सत्ता जब लोकहित के पथ से हटी, तो उनकी कलम ने राह दिखाने का कार्य किया, चाहे सरकार किसी की भी रही हो. मामाजी की पत्रकारिता के मूल्य नवागत पत्रकारों को अपनाने चाहिए. वे पत्रकारिता के आदर्श प्रतिनिधि हैं.

ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के केंद्र में राष्ट्र

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ संपादक एवं मध्यप्रदेश गान के रचयिता महेश श्रीवास्तव ने कहा कि राष्ट्र और अपनी मातृभूमि ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के केंद्र में होते हैं. जीवन मूल्यों की स्थापना के प्रयास ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता करती है. धन के माध्यम से पत्रकारिता अलग बात है और धन को ध्येय बनाकर पत्रकारिता करना अलग बात है. आज अनेक समाचार संस्थानों का ध्येय धन हो गया है. इसलिए आज धन को ध्येय बनाकर पत्रकारिता की जा रही है. मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी की पत्रकारिता मूल्यों की पत्रकारिता रही. उन्होंने स्वतंत्रता, संस्कृति और जीवन मूल्यों के लिए पत्रकारिता की.

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