भारतीय संस्कृति में किसी भी प्रकार की हिंसा मान्य नहीं है – डॉ. मोहन भागवत जी

 

सरसंघचालक जी महावीर जयंती महामहोत्सव के दौरान संबोधित कर रहे थे..

सरसंघचालक जी महावीर जयंती महामहोत्सव के दौरान संबोधित कर रहे थे..

विसंके, जयपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि “गौ रक्षा के दौरान कोई हिंसा न हो। गौ रक्षकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस दौरान किसी की भावनाओं को ठेस न पहुंचे, नहीं तो गौ रक्षा के तरीके पर ही सवाल उठने लगेंगे।” उन्होंने कहा कि “गौ हत्या बंदी सरकार के अधीन है। हमारी इच्छा है कि पूरे भारतवर्ष के लिये कानून बने। इसके लिए केंद्र सरकार को एक कानून बनाना चाहिए।”

सरसंघचालक जी दिल्ली के तालकटोरा इनडोर स्टेडियम में भगवान महावीर जयंती महोत्सव महासमिति द्वारा आयोजित कार्यक्रम महावीर जयंती महामहोत्सव के दौरान संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि गौ रक्षक दलों द्वारा की जा रही हिंसा गौ रक्षा के प्रयासों को बदनाम कर रही है. महावीर जयंती के अवसर पर उन्होंने गौ-हत्या को अधर्म बताया। कानून और संविधान का पालन करते हुए अधिक से अधिक लोगों को गौरक्षा से जोड़ने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि “जैन धर्म हमें जीवों, प्राणियों और संपूर्ण सृष्टि की रक्षा करना, उनसे प्यार करना सिखाता है। अहिंसा की सीख देता है। हमें भगवान महावीर स्वामी के बताये हुए अहिंसा का मार्ग अपनाना होगा. तभी जाकर हम भारत को विश्व में एक मजबूत राष्ट्र बनाने में सफल हो पाएंगे।” “अगर सभी नागरिक अहिंसा का पालन करना शुरू कर दें तो सारे भारतवर्ष में किसी भी प्रकार की हिंसा की घटना नहीं होगी। जैन धर्म के मूल में भी अहिंसा है। अहिंसा करुणा से ही आती है और करुणा धर्म का अभिवाज्य घटक है. हमें अपने अन्दर करुणा केMahavir भाव उत्पन्न करने होंगे।”

सरसंघचालक जी ने कहा कि “अहिंसा का प्रचार अहिंसा का पालन करके ही करना पड़ेगा। किसी भी प्रकार की हिंसा भारतीय सभ्यता-संस्कृति में मान्य नहीं रही है। अहिंसा के आधार पर पूरा राष्ट्र एकजुट हो सकता है। इसलिए हमें मत और विचारों को मतभेद के नाते न देखते हुए मतभेदों को भुलाकर एकजुट होना है और राष्ट्र को मजूबत बनाना है।”

उन्होंने कहा कि “अहिंसा का पालन करने से सृष्टि का रख-रखाव होता है। अहिंसा किसी भी धर्म का मूल भाव होता है. धर्म जोड़ने वाला होता है। जोड़ने का और जोड़कर उन्नत करने का प्रयास धार्मिक प्रयास है। जैन धर्म और इसके आचार्य हमें इस बात की सीख देते हैं।”

 

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