भारत में संवाद और विमर्श की सदियों पुरानी परंपरा रही है – एम. वेंकैया नायडू जी

लोकमंथन 2018

 उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू जी ने कहा कि राष्ट्र का निर्माण जन आकांक्षाओं से ही होता है. भारत में संवाद और विमर्श की सदियों पुरानी परंपरा रही है. ज्ञान की प्रामाणिकता सफल संवाद की ही परिणति है. कृष्ण और अर्जुन के संवाद ही गीता की रचना का बीज है. यह ध्यान देने योग्य है कि प्राचीन समय से इस तरह के विचारों में महिलाओं ने भी भाग लिया था. रांची के खेलगांव में प्रज्ञा प्रवाह तत्वाधान में आयोजित लोकमंथन 2018 के उदघाट्न समारोह (27 सितंबर) में उपराष्ट्रपति संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि लोकमंथन से हम अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को ही फिर से स्थापित कर रहे हैं. आज की परिस्थिति में विचार का आदान प्रदान होना जरूरी है. मैंने भारत दर्शन प्रदर्शनी को देखा है और युवा भी इसे देखें. सन् 1857 में हुए पहले स्वतंत्रता संग्राम में सभी देशभक्तों ने भाग लिया. अंग्रेजों को लगता था कि भारत कभी एक नहीं हो सकेगा. आज समाज को खुद अपना इतिहास बोध करने की जरूरत है. भाषा, इतिहास, संस्कृति, लोक गीत आदि का आत्म मंथन हो. ऐसी प्रदर्शनी भारत के हर शहर में होनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि अगर हम भारतीयता को महत्व देने की बात कहते हैं तो हमें अपने बारे में जानना जरूरी है. इसलिए मंथन का होना जरूरी है. हमें अपनी संस्कृति को लोगों के सामने रखना जरूरी है. आजादी के बाद जो शिक्षा दी गई, उसमें भारत को ज्यादा महत्व नहीं दिया गया है. इसलिए फिर से इस मानसिकता से बाहर निकल कर हमें मंथन करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि हमें अपने माता पिता को हमेशा याद रखना है. दूसरा अपनी जन्मभूमि को याद रखना चाहिए. आप कितना भी ऊंचा पहुंचें, लेकिन जन्मभूमि को न भूलें. तीसरा अपनी मातृभाषा को हमेशा याद रखना चाहिए और उसे प्रोत्साहन देना चाहिए. मातृभाषा इंसान की आंख होती है. भाषा और भावना एक साथ चलती है. अपनी भाषा में ही भावना को बेहतर प्रस्तुत कर सकते हैं.

उपराष्ट्रपति जी ने कहा कि लैटिन अमेरिका में लोग अपनी मातृभाषा नहीं जानते. क्योंकि स्पेनिशों ने वहां की भाषा बदल दी. और, सबसे महत्वपूर्ण हमें अपने राष्ट्र को हमेशा याद रखना चाहिए. हम अलग-अलग हैं लेकिन सब एक हैं. भारत एक भारत ही है. अलग-अलग भाषा, अलग-अलग पन्थ है, पर है अपना देश.

उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि जब शरीर के किसी भाग में चोट लगती है तो पूरा शरीर दर्द करता है. उसी तरह देश भी है. इनके अलावा अपने गुरु को भी याद रखना बहुत जरूरी है. गुरु ज्ञान देता है.

इसलिए माँ, मातृभूमि, मातृभाषा, देश और गुरु हमेशा याद रखे. यह मंथन भारत को देखने का एक मात्र साधन है. विवेकानंद जी ने भाषण में कहा कि जब भी भारत का सही इतिहास लिखा जाएगा तो भारत सच में विश्वगुरु बन जाएगा. गांधी जी का मानना था कि वे भी संस्कृति से परिचित होना चाहते थे. मैं नहीं चाहता कि मेरा घर दीवारों से घेर लिया जाए. शंकराचार्य से विवेकानंद तक कई विचारक हुए जिन्होंने सामाजिक सौहार्द्र के लिए समाज को प्रेरित किया है. आत्मबोध ही हमारा गौरव है. सामाजिकता का अंकुर हर क्षेत्र में फूटना चाहिए. आज लोकमंथन एक संस्कार है. सार्थक समाज का निर्माण होगा. भारत हमेशा से अपने संस्कार के लिए जाना गया है. दुनिया भर से बच्चे यहां शिक्षा लेने आते थे. भारत ने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया. यही हमारी संस्कृति है. मुझे यकीन है कि भारत नंबर वन बनेगा. धर्मनिरपेक्षता हर भारतीय के डीएनए में है. भारत चाहता है कि पूरा विश्व शांति के साथ रहे.  अपनी रोटी बांट कर खाना भारत की संस्कृति है.

अध्यक्षीय भाषण में मुख्यमंत्री रघुवर दास जी ने कहा कि बिरसा मुंडा सहित झारखंड और देश के सभी शहीदों को अपनी श्रद्धांजलि देता हूँ. मुख्यमंत्री ने देश भर से आये सभी अतिथियों का झारखंड की धरती पर सवा तीन करोड़ जनता की तरफ से स्वागत किया और कहा कि लोकमंथन ने देश दुनिया के गणमान्य लोगों को यहां आमंत्रित किया है, इससे झारखंड गौरवान्वित हुआ है. झारखंड की कोख से कई वीर शहीदों ने जन्म लिया, जिन्होंने भारत पर खुद को न्यौछावर कर दिया. झारखंड की संस्कृति इस आयोजन के माध्यम से देश दुनिया में अपनी छटा बिखेरेगी. मुझे पूर्ण उम्मीद है कि इस तीन दि‍न के लोकमंथन में वैचारिक मन्थन होगा. सम्मेलन से हम भारत को विश्वगुरु बनाने का एक संदेश दें.

जे. नंद कुमार जी ने लोकमंथन की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह लोकमंथन का द्वितीय संस्करण है. पहले संस्करण का आयोजन भोपाल में हुआ था. इस कार्यक्रम की सोच है कि भारत की विचार प्रणाली पूरा समाज मिल कर (इसमें सभी सम्मिलित है, कवि, लेखक आदि) करते थे. भारत बोध को बनाने में सभी का सहयोग रहा है. विश्व का मंगल करने वाला गीत भारत के हर क्षेत्र के लोग गाते हैं. भारत बोध को मजबूत करने के लिए लोकमंथन का आयोजन हुआ है. आजादी के बाद इसे फिर से शुरु करने का प्रयास 2016 में हुआ. 2018 में रांची में भारत बोध कैसे राष्ट्र में, लोगों में और हर इंसान के मन में है, इस पर चर्चा होगी. यह एक विलय है संस्कृतियों, कला, गीत, विचार का. सब मिल कर इसे सफल बनाएंगे ऐसे संकल्प की जरूरत है. इस अवसर पर भारत दर्शन पुस्तक का लोकार्पण भी हुआ.

पर्यटन, खेल कूद एवं कला संस्कृति मंत्री अमर कुमार बाउरी ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया. उद्घाटन समारोह में झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू जी सहित अन्य गणमान्यजन उपस्थित थे.

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