युवाओं को भारत के गौरवमयी इतिहास से अनभिज्ञ रखा गया – सुनील आम्बेकर

युवा कुम्भ 2018

लखनऊ. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री सुनील आम्बेकर ने कहा कि युवाओं को इतिहास की जानकारी होना बेहद आवश्यक है. आजादी के बाद से युवाओं को इतिहास के काफी बड़े हिस्से से अनभिज्ञ रखा गया. हमें ऐसी कोर्ट नहीं चाहिए जो आधी रात को आतंकवादियों के लिए खुलती हो, ऐसे वकील नहीं चाहिएं जो उनके लिए लड़ते हों, देश में कई अच्छे लोग भी हैं उनको बढ़ावा देना चाहिए. एक बार मुझसे रूस में पूछा गया कि फेमिनिस्ट पर चर्चा चल रही थी, मुझे अपने विचारों को रखने को कहा गया तो मैंने कहा मेरा देश फेमिनिस्ट नहीं फैमिलिस्ट देश है. आम्बेकर युवा कुम्भ के दूसरे सत्र में संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि हमें अपनी आत्मा को भोगी नहीं बनने देना. राष्ट्रवाद और अध्यात्म एक दूसरे के पूरक हैं, अगर हम शिवा जी को देखते हैं तो उनके पीछे स्वामी रामदास को भी देखना होगा. आत्मा नित्य है, आत्मा शाश्वत है और इसको निश्छल होना चाहिए. हमें 1947 से अलग एक सपनों का भारत बनाना है. लोकमान्य तिलक जी ने कहा था देश के आक्रमणकारियों का विरोध करना, यहां के युवाओं का अधिकार है. सुनील आम्बेकर ने कहा कि हम इतिहास पढ़ते नहीं, बल्कि उससे सीखते हैं. ये देश के युवाओं का संकल्प है कि अब 1947 का भारत नहीं जो पूर्व की विभाजन संबंधित बात कर सके. ये सिर्फ युवा कुंभ नहीं बल्कि युवा संकल्प है. ये 1947 का भारत नहीं है. देश में होना वाला हर काम देश की संस्कृति, देश की वीरता से जुड़ा होना चाहिए.

उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी छिपे तथ्यों को बताने का कार्य करने के लिए संकल्पित है. हमें बाहुबली जैसी और फिल्मों की आवश्यकता है. देश के फिल्म जगत को भी देश के प्रति सजग होना होगा. हमें कसाब को चर्चा का विषय ना बना कर भगत सिंह पर चर्चा करनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि क्रांति का अर्थ देश को तोड़ना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ भारत के उत्थान से है. देश में आज हम जहां खड़े हैं, वहीं से नए भारत का निर्माण करना होगा. आज हमें देश में एक नया नेतृत्व मिला है. भारत का आगे का कथानक इस मिट्टी से उखड़ेगा नहीं, बल्कि मिट्टी से जुड़ेगा.

त्याग और सेवा हमारे राष्ट्रीय आदर्श – आशीष गौतम

दिव्य प्रेम सेवा मिशन के संस्थापक आशीष गौतम ने कहा कि सेवा पर बोलना आसान होता है और करना कठिन. जिस तरह विज्ञान एक दृष्टि और समझ है, उसी तरह सेवा कर्म है, व्यवसाय नहीं. सेवा में बोला नहीं जाता, केवल किया जाता है. गोमुख से चलकर गंगा सागर तक पहुंचने वाली मां गंगा किसानों को खेती योग्य जल देती है. लोगों को शुद्ध जल प्रदान करती है. गंगा केवल देती है, किसी से कुछ नहीं मांगती. उसी तरह सेवाभावी केवल सेवा करता है. वह जिधर से गुजरे सेवा की सुगंध आनी चाहिए. त्याग और सेवा हमारे राष्ट्रीय आदर्श हैं. भगिनी निवेदिता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने दीक्षा क्रम में उनसे कहा था कि बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए महात्मा बुद्ध को 500 बार जन्म लेना पड़ा. तुम इसी जीवन में बुद्धत्व प्राप्ति के लिए लोगों की सेवा करो.

आध्यात्मिक पराकाष्ठा का मार्ग सेवा ही है. कुम्भ सेवा और समरसता का दर्शन है. देश में लोग भले ही भूख और ठंड से मरते हों, लेकिन कुम्भ की परम्परा में आज तक एक भी व्यक्ति भूख और ठंड से नहीं मरा. सरकार वहां सभी तरह की सुविधाओं का प्रबंध करती है, लेकिन वह कुम्भ में श्मशान घाट इसलिए नहीं बनवाती, क्योंकि कुम्भ में किसी के मरने का एक भी उदाहरण नहीं मिलता है. आनन्द के लिए किया गया कर्म ही सेवा है.

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अखिल भारतीय विश्वविद्यालय प्रमुख श्रीहरि बोरिकर ने कहा कि भारत के युवाओं में जज्बा है. गांवों में प्रतिभा छिपी हुई है. उन्हें मंच प्रदान करने की आवश्यकता है. भारत में युवा आयोग बनना चाहिए. युवा आगे बढ़ना चाहता है. भारत में बाहुबली फ़िल्म जैसी लाखों कहानियां हैं, जो युवाओं को प्रेरित करती हैं. उन्होंने कहा कि दुनिया में केवल नासा का नाम था. आज भारत के इसरो का नाम है. इसरो ने सबसे कम लागत में मंगल ग्रह पर जाने का कीर्तिमान स्थापित करके दिखाया है. उसने 104 सेटेलाइट छोड़े हैं. जिस तरह जमीन में हीरा छिपा होता है और उसे निखारा जाता है, उसी तरह युवाओं को मौका देने व निखारने की जरूरत है.

बोरिकर ने कहा कि कुम्भ में राष्ट्रीय एकात्मता सुदृढ़ होती है. देश के खिलाफ षड्यंत्र रचने वाले कुछ लोग हम युवाओं के खिलाफ चुनौती हैं, इनसे निपटना होगा. ये चीन के समर्थन से देश के खिलाफ लड़ते हैं. हर विश्वविद्यालय में नक्सलवादी और माओवादी दिखते हैं, लेकिन राष्ट्रवादी युवा ऐसा नहीं देख सकते. देश की रक्षा करना क्रांतिकारियों से सीखा है. गरीबी दूर करने के लिए भाषण की नहीं, बल्कि व्यवहार की जरूरत है. हमें तय करना होगा कि किसी को पढ़ा सकते हैं क्या.

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