लंका का जिहादी डॉक्टर, हजारों हिंदू महिलाओं के गर्भाशय निकाले

जिस डॉक्टर का काम प्रसूताओं को मातृत्व का सुखद अहसास करवाने का था, उस डॉक्टर ने जिहाद के नाम पर उनके गर्भाशय निकाल दिए.यह डॉक्टर आतंकी संगठन तौहीद जमात से जुड़ा है
डॉ. मोहम्मद सीगू सिआब्दीन शफी जिसने हिंदू और बौद्ध महिलाओं के गर्भाशय निकाले 
एक डॉक्टर द्वारा किए गए इस जघन्य कृत्य पर दुनिया का सभ्य समाज स्तब्ध है. डॉ. मोहम्मद सीगू सिआब्दीन शफी को हिंदू और बौद्ध महिलाओं की धोखे से नसबंदी और गर्भाशय निकालने के अपराध में गिरफ्तार किया गया है. उसके खिलाफ अब तक 51 महिलाएं शिकायत दर्ज करवा चुकी हैं. जिन महिलाओं के साथ उसने ऐसा कृत्य किया है वो सभी युवा महिलाएं हैं जिनकी या तो एक संतान है या एक भी नहीं. अनुमान लगाया जा रहा है कि उसने हजारों महिलाओं को अपना शिकार बनाया है. 42 वर्षीय यह डॉक्टर आतंकी संगठन तौहीद जमात से जुड़ा है. तौहीद जमात वही संगठन है जिसका नाम हाल ही में श्रीलंका में हुए सीरियल धमाकों में सामने आया था| इन धमाकों में दो सौ पचास से अधिक लोग मारे गए थे. मरने वालों में 42 विदेशी भी थे, जिनमे डेनमार्क के सबसे धनी व्यक्ति एंडर्स होल्श के तीन बच्चे भी शामिल हैं, जो छुट्टियां मनाने श्रीलंका आए हुए थे. ये तथ्य बतलाते हैं कि ये हमले “दुनियाभर के काफिरों के विरुद्ध किए जा रहे वैश्विक जिहाद” का हिस्सा थे. इस बात की पुष्टि तौहीद जमात का संबंध इस्लामिक स्टेट से होने के खुलासे से भी होती है.
मुहम्मद सीगू सियाब्दीन ने पूछ्ताछ में स्वीकार किया है कि ऐसा करने के लिए उसे सउदी अरब की कुछ संस्थाओं से करोड़ों रूपए की प्रोत्साहन राशि मिली. उसके पास 17 भूमि सौदे और 40 करोड़ रुपए की संपत्ति का पता चला है. सिआब्दीन मुस्लिम महिलाओं को परिवार नियोजन, नसबंदी आदि के खिलाफ सलाह देता था और गैर मुस्लिम महिलाओं को ऑपरेशन द्वारा प्रसव करवाने के बाद उनका गर्भाशय निकाल देता था या नसबंदी कर देता था. कभी कभी बच्चे “मरे हुए” पैदा होते थे. मामले का खुलासा तब हुआ जब एक नर्स जिसका ऑपरेशन इस डॉक्टर ने किया था, को पेट में तकलीफ हुई और जांच करने पर उसका गर्भाशय गायब मिला.

खाते-पीते, उच्च शिक्षित जिहादी –

श्रीलंका में जिहादी इस्लाम दशकों से दस्तक दे रहा है. राजनीतिक इस्लाम वहां लम्बे समय से पैर पसार रहा है. अप्रैल माह में श्रीलंका में चर्च पर हुए बर्बर हमलों ने सारी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था. इन हमलों को 9 आत्मघाती जिहादियों ने अंजाम दिया था जिसमें एक पति-पत्नी मुहम्मद इब्राहीम इल्हाम और फातिमा इल्हाम भी शामिल थे. फातिमा गर्भवती थी. इन हमलावरों में से एक अब्दुल लतीफ़ जमील मुहम्मद ब्रिटेन में पढ़ा था, और श्रीलंका में बसने से पहले उसने ऑस्ट्रेलिया से स्नातकोत्तर की पढ़ाई की थी. पढ़े लिखे और पारिवारिक मुस्लिमों द्वारा किया जा रहा ये विध्वंस और नरसंहार जिहादी आतंक और अशिक्षा के संबंध को नकारता है.
याद करें सउदी ह्रदय रोग विशेषज्ञ मोशरी अल अंजी जिसने जिहादी आत्मघाती हमले में खुद को उड़ा लिया था. एक अन्य 25 वर्षीय चिकित्सक फैसल बिन शामन ने अपनी विस्फोटकों से भरी कार को एक सुरक्षा नाके से टकराकर दो दर्जन लोगों को मौत के घाट उतार दिया था. इस्लामिक स्टेट के उस वीडियो का स्मरण करें जिसमें भारत की तबाही का ख्वाब देखने वाले भारतीय युवक अमान टांडेल, फहद शेख और उनके साथी दुनिया के सामने आए थे, ये सब अच्छी तरह सुशिक्षित थे.
आजतक पकडे गए सिमी और इंडियन मुजाहिदीन के अधिकांश आतंकी भी कम से कम कॉलेज शिक्षित है. भारत से इस्लामिक स्टेट के लिए भर्तियां करते हुए कुछ लोगों को राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने गिरफ्तार किया था, जिनमें से एक 46 वर्षीय अब्दुल अहद था, जो इस्लामिक स्टेट के लिए भर्तियां कर कर रहा था. अब्दुल अहद ने अमरीका के कैनेडी-वेस्टर्न विश्वविद्यालय, कैलफोर्निया से स्नातकोत्तर की डिग्री ली थी. इन्हीं में से एक 33 वर्षीय मुदब्बिर शेख एक आईटी फर्म के लिए काम करता था.
कुछ साल पहले इटैलियन समाजशास्त्री डिएगो गैम्बेत्ता की किताब आई. नाम था – ‘इंजीनियर्स ऑफ़ जिहाद’। पुस्तक में अध्ययन प्रस्तुत किया गया है कि किस प्रकार जिहादियों और इस्लामी कट्टरपंथियों में पढ़े-लिखों की संख्या अच्छी खासी है. पश्चिमी देशों में से निकल रहे जिहादियों में से 25 प्रतिशत और अरब जगत से निकल रहे जिहादियों में से 46 प्रतिशत विश्वविद्यालयों में पढ़े हैं. यूरोप के उच्च शिक्षित इस्लामी कट्टरपंथियों में से 45 प्रतिशत इंजीनियर हैं. जिहाद की तरफ मुड़े चिकित्सकों की संख्या भी आश्चर्यजनक रूप से ज्यादा है. अल कायदा का वर्तमान मुखिया अल जवाहिरी शल्य चिकित्सक है। लादेन इंजीनियर था। अबु बकर अल बगदादी भी उच्च शिक्षित है. बगदादी की बर्बरता में हाथ बँटाने के लिए मुंबई से जाने वाले मुस्लिम युवा भी कॉलेज में तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे.

कट्टर मज़हबी खुराक से फैलता ज़हर

मनोवैज्ञानिक और लेखक सोहेल अब्बास ने किताब ‘ प्रॉबिंग द जिहादी माइंडसेट’ में 17 से 72 आयुवर्ग के 517 जिहादियों पर एक शोधपूर्ण प्रस्तुति दी है. लगभग आधे जिहादियों का कहना था कि पास-पड़ोस और नातेदारों के बीच उनका परिवार अधिक इस्लाम में ज्यादा गहरा विश्वास रखता था. तिस पर भी , ये जिहादी अपने परिवार में भी सबसे ज्यादा “पक्के मुसलमान” थे जो अपने परिवार के सदस्यों को भी और ‘शुद्ध मुसलमान’ बनने के लिए प्रेरित करते थे। अधिकांश जिहादी मज़हबी नेताओं द्वारा जिहाद में दीक्षित हुए. वो परिवार की महिलाओं को हिज़ाब पहनने के लिए ज़ोर देते थे। परिवार सदस्यों को मज़ारों-दरगाहों पर जाने जैसी “गैर -इस्लामी आदतों ” से दूर करने की कोशिश करते थे.
ये अवलोकन बतलाते हैं कि जिहादी इस्लाम और जिहादी आतंकवाद अशिक्षा का परिणाम नहीं बल्कि कट्टरपंथ की लगातार खुराक का परिणाम है, जो गैर मुस्लिमों के विरुद्ध नफ़रत और खून की प्यास से भरे जंगजुओं का उत्पादन औद्योगिक स्तर पर कर रही है।
जिहादियों का बचाव करने वाले (अपॉलिजिस्ट) और कुछ भ्रमित ‘बुद्धिजीवी’ तर्क देते हैं कि जिहादी आतंक के पनपने की मुख्य वजह मुस्लिम समाज में आधुनिकता की कमी है। लेकिन आधुनिकता की परिभाषा क्या है ? क्या आधुनिकता की परिभाषा आधुनिक साधन-संसाधनों से है ? क्योंकि साधन संपन्नता तेल पर तैर रहे अरब राष्ट्रों में दुनिया के किसी भी हिस्से अधिक है। क्या आधुनिकता का अर्थ आधुनिक जीवन शैली से है ? यदि हाँ, तो याद करें ब्रिटेन की सैली जोन्स उर्फ़ जिहादी ब्राइड और समेंथा लुईस ल्यूथवेट उर्फ़ व्हाइट विडो की। जो पश्चिम के डिस्कोथेक से सीधे जिहाद के कारखाने में पहुंच गईं ।

इस मानसिकता को समझें

विचारणीय है कि डॉक्टर-इंजीनियर-पीएचडी-एमबीए शिक्षित/व्यवसायी गैर-मुस्लिमों की ह्त्या करने पर क्यों उतारू हो रहे हैं? शैक्षिक रूप से तर्क और विज्ञान में प्रशिक्षित ये जिहादी इस बात पर एकमत कैसे हो जाते हैं कि वे जिहाद की इस लड़ाई में जीतें या हारें, अथवा मरें या जियें, दुनिया में उनका ओहदा और प्रतिष्ठा बढ़ना तय है और जन्नत में 72 हूरें उनका इंतज़ार कर रही हैं?
उत्तरी इराक़ के मोसुल में आत्मघाती हमला करने वाले इस्लामिक स्टेट के जिहादियों में से एक को पेशमर्गा सैनिकों ने पकड़ लिया तो उसने उन ‘काफिरों’ को खुद से दूर रहने की चेतावनी देते हुए कहा कि ” हमें आज शाम 4 बजे जन्नत में होने वाले अल-इसरा के जलसे में शामिल होना है. हम 50 जिहादी हैं. हमें आज अल्लाह के सामने हाज़िर होना है. मुझे गोली मार दो. “

विचार ही हथियार

ये सुनने में हास्यास्पद लग सकता है लेकिन ये विचार ही सबसे खतरनाक हथियार है. ऐसे लोगों को तैयार करते हैं वो मौलाना, या उलेमा जो “काफिरों” के विरुद्ध घृणा का प्रचार करते घूमते हैं. जो मुस्लिम बच्चों के कच्चे मस्तिष्क में ये बात डालते हैं कि केवल इस्लाम ही एकमात्र सही रास्ता है, शेष के खिलाफ जिहाद करना हर मुसिम का परम कर्तव्य है. ये जिहाद अकल से किया जाए, मुँह से किया जाए, पैसे से किया जाए या हथियार से किया जाए, उसका सबाब या जन्नत में उसका बदला मिलता है, जन्नत के ऐशोआराम और चिरयुवा हूरों के रूप में. इस प्रकार की शिक्षा ही डॉ मुहम्मद सीगू सिआब्दीन शफी जैसे जहरीले दिमाग तैयार करती है. जो बारह महीने चौबीस घंटे गैर मुस्लिमों के प्रति नफरत पाले जिंदगी जीते हैं. ये समझना समय की आवश्यकता है कि आतंक न आतंकी के हाथ में पकड़ी गई बन्दूक में होता है, और न ही उसकी कमर में बंधे विस्फोटक बेल्ट में. आतंक तो दिमाग में होता है. आतंक होता है मज़हबी श्रेष्ठता के जूनून में. सबको अपने रंग में रंगने के वहशीपन में.
“ये संदेश दुनिया के कोने-कोने से आ रहा है. आज आया है श्रीलंका के कुरुनेगला अस्पताल से. ये समय उन हजारों पीड़ित महिलाओं की व्यथा को महसूस करने और उस व्यथा के असली कारण को समझने का है.”
प्रशांत बाजपेई
साभार
पात्र्चजन्य

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