सरसंघचालक जी का उद्बोधन (नागपुर) संघ शिक्षा वर्ग तृतीय वर्ष

सरसंघचालक जी का उद्बोधन (नागपुर) संघ शिक्षा वर्ग तृतीय वर्ष

tritita-varsh-samarop-karyakarm-2018-3-300x200प्रतिवर्ष नागपुर में तृतीय वर्ष का वर्ग लगता है और प्रतिवर्ष उसका समापन समारोह होता है. ऐसे जो हमारे कार्यक्रम होते हैं उसमें संघ स्थापना के समय से ही हमारी ये परंपरा रही है कि देश के सज्जनों को हम आमंत्रित करते हैं. जिनको आना संम्भव है वो हमारा निमंत्रण स्वीकार करते हैं और यहाँ पर आते हैं. संघ का स्वरूप देखते हैं, अपनी तरफ से अपनी कुछ बात कहते हैं. उसको पाथेय रूप में स्वीकार कर उसका चिंतन करते हुए हम आगे बढ़ते है. उस परंपरा के अनुसार ही आज का कार्यक्रम भी सरलता से, सहज रीति से संपन्न हो रहा है. परन्तु इस बार उसकी कुछ विशेष चर्चा चली. वास्तव में एक स्वाभाविक नित्यक्रम में होने वाला ये प्रसंग है. उसके पक्ष में और विपक्ष में जो चर्चा होती है, उसका कोई अर्थ नहीं है. ये प्रतिवर्ष जैसे होता है, वैसे ही हुआ है.

डॉ. प्रणब मुखर्जी साहब से हम परिचित हुए, सारा देश पहले से ही जानता है. अत्यंत ज्ञान समृद्ध, अनुभव समृद्ध  ऐसा एक आदरणीय व्यक्तित्व हमारे पास है और ऐसे सज्जनों से पाथेय ग्रहण करने का लाभ हमें मिल रहा है, इसके लिए उनके हम कृतज्ञ हैं. हमने सहज रूप से उनको आमंत्रण दिया, उन्होंने ह मारे हृदय का स्नेह पहचानकर सम्मति दी और यहां उपस्थित हैं. एक सहज स्वाभाविक बात है. उनको कैसे बुलाया और वो क्यों जा रहे हैं? ये चर्चा निरर्थक है. संघ, संघ है और डॉ. प्रणब मुखर्जी, डॉ. प्रणब मुखर्जी हैं और रहेंगे. परन्तु हम निमंत्रण इसलिए देते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाते, संघ वाले नाम से देश में कोई बड़ा प्रभावी ग्रुप खड़ा करें, जो देश के सारे क्रिया-कलापों पर अपना स्वामित्व चलाए, इस आकांक्षा को लेकर संघ का काम नहीं चला है. हिन्दू समाज में एक अलग प्रभावी संगठन खड़ा करने के लिए संघ नहीं है. संघ तो सम्पूर्ण समाज को संगठित करना चाहता है. इसलिए हमारे लिए कोई पराया नहीं है और वास्तव में किसी भारतवासी के लिए दूसरा कोई भारतवासी पराया नहीं है. विविधता में एकता ये अपने देश की हजारों वर्षों से परंपरा रही है. हम भारतवासी हैं यानि क्या हैं? संयोग से इस धरती पर जन्मे या यहाँ पैदा हुए, इसलिए हम केवल भारतवासी नहीं है. ये केवल नागरिकता की बात नहीं है. भारत की धरती पर जन्मा प्रत्येक व्यक्ति भारतपुत्र है. इस मातृभूमि की निशिम भाव से भक्ति करना, उसका काम है. और जैसे-जैसे उसको समझ में आता है, छोटे तरीके से, बड़े तरीके से सभी लोग ऐसा 1करते हैं. इस भारत भूमि ने केवल हमको पोषण और आजीविका के लिए प्राकृतिक संसाधन नहीं दिए हैं. उसने हमको हमारा स्वभाव भी दिया है. सुजल, सुफल, मलयज, शीतल मातृभूमि और चारों ओर से प्राकृतिक दृष्टि से सुरक्षित इसमें बाहर के लोगों का आना-जाना बहुत कम हो सकता था और अन्दर भरपूर स्मृद्धि थी. इसलिए जीवन जीने के लिए हमको किसी से लड़ना नहीं पड़ा. स्वाभाविक दृष्टि से हम उस मनोवृति के बने कि सर्वत्र भरपूर है, हम उसका उपभोग कर रहे हैं, अपने जीवन को समृद्ध कर रहे हैं. कोई आता है तो ठीक है, तुम भी आ जाओ, तुम भी साथ रहो. भाषाओं की, पंथ-सम्प्रदायों की विविधता तो पहले से है. अलग-अलग प्रकार से प्रान्त बनते हैं, रचनाएं बदलती रहती हैं. राजनीतिक विचार प्रवाह, मत प्रणालियां भी पहले से रही हैं. लेकिन इस विविधता में हम सब भारत माता के पुत्र हैं और अपने-अपने विविधता वैशिष्ट्य पर पक्का रहते हुए, दूसरों की विविधताओं का सम्मान करते हुए, स्वागत करते हुए और उनके अपने विविधता पर रहने का स्वीकार करते हुए मिलजुल कर रहना. विविधता में जो अंतर्निहित एकता है, भारत के उत्थान के लिए परिश्रम करने वाले सभी प्रामाणिक बुद्धि के निस्वार्थ महापुरुषों ने अभी तक जिसका उल्लेख करना कभी छोड़ा नहीं, ऐसी उस अंतर्निहित एकता का साक्षात्कार करके अपने जीवन में रहना, ये हमारी संस्कृति बनी और उसी संस्कृति के अनुसार इस देश में जीवन बने और सारे विश्व के भेद और स्वार्थ मिटाकर, विश्व के कलह मिटाकर, सुख-शांतिपूर्वक संतुलित जीवन देने वाला प्राकृतिक धर्म उसको दिया जाए, इस प्रयोजन से इस राष्ट्र को अनेक महापुरुषों ने खड़ा किया. अपने प्राणों की बलि देकर सुरक्षित रखा. अपने पसीने  से सींचकर बड़ा किया. उन सभी महापुरुषों के हमारे पूर्वज होने के कारण गौरव का स्थान अपने हृदय में हम रखते हैं और उनके आदर्शों का अनुसरण करने का अपने-अपने हिसाब से प्रयास करते हैं. मत-मतान्तर हो ही जाते हैं. मत का प्रतिपादन का शास्त्रार्थ करते समय और विवाद भी करने पड़ते है. लेकिन इन सब बातों  की एक मर्यादा रहती है. अंततोगत्वा हम सब लोग भारत माता के पुत्र हैं. मत-मतान्तर कुछ भी होंगे, हम अपने-अपने मत के द्वारा ये मान कर चल रहे है कि भारत का भाग्य हम बदल देंगे, हम उसको परम वैभव संपन्न बनायेंगे. एक ही गन्तव्य के लिए अलग-अलग रास्ते लेने वाले लोगों को अपनी विशिष्टता, विविधता को लेकर तो चलना चाहिए, उससे हमारा जन जीवन समृद्ध होता है. विविधता होना सुन्दरता की बात है, स्मृद्धि की बात है. उसको स्वीकार करके तो हम चलते ही है, परन्तु ये दिखने वाली विविधता एक ही एकता से उपजी है. उस भाव का भान रखकर हम सब एक हैं, इसका भी दर्शन समय-समय पर होते रहना चाहिए. क्योंकि किसी राष्ट्र का भाग्य बनाने वाले समूह नहीं होते, व्यक्ति नहीं होते, विचार तत्वज्ञान नहीं होता, सरकारें नहीं होती. सरकारें बहुत कुछ कर सकती है लेकिन सरकारें सब कुछ नहीं कर सकती हैं. देश का सामान्य समाज जब तक गुणसंपन्न बनकर अपने अन्तःकरण से भेदों को तिलांजली देकर, मन के सारे स्वार्थ हटाकर, देश के लिए पुरुषार्थ करने के लिए तैयार होता है, तब सारी सरकारें, सारे नेता, सारे विचार समूह उस अभियान के सहायक बनते हैं और तब देश का भाग्य बदलता है. स्वतंत्रता से पहले अपने देश के लिए स्वतंत्रता का प्रयत्न करने वाले सभी विचारधाराओं के महापुरुषों के मन में ये चिंता थी कि हम तो प्रयास कर रहे है, हमारे उपाय से कुछ तो भला होगा लेकिन सदा के लिए बीमारी खत्म नहीं होगी. जब तक अपने सामान्य समाज को एक विशिष्ट गुणवत्ता के स्तर पर मन की एकात्मता की भावना के आधार पर खड़ा नहीं किया जाता तब तक देश के दुर्दिनों का सम्पूर्ण अंत नहीं होगा. और हमने अपना काम चुन लिया है, हम उसमें व्यस्त हैं, लेकिन ये काम हुए बिना कोई काम पूर्ण नहीं होता.

संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार इन सभी कार्यों के सक्रिय कार्यकर्ता थे, क्योंकि उनके अपने जीवन में उनको अपने लिए करने की कोई इच्छा, आकांक्षा नहीं थी. वे सब कार्यों में रहे. कांग्रेस के आन्दोलन में दो बार कारावास गए. कांग्रेस के कार्यकर्ता भी रहे. अग्रणी क्रांतिकारियों के साथ क्रान्ति की योजना बनाई. उसके क्रियान्वयन में भाग लिया. समाज सुधारकों के साथ समाज सुधार के काम में रहे. अपने धर्म-संस्कृति के संरक्षण में अपने संत-महात्माओं के साथ भी रहे  और ये सारा करते समय उनका अपना चिंतन भी चला. इन महापुरुषों के अनुभव, चिंतन का भी परामर्श उनको मिला, तो उन्होंने ये विचार किया. त्रलोक्यनाथ चक्रवर्ती बंगाल के सुप्रसिद्ध क्रांन्तिकारी, अनुशीलन समिति के सदस्य थे. 1990 में डॉ. हेडगवार की जब जन्मशताब्दी हुई तो उस जन्मशताब्दी समिति का सदस्य बनने का अनुरोध करने के लिए (उस समय वो दिल्ली में थे) दिल्ली के कार्यकर्ता उनसे मिले, तो उन्होंने कहा कि 1911 में हेडगेवार कलकत्ता में मेरे घर आए थे और तब की चर्चा में उन्होंने यह बात कही थी कि समाज को खड़ा किये बिना कोई भला काम सफल होना संभव नहीं लगता. और आगे उन्होंने कहा था कि लगता है ये काम मुझे ही करना पड़ेगा. सब लोग बड़े-बड़े कामों में व्यस्त है. अच्छे लोग हैं, वरिष्ठ लोग हैं, बहुत गहरे और बहुत ऊँचे लोग हैं, इसलिए उन कामों की चिंता उन पर छोड़ देंगे तो भी चलेगा, लेकिन ये काम करने वाला कोई नहीं है. तो इस कार्य को कैसे किया जाए, ये सोचकर उन्होंने 1911 से प्रयोग करना प्रारम्भ किया. और सारे प्रयोग करने के बाद 1925 के विजयादशमी पर अपने छोटे से घर की पहली मंजिल पर 17 लोगों को साथ लेकर ये कहा कि हिन्दू समाज जो भारत का उत्तरदायी समाज है, केवल परंपरा से रहते आया है इतनी बात नहीं, आज की तरीक में भारत का बहुसंख्यक समाज है इसलिए नहीं, तो भारत के भाग्य के बारे में प्रश्न उसे ही पूछा जाएगा, उसका ये दायित्व है. उस हिन्दू समाज को संगठित करने के लिए, इस संघ का कार्य आज से शरू हुआ है, ऐसा उन्होंने कहा. ये जो हमारी दृष्टी है, किसी-किसी को एकदम समझ में आता है, किसी-किसी को समझ में नहीं आता है, किसी-किसी को समझ में आने के बाद भी उसको लगता है कि इनके साथ हो गए तो कुछ नुकसान होगा. मालूम होते हुए भी थोड़ा सा उल्टा ही चलेंगे, अलग ही चलेंगे और किसी-किसी को मालूम ही नहीं है.

चार ही प्रकार भारतवर्ष में हैं, पराया कोई नहीं है, दुशमन कोई नहीं है. सबकी माता भारत माता है. 40 हजार वर्षों से सबके पूर्वज समान हैं, ऐसा डीएनए का विज्ञान आज कहता है. सबके जीवन के ऊपर भारतीय संस्कृति के प्रभाव स्पष्ट रूप से देखने को मिलते हैं सर्वत्र. इस सत्य को हम स्वीकार करें, समझ लें. अपने संकुचित भेद छोड़कर, सबकी विविधताओं का सम्मान करते हुए, इस देश की राष्ट्रीयता के, इस सनातन प्राचीन प्रवाह को बल देने वाला काम करते जाएं. संघ ने यही विचार किया है. संघ सबको जोड़ने वाला संगठन है. समाज में संगठन संघ को नहीं करना है, समाज का ही संगठन संघ को करना है. क्योंकि संगठिन समाज ही भाग्य परिवर्तन की पूंजी है. और इस भाषण को समझकर, ऐसी पुस्तकों को पढ़कर, संगठन होता नहीं क्योंकि संगठन में एक विशिष्ट व्यवहार अपेक्षित है. सौहार्द का, सौमनस्य का, सबको समझ लेने का. आज की भाषा में अंग्रेजी में कहते हैं डेमोक्रेटिक माइंड, उसके बिना सम्भव नहीं होता है. और व्यवहार की बात स्वभाव से सम्बन्धित रहती है और स्वभाव आदतों से बनता है. आदतों को बनाए बिना स्वभाव नहीं बनता और पूरे समाज का स्वभाव बनना है तो पूरे समाज का प्रत्येक व्यक्ति विचार करके नहीं चलता. अध्ययन करके नहीं चलता. समाज तो जो वातावरण बनेगा, उस वातावरण के अनुसार चलता है. वातावरण बनाने वाले लोग चाहिए. तात्विक चर्चा, सामान्य समाज नहीं करता, उसको उसमें रस नहीं है, उसमें गति भी नहीं है. और तत्व की चर्चा करने जाएंगे तो विषयों को लेकर अनेक प्रकार के मत होते हैं विद्वानों के, जो कि पहले से है. प्रत्येक ऋषि अलग-अलग बात बताता है. कभी एक ही बात अलग भाषा में बताता है तो अनुयायी लोग उसको अलग ही मानकर चलते हैं. किसका प्रमाण मानें? श्रुति-स्मृति सबमें फर्क है. श्रुतिर्विभिन्नाः श्रुतयस्यभिन्नाः नय एको मुनिर् यस्य वच् प्रमाणम्. धर्मस्म तत्वम्. समाज को जोड़ने वाला यह जो धर्म है, समाज को बिखरने न देने वाला यह जो धर्म है, समाज को उन्नत करके अभ्युदय और निःश्रेयस की प्राप्ति करा देने वाला, समाज के व्यवहार को संतुलित करने वाला यह जो धर्म है, धर्मस्य तत्वं निहितं द्ववायः, उसका तत्व गुप्त रहता है, उसको पाने के लिए तपस्या करनी पड़ती है. सब लोग तपस्या नहीं करते. सब लोग क्या करते हैं, महाजनो येन गतः स पंथाः. समाज के श्रेष्ठ लोग जैसे चलते हैं, वैसे चलते हैं. यद्यदः चरति श्रेष्ठः तत्देवे तरोजनाः, स यत प्रमाणम् कुरुते लोकस्तदुनवर्तते. अपने इस विशाल भूमि वाले, विशाल जनसंख्या वाले देश में प्रत्येक गांव में, प्रत्येक शहर के गली मौहल्ले में अपने आचरण से समाज हितैषी आचरण का वातावरण बनाने वाले कार्यकर्ताओं का समूह चाहिए. संघ का यही प्रयास है.

विचार कुछ भी हो, देश के सामने जो विभिन्न विषय हैं, समस्याएं हैं उनके हल के बारे में मत कुछ भी हो, विचारधारा कोई भी हो, जाति-पाति, प्रांत, पंथ, पक्ष, भाषा कोई भी हो, लेकिन सम्पूर्ण समाज को, सम्पूर्ण राष्ट्र को अपना मानते हुए व्यापक दृष्टि से उसके हित के प्रकाश में मेरा व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और आजीविका में आचरण कैसा हो, इसका विचार करके अपने आचरण का उदाहरण अपने आसपास प्रस्तुत करने वाला व्यक्ति वो वातावरण बनाता है. वह महापुरुष नहीं होता, वह सब में एक होता है. महापुरुषों के आदर्शों की समाज पूजा करता है, उत्सव करता है, जयंति, पुण्यतिथि मनाता है. लेकिन अनुकरण तो उसका करता है जो उसके आसपास पड़ोस में रहने वाला, उसके जैसा लेकिन थोड़ा सा प्रमुख. ऐसे उदाहरण अपने जीवन से उपस्थित करने वाले कार्यकर्ता चाहिए. आदर्श हमारे पास भरपूर हैं, कमी नहीं है. सुविचार की कमी नहीं है, श्रेष्ठतम तत्वज्ञान हमारे पास है. परन्तु व्यवहार के बारे में हम निकृष्ट थे, अब हम कैसे कह सकते हैं कि थोड़ा सा सुधार हुआ है. लेकिन अभी तक जितनी मात्रा में व्यवहार चाहिए, वैसा नहीं है. और वो तब बनता है जब सब प्रकार की परिस्थिति में उस व्यवहार पर अड़कर वैसा व्यवहार करने वाले समाज में से ही समाज के जैसे ही, परन्तु अपने चारित्र्य से, शील से विशिष्टता रखने वाले लोग खड़े होते हैं. ऐसे लोग देशभर में खड़े करने का प्रयास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का है. क्योंकि सारे समाज को एक विशिष्ट दृष्टि से चलने की आवश्यकता है.

कार्य कोई भी सम्पन्न होता है तो शक्ति के आधार पर सम्पन्न होता है. किसी भी कार्य को करने के लिए शक्ति चाहिए. यह जीवन का नियम है, विज्ञान सिद्ध नियम है और शक्ति संगठन में होती है, सब के मिलकर काम करने में होती है. और शक्ति को अगर शील का आधार नहीं रहा तो वह शक्ति दानवी शक्ति बनती है. अच्छी बातों का उपयोग बुरे कामों में होता है. विद्या विवादाय, धनम् मदाय, शक्ति परेशाम् परपीड़नाय. विद्या प्राप्त लोग विवाद में समय गवांते हैं, सहमति नहीं बनाते. विद्या के आधार पर सहमति बननी चाहिए. लेकिन विवाद चलते हैं. धनपति लोग धन के मद में चूर हो जाते हैं. धन का वो उपयोग नहीं है. और शक्ति का प्रयोग, दूसरों की सब बातों की इच्छा करना और दूसरों को पीड़ा देना वो प्राप्त करने के लिए, इसलिए करते है. यह कौन करते है, दुष्ट लोग करते हैं. विद्या विवादाय, धनम् मदाय, शक्ति परेशाम् परपीड़नाय, खलस्य साधोः विपरीतमेतद. सज्जनों की गति उल्टी चलती है. ज्ञानाय, दानाय च रक्षणम. विद्या का उपयोग समाज में ज्ञान बढ़ाने के लिए करते हैं, धन का उपयोग दान में करते हैं और शक्ति का उपयोग रक्षण के लिए करते हैं. दुर्बलों का रक्षण करते हैं. शक्ति को शील का आधार चाहिए, बिना उसके अनियंत्रित शक्ति यह खतरे वाली बात है. इसलिए उस शक्ति की उत्पति, उस शील की उत्पति समाज की आज की स्थिति में, सब संकटों से, समस्याओं से उबार कर समाज श्रेय का मार्ग चलने लगे, ऐसे ज्ञान की अराधना, सब परिस्थितियों में अपनी तपस्या पर अडिग रहने के लिए वीर व्रत की आराधना. और सब प्रकार के मोह आकर्षणों से, कष्टों से गुजरते हुए भी अपने ध्येय को कभी ओझल न होने वाली, उल्टा अधिकाधिक ध्येय प्राप्ति की उत्कंठा उत्पन्न करने वाली ध्येय निष्ठा, इन पांच गुणों की आराधना संघ की शाखा में स्वयंसेवक करते हैं. एक घंटा यह सब अपने तन-मन में उत्पन्न करते हुए, कार्यक्रम करते हुए अंत में जो प्रार्थना करते हैं भारत माता की, उसमें प्रभु से इन्हीं पांच गुणों का वरदान मांगते हैं.

1925 से संघ चला, धीरे-धीरे बढ़ता गया. सब प्रहारों के, सब बाधाओं के बावजूद बढ़ता गया. धीरे-धीरे प्रतिकूलता को उसने स्नेह में बदल दिया. आज लोकप्रिय है. जहां जाते हैं, वहां समाज का स्नेह मिलता है. विशाल संगठन बन गया है, लेकिन हम इसमें कृतार्थ का अनुभव नहीं करते. हमको अपने को प्रसिद्ध करने के लिए काम नहीं करना था और न ही कर रहे हैं. आगे बढ़ना है. अनुकूलता का समय भी आता है लेकिन अनुकूलता विश्राम के लिए प्रवृत करती है. विश्राम हमको नहीं करना है. परं वैभवं  नेतुमेतत स्वराष्ट्रं, यह हमारा लक्ष्य है. और उसके लिए सतत कार्यकर्ता निर्माण की जो प्रक्रिया चलती है उसके चलते उस प्रक्रिया को चलाने वाले कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण भी प्रतिवर्ष होता है. तृतीय वर्ष के समापन का प्रसंग प्रतिवर्ष हम यहां अनुभव करते हैं. अपना खर्चा करके साम्पतिक सुस्थिति में ये सब के सब शिक्षार्थी नहीं हैं. प्रांतों के वर्गों में और यहां के वर्ग में भी ऐसे लोग मिलते हैं जो हजार रुपये शुल्क जुटाना, प्रवास शुल्क जुटाना, इसके लिए दो-तीन महीना मेहनत मजदूरी करके पैसा जुटाकर, उस पैसे को अपनी भौतिक आवश्यकता के लिए खर्चा न करते हुए वर्ग का शुल्क देकर यह प्राप्त करते हैं. उनको कुछ  मिलने वाला नहीं है, वो ऐसा करते हैं इसलिए उनको धन्यवाद भी नहीं दिया जाता. और यह आदत भी लगाई जाती है कि अपेक्षा कुछ मत करो. नेकी करो और कुंए में डाल दो. वृत्तपत्र में नाम छपेगा, पहनूंगा स्वागत समुहार, छोड़ चलो यह क्षुद्र भावना हिन्दू राष्ट्र के तारणहार. तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें. ये सीख वो लेते हैं. यह संस्कार लेते हैं. अपने मन के भाव को पुष्ट करते हैं. तृतीय वर्ष में आते हैं तो आज तक जो पुस्तकों में पढ़ा था, बौद्धिकों में सुना था, इधर-उधर से सुन रहे थे, उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति ग्रहण करते हैं. भारतवर्ष के कोने-कोने से आये हुए लोग, विभिन्न स्वभाव के लोग, विभिन्न आर्थिक पृष्ठभूमि के, विभिन्न भाषा-भाषी, विभिन्न प्रान्तों के, विभिन्न जाति-उपजातियों के अपरिचित लोग पहले दिन आते है और जिस दिन जाने का समय होता है, उस दिन आँखों में आंसू रहते हैं. भाषा समझ में नहीं आती लेकिन आत्मीयता ऐसी हो गई कि लगता है बिछुड़े ही नहीं. अनुभूति धारण करते हैं कि सारा भारतवर्ष मेरा है, सारे भारतीय मेरे अपने हैं. जो प्रतिज्ञा मैं विद्यालय की प्रार्थना में करता था, भारत मेरा देश है, सारे भारतीय मेरे बांधव है, भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का गौरव मेरे मन में है, उन सारी बातों की प्रत्यक्ष अनुभूति वो यहाँ प्राप्त करते है. इसके बाद उनको और प्रशिक्षण की आवश्यकता इसीलिए नहीं होती है. अनुभूति मन को प्लवित करती है, मन ऐसा बनाकर आँख और कान खोलकर समाज में समाज की सेवा और परोपकार का काम करते हैं तो अपने आप आगे का प्रशिक्षण हो जाता है. ये संघ का कार्य है. हम सारी सज्जन शक्ति को जुटाना चाहते है. हमें विचारों से, मतों से कोई परहेज नहीं है. गन्तव्य एक हो परम वैभव संपन्न भारत, विश्वगुरु भारत उसकी दुनिया को आवश्यकता है. दूसरा कोई दुनिया की समस्या को हल करने वाला उत्तर नहीं दे सकेगा. भारत वर्ष को देना है. बोलकर नहीं देना है, अपना जीवन वैसा प्रस्थापित करके देना है. उस जीवन को स्थापित करने के लिए लायक भारतीयों का भारत. उसके स्वत्व के आधार पर पक्का खड़ा, अपने स्वत्व की पक्की पहचान जिसमें है. उसके बारे में जो स्पष्ट है, उसके बारे में जो निर्भय है, संकोची नहीं है, ऐसा समाज इस देश में हम खड़ा करना चाहते है. ऐसा समाज ही विश्व की और भारत की और हमारे आपके दैनिक जीवन की सब समस्याओं का पूर्ण उत्तर है. उसको हम सबको खड़ा करना है. संघ का काम केवल संघ का काम नहीं है. ये तो हम सबके लिए है. इसको देखने के लिए अनेक विचारों के महापुरुष आ चुके है, आते रहते है. मैं उसका विवरण नहीं दूंगा, आपको पता है. इस प्रसंग के निमित्त बहुत आया भी है. आते है, देखते है, उनसे हम पाथेय ग्रहण करते हैं, उनकी सूचनाओं का हम विचार करते हैं. हमने जो पथ तय किया है, हमने जो कार्यक्रम तय किया, हमने जो गंतव्य तय किया है उसमें उसकी जो मदद होगी उसका विचार करते हैं, उनको स्वीकार करते है. आपस में सद्भावना रखकर समाज सब एक दूसरे का सम्मान करके चले. परस्परम भाव यन्तं. हम अपने-अपने पथ से प्रमाणिकता से चलें. प्रामाणिक लोगों में मत आड़े नहीं आते हैं. प्रामाणिक लोगों में कुछ बात आड़े नहीं आती है, जो सही है उस पर सब चलते हैं. उनके मतों की आपस की चर्चा सुन्दर संवाद बनता है. जैसे अपने उपनिषदों के संवाद, तरह-तरह के मत हैं. सबका प्रतिपादन है, उसमें से एक सहमति निकलकर आती है.  पढ़ने के लिए, चिंतन के लिए और जीवन में उतारने के लिए भी अच्छा लगता है. क्योंकि सत्य है, उस सत्य पथ पर चले हम सब, ऐसा हमारा संस्कार हो, ऐसी हमारी आदत हो, ऐसी हमारी बुधि हो. ऐसा समाज उपदेश से नहीं, अपने स्वयं के जीवन के उदाहरण से करने वाले कार्यकर्ता संघ तैयार करता है. ये हम सब के लिए, हम सब का काम है और इसलिए मैं आप सबका आह्वान करता हूँ कि इस कार्य को प्रत्यक्ष देखिये. जो कुछ मैंने अभी तक कहा, वो वास्तव मैं हैं कि नहीं इसकी पड़ताल कीजिये और आपको लगा कि ऐसा है, ये सर्वहित का कार्य है तो आप भी इसमें सहभागी हो जाएं.  संघ को परखें, अन्दर से परखें.  आना-जाना अपनी मर्जी की बात है यहां पर, मनमर्जी का काम है. यहां पर सब आ सकते हैं, सब परख सकते है और परखकर अपना भाव बना सकते है. जैसा बनेगा, हमको उसकी चिंता नहीं है. हम क्या हैं हम जानते है. हम जो हैं वैसे दिखते हैं, हम जो हैं वही हम करते हैं. सबके प्रति सदभाव रखकर, किसी का विरोध मन में ना रखकर हम अपने पथ पर दृढतापूर्वक आगे चल रहे हैं लेकिन ये केवल हम करेंगे तो नहीं होगा, पूरे समाज का ये काम है. सारे समाज को इस मार्ग को परखना चाहिए और अगर ठीक लगता है तो इसके सहयोगी बनना चाहिए. एक आह्वान मैं आपके सामने रखता हूँ.

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