हमारी सनातन परंपरा में शामिल है महिलाओं का सम्मान

kumbh-prayagrajकुंभ और अर्द्धकुंभ में अखाड़ों की पेशवाई और शाही स्नान का एक अलग ही आकर्षण रहा है. वर्तमान में शैव, वैष्णव और उदासीन पंथ के संन्यासियों के मान्यता प्राप्त 13 अखाड़े हैं – इनमें से सात शैव अखाड़े हैं – जूना, निरंजनी, महानिर्वाणी, अटल, आह्वान, आनंद और अग्नि. तीन वैष्णव हैं – दिगंबर, निर्वाणी और निर्मोही तथा तीन उदासीन अखाड़े – बड़ा उदासीन, नया उदासीन और निर्मल. इन अखाड़ों की प्रतिनिधि समन्वयक संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि कहते हैं कि ये अखाड़े सनातन धर्म की रीढ़ हैं. आदिगुरु शंकराचार्य ने वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए इनकी बुनियाद सैकड़ों वर्ष पूर्व रखी थी.

कुछ समय पहले तक इन अखाड़ों के दरवाजे सिर्फ पुरुषों के लिए ही खुले थे, लेकिन आज हजारों साध्वियां-संन्यासिनें विभिन्न अखाड़ों से जुड़ी हुई हैं. कुंभ पर्व के पहले शाही स्नान में विभिन्न अखाड़ों से जुड़ी संन्यासिनों ने भी बड़ी संख्या में शिरकत की. यह बदलाव इस बात की पुष्टि करता है कि 21वीं सदी में अन्य क्षेत्रों की तरह धर्मक्षेत्र में भी महिला शक्ति ने अपना परचम बुलंद किया है.

प्रयाग कुंभ में बीते दिनों केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति को शैव परम्परा के श्री पंचायती तपोनिधि निरंजनी अखाड़े का महामंडलेश्वर बनाया गया है. वे इसी के साथ इस अखाड़े की 16वीं महिला महामंडलेश्वर बन गयीं. निरंजनी अखाड़े में संतोषी गिरि, मां अमृतामयी, योग शक्ति सहित 15 महिला महामंडलेश्वर पहले से हैं. महामंडलेश्वर बनने के बाद उन्होंने मकर संक्रांति पर पहले शाही स्नान में भी हिस्सा लिया. वे कहती हैं कि कुंभ हमारी आस्था का विशालतम समागम है. यहां स्नान करने से पाप धुल जाते हैं. यहां देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग आए हुए हैं. विदेशी लोग हमारी सभ्यता व संस्कृति को अपना रहे हैं. हमारी कामना है कि यह पर्व सभी को सुख एवं शांति दे और विश्व में शांति लेकर आए. जूना अखाड़े की महामंडलेश्वर चेतना माता का कहना है कि बीते कुछ सालों से अखाड़ों में महिला संन्यासियों की संख्या तेजी से बढ़ना, इस बात का संकेत है कि हमारी मातृशक्ति अपने वैदिक कालीन गौरव को पुनर्जीवित करने की दिशा में तेजी से सक्रिय हो रही है. उनके कथनानुसार कि नारी शक्ति हमेशा महान रही है. हमारे वैदिक वांड्मय में जिस आर्य संस्कृति का गुणगान मिलता है, वह मूलत: मातृ सत्तात्मक ही है. वेद नारी को अत्यंत महत्वपूर्ण, गरिमामय, उच्च स्थान प्रदान करते हैं. भारतीय धर्म को छोड़कर विश्व का कोई भी धर्म स्त्री को इतनी अधिक प्रधानता नहीं देता. वैदिक काल में नारियां स्वतंत्र रूप से ब्रह्मचर्चाओं, शास्त्रार्थ व यज्ञों में भाग लेती थीं. उपनयन संस्कार के बाद शिष्य और शिष्याएं दोनों वेद और शास्त्रों का अध्ययन करते थे तथा शिक्षा पूर्ण होने पर सामान्य छात्र-छात्राएं विवाह कर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर लेते थे, जबकि कुछ आजीवन तपोमय जीवन व्यतीत करते थे. वेदों में नारी को ज्ञान देने वाली, सुख-समृद्धि लाने वाली, देवी, विदुषी, सरस्वती, इन्द्राणी व उषा इत्यादि आदरसूचक नाम से संबोंधित किया गया है.

अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति-दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी जैसी वेद मंत्रों की ऋषिकाएं हमारी आदर्श व प्रेरणास्रोत हैं.

जूना अखाड़े की ही एक अन्य महामंडलेश्वर श्रद्धा माता के मुताबिक वैदिक वांड्मय में स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, शील, गुण, कर्तव्य, अधिकार और सामाजिक भूमिका का जैसा सुन्दर वर्णन पाया जाता है, वैसा संसार के अन्य किसी धर्मग्रंथ में नहीं. जूना अखाड़े की महिला साध्वियों की लंबे अरसे से चली आ रही पृथक महिला अखाड़े की मांग को स्वीकार करते हुए गत दिनों जूना पीठाधीश्वर ने अपने अखाड़े से जुड़ी महिला साध्वियों के ‘माई बाड़ा’ को अब ‘दशनाम संन्यासिनी अखाड़ा’ की स्वतंत्र मान्यता दे दी है. इस संन्यासिनी अखाड़े की अध्यक्ष लखनऊ के मनकामनेश्वर मंदिर की प्रमुख महंत दिव्या गिरि कहती हैं कि महिला साध्वियों की पृष्ठभूमि अत्यंत गौरवशाली है. महिला जब साध्वी बन जाती है तो उसकी ताकत और बढ़ जाती है. जब हम साधु-संन्यासी या संत के रूप में बोल रहे होते हैं तो स्त्री और पुरुष का भेद अपने आप मिट जाता है. वे बताती हैं कि 2003-04 के उज्जैन कुंभ के दौरान उनकी दीक्षा हुई थी. भारतीयता में संन्यास का जो मूल विचार है, वह बिना भेदभाव के समान रूप आत्म व जग कल्याण का है.

अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक/संरक्षक व गायत्री महाविद्यालय के सिद्ध साधक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने बीती सदी में ही ‘इक्कीसवीं सदी-नारी सदी’ का उद्घोष करते हुए महिलाओं को गायत्री जप व यज्ञ संचालन का अधिकार देकर नारी शक्ति को धर्म मंच पर प्रतिष्ठित किया था.

महामंडलेश्वर श्रद्धा माता कहती हैं कि महिलाओं के संन्यासी बनने की राह आसान नहीं होती. जन सामान्य के मन में हमारे बारे में जानने की भारी उत्सुकता रहती है. संन्यासिनों को अखाड़े में माता की पदवी पाने के लिए 12 से 15 वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है. दीक्षा से पूर्व संन्यासिनों को खुद अपना पिंड तर्पण व मुंडन करना पड़ता है ताकि यह साबित किया जा सके कि अब उसका अपने परिवार और समाज से कोई संबंध व मोह नहीं है. उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य सिर्फ भगवद् भक्ति व जनकल्याण है.

इस कठिन तपश्चर्या के बाद जब गुरु को यह बोध हो जाता है कि साधिका इस पथ पर चलने की पात्रता खुद में विकसित कर चुकी है, तभी उसे संन्यास की दीक्षा दी जाती है. पुरुषों की तरह ही अखाड़ों की महिला संन्यासियों के लिए भी अखाड़े के नियम निर्धारित हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य होता है.

इन संन्यासिनों को सिर्फ एक भगवा वस्त्र व मस्तक पर तिलक धारण करना होता है. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य कर्मों के बाद इष्ट का भजन-पूजन व जप तथा दोपहर में एक समय भोजन. भोजनोपरान्त पुन: जप-ध्यान व संध्याकाल में आरती-ध्यान के उपरांत शयन. अखाड़े के सभी साधु-संत उसे माता कहकर सम्बोधित करते हैं.

पूनम नेगी

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