हमें अपने दृष्टिकोण से भारत की सांस्कृतिक व बौद्धिक विरासत को देखना होगा – सुरेश सोनी जी

भारतीय सभ्यता हमें मानवीय मूल्यों का पाठ पढ़ाती है – राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जी

विसके जयपुर।

भारतीय शिक्षण मंडल तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘भारत बोध’ 23 फरवरी से दिल्ली में शुरू हो गbharat-bodh-3या। सम्मेलन का उद्घाटन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जी ने किया। पहले दिन उद्घाटन कार्यक्रम के पश्चात अरणी मंथन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी जी ने भी विषय पर संबोधित किया।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जी ने ‘भारत बोध’ अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में bharat-bodh-2कहा कि भारतीय सभ्यता हमें मानवीय मूल्यों का पाठ पढ़ाती है। इसलिए भारत की बौद्धिक विरासत को स्थापित करना एक महत्वपूर्ण प्रयास है जो प्रशंसा का पात्र है। सभी के प्रति सहिष्णुता, दया और मातृभूमि से प्रेम ही भारतीय सभ्यता के वास्तविक मूल्य हैं. उन्होंने कहा कि भारत की यही विशेषता है कि यहां सैकड़ों भाषाएं और सभी प्रमुख धर्म एक व्यवस्था के अंदर रहते हैं।

राष्ट्रपति जी ने कहा कि भारत का विचार सनातन ज्ञान की हमारी महान परंपरा से प्रवाहित होता आया है। मातृभूमि से प्रेम, अपना कर्म करना, सभी के प्रति दयाभाव, सबके प्रति सहिष्णुता और अपने काम और अनुशासन के प्रति जवाबदेह की सीख देते हुए कहा कि ये हमारी सभ्यता के मूल्य आज भी प्रासंगिक हैं। कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता है कि कैसे 200 भाषाओं, 1800 बोलियों और दुनिया के सात प्रमुख धर्मों की विविधता को समेटे हुए हम एक व्यवस्था, एक झंडा और एक संविधान के अंतर्गत रहते bharat-bodh-1हैं। उन्होंने कहा कि आंख के बदले आंख और दांत के बदले दांत के सिद्धांत के विपरीत भारतीय सभ्यता ‘सर्वे भवंतु सुखिना’ का संदेश देती है। तीन दिन के सम्मेलन में जो विचार मंथन होगा, वह देश के लिए लाभदायक होगा।

उद्घाटन सत्र के बाद अरणी मंथन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी जी ने कहा कि आज सांस्कृतिक प्रत्याक्रमण की आवश्यकता है। वैदिक काल में हम ऐसे नहीं थे. हमारे वेद पुरूषार्थ और पराक्रम की बात करते थे. पर, एक योजनाबद्ध तरीके से हमें पराजय सहने का आदी बना दिया गया। हमें जरूरत से ज्यादा रक्षात्मक रहने की जरूरत नहीं है, पश्चिम के नजरिए से हम भारत को न देखें। इसके लिए हमें अपने दृष्टिकोण से भारत की सांस्कृतिक व बौद्धिक विरासत को देखना होगा।

सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि इस दृष्टिकोण के लिए हमें नए प्रतिमान गढ़ने होंगे। भारत के शिक्षण व शोध संस्थानों को इन प्रतिमानों का विकास करने और इनके आधार पर काम करने की जरूरत है। भारतीय सभ्यता एक सहिष्णु समाज की नींव है क्योंकि यह ज्ञान देती है। भारत के छात्रों को भारत का सही बोध हो, इसके लिए भारतीय परंपरा के ज्ञान को शिक्षण संस्थानों के साथ मिलकर और आगे बढ़ाना है।

तीन दिवसीय सम्मेलन का आयोजन भारतीय शिक्षण मंडल तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से दिल्ली में किया जा रहा है. सम्मेलन में भारत और विश्व के अलग – अलग शिक्षण संस्थानों से लगभग नौ सौ प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं, जहां भारत से संबंधित विभिन्न पक्षों पर कई मौलिक शोध पत्र पढ़े जाएंगे।

आभार

विसके भारत।

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