योग भारत की प्राचीन संस्कृति की परंपराओं को समाहित करता है – दत्तात्रेय होसबले जी

DSC_9339लखनऊ (विसंकें).

21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर राजधानी लखनऊ स्थित श्री श्याम मंदिर, खाटू श्याम वाटिका में स्वयंसेवी संगठन यूनाइट फाउण्डेशन द्वारा कार्यक्रम का आयोजन किया गया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की तथा मुख्य अतिथि केजीएमयू के कुलपति पद्मश्री डॉ. रविकान्त और विशिष्ट अतिथि परमानन्द पाण्डेय रहे.

सुबह भारी बारिश के बाद भी योग के लिए लोगों के उत्साह को दखते हुए दत्तात्रेय होसबले जी ने गीता के उद्धरणों के साथ योगाभ्यास के बाद आयोजित स्वास्थ्य, समाज और सरोकार विषय पर आयोजित सम्वाद में हर परिस्थिति में समभाव रखने को योग से जोड़ा. उन्होंने योग की महत्ता पर प्रकाश डालते हुये कहा कि योग भारत की प्राचीन संस्कृति की परम्पराओं को समाहित करता है. गीता में योग की महत्ता को योगेश्वर श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताते हुये कहा कि समत्वंयोग उच्चते अर्थात् दु:ख-सुख, लाभ-हानि, शत्रु-मित्र, शीत और उष्ण आदि में सर्वत्र समभाव रखना ही योग है. योग में यम और नियम यह स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक है. प्राणायाम और आसन मन के संतुलन के लिए जरुरी है. ध्यान, प्रत्यान, समाधी जीवन को विकसित होने के लिए एक सीढ़ी है.

आईएफडब्लूज के राष्ट्रीय महासचिव परमानन्द पाण्डेय जी ने कहा कि योगश्चित्तवृत्त निरोध: अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है. केजीएमयू के कुलपति पद्मश्री डॉ. रविकान्त जी ने कहा कि योग एक सीधा प्रायोगिक विज्ञान है, एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति है. योग मनुष्य जीवन की विसंगतियों पर नियन्त्रण का माध्यम है. आईएफडब्लूज के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हेमन्त तिवारी ने कहा कि चित्त और शरीर को जोड़ना ही योग है. हमने विदेशियों को लंबे अर्से से भारत आकर योग सीखते देखा है, किंतु विडम्बना है कि हमने योग की महत्ता को देर से पहचाना.

केजीएमयू के वरिष्ठ मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. एससी तिवारी ने कहा कि आपके तन-मन के जुड़ाव की प्रक्रिया ही योग है. अगर यह जुड़ाव बना रहता है तो जीवन की प्रत्येक परिस्थिति पर विजय पायी जा सकती है. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद के कुलपति प्रो. जीसीआर जयसवाल ने कहा कि एक प्रसिद्ध उक्ति है- ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनमं! इसके अनुसार निरोग एवं दृढ़ता से युक्त-पुष्ट शरीर के बिना साधना सम्भव नहीं. इसलिए योग को इस प्रकार गूंथ दिया गया है कि शरीर की सुडौलता के साथ-साथ आध्यात्मिक प्रगति भी हो. शरीर की सुदृढ़ता के लिए आसन एवं दीर्घायु के लिए प्राणायाम को वैज्ञानिक ढंग से ऋषियों ने अनुभव के आधार पर प्राथमिकता दी है. इससे व्यक्ति एक महान संकल्प लेकर उसे कार्यान्वित कर सकता है. अत: योग इस जीवन में सुख और शांति देता है और मुक्ति के लिए साधना का मार्ग भी प्रशस्त करता है. उ.प्र. सरकार में राज्यमंत्री राजपाल कश्यप ने कहा कि योग द्वारा हम आज के परिवेश में अपने जीवन को स्वस्थ और खुशहाल बना सकते हैं. आज के प्रदूषित वातावरण में योग एक ऐसी औषधि है, जिसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है.

योगवेत्ता पीयूषकान्त मिश्र के निर्देशन में योगाभ्यास में सम्मलित बाल प्रशिक्षुओं को स्वयंसेवी संगठन यूनाइट फाउण्डेशन के सचिव सौरभ मिश्रा द्वारा प्रमाण पत्र प्रदान किया गया. सौरभ मिश्रा ने समस्त अतिथि गणों को धन्यवाद ज्ञापित किया. उन्होंने कहा कि ‘ज्ञानादेव तु कैवल्यं इस उक्ति के अनुरूप आपके शरीर एवं मन को उस ज्ञानानुभूति के योग्य बनाना ही योग का प्रमुख लक्ष्य है. विश्व योग दिवस की निरन्तरता बनी रहे, यह अपेक्षित है. यह इतिहास न बने, बल्कि परम्परा बने. रूको, भीतर झांको और जीवन को बदलो- यही योग दिवस का उद्घोष हो, इसी से लोगों को नयी सोच मिले, नया जीवन-दर्शन मिले.

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