अखंड भारत के समर्थक अब्दुल हमीद कैसर ‘लखपति’ (18 जुलाई/पुण्य-तिथि)

 

अब्दुल हमीद कैसर ‘लखपति’

अखंड भारत के समर्थक अब्दुल हमीद कैसर का जन्म पांच मई, 1929 को राजस्थान मेंजिले के एक छोटे कस्बे बकानी में हुआ था। उनके जागीरदार पिता कोटा रियासत में तहसीलदार थे। 1954 में एक लाख रु. की लाटरी निकलने के कारण वे ‘लखपति’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये।

तीन वर्ष की अवस्था में पिता की मृत्यु के बाद कुछ दुष्ट सम्बन्धियों ने उनकी सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया। अतः वे बूंदी आ गये। बूंदी और झालावाड़ के बाद उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से सम्बद्ध कोटा के हितकारी विद्यालय से कक्षा दस उत्तीर्ण की। विद्यालय के प्राचार्य श्री शम्भूदयाल सक्सेना भी स्वाधीनता सेनानी तथा प्रजामंडल के नेता थे। यहां पढ़ते समय उनकी मित्रता रामचंद्र सक्सेना से हुई। ये दोनों हर आंदोलन में सदा सक्रिय रहते थे।

अगस्त 1942 में कोटा में प्रजामंडल की ओर से ‘तिलक जयन्ती’ मनाई गयी। इसमें नौ अगस्त, 1942 को मुंबई में होने वाले अधिवेशन में भाग लेने तथा ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को समर्थन देने का प्रस्ताव पारित किया गया। इस कार्यक्रम में नगर के गण्यमान्य लोगों के साथ रामचंद्र सक्सेना एवं अब्दुल हमीद कैसर के नेतृत्व में छात्रों ने भी भाग लिया था।

इसी बीच अंग्रेजों ने कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को जेल भेज दिया। इस पर प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं तथा छात्रों ने कोटा के सब विद्यालयों में हड़ताल करा दी। 13 अगस्त को कोटा रियासत ने प्रजामंडल के नेताओं को भी बंद कर दिया। इस पर सब लोग कोतवाली को घेर कर बैठ गये। यह देखकर शासन ने घुड़सवार पुलिस बुलाकर लाठियां चलवा दीं। इससे कई लोगों को चोट आयी। रामचंद्र सक्सेना तथा अब्दुल हमीद कैसर के सिर भी फट गये।

इस घेराव से कोतवाली में बंद अधिकारी परेशान हो गये। जनता ने शहर में आने के मार्ग बंद कर रखे थे। फिर भी 19 अगस्त को सेना शहर में आ गयी; पर इससे आंदोलनकारियों का मनोबल कम नहीं हुआ। अंततः 20 अगस्त को सब नेताओं की मुक्ति के बाद कोतवाली का घेराव समाप्त हुआ।

1943 में बनारस से मैट्रिक उत्तीर्ण कर श्री कैसर ने कुछ समय बूंदी रियासत में नौकरी की और फिर वे अलीगढ़ पढ़ने चले गये। इससे नाराज होकर बंूदी के अंग्रेज दीवान ने उनसे वह सब राशि वापस ले ली, जो अब तक उन्हें वेतन के रूप में मिली थी। अलीगढ़ उन दिनों पाकिस्तान समर्थक मुस्लिम लीगियों का गढ़ था; पर श्री कैसर उनके विरोधी थे। 1946 में लीगियों ने भारतप्रेमी नगरपालिका अध्यक्ष श्री रफीक अहमद किदवई पर हमला कर दिया। ऐसे में श्री कैसर ने अपनी जान जोखिम में डालकर उनकी प्राणरक्षा की।

श्री कैसर भारत को अखंड देखना चाहते थे; पर कांग्रेस की ढुलमुल नीति, अंग्रेजों के षड्यन्त्र तथा मुस्लिम लीग की गुंडागर्दी के कारण उनकी इच्छा पूरी नहीं हो सकी। अतः स्वाधीनता के बाद वे प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति से दूर ही रहे। यद्यपि उनके कई साथी राजनीति में बड़े पदों पर पहुंच गये।

अलीगढ़ से शिक्षा पूर्ण कर वे बूंदी में वकालत करने लगे। 1961 में उन्होंने श्री लालबहादुर शास्त्री को वचन दिया था कि वे निर्धनों तथा वनवासियों के मुकदमे निःशुल्क लड़ेंगे। इसे उन्होंने आजीवन निभाया। 18 जुलाई, 1998 को सैयद मोहम्मद अब्दुल हमीद कैसर ‘लखपति’ का निधन हुआ।

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