राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण ही भारत को विश्वगुरू बनाएगा – डॉ. मोहन भागवत

जयपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने देश की प्रगति को ले कर नागपुर में अहम बात कही. उन्होंने कहा कि देश को आजादी मिलने के बाद बीते 70 साल में कुछ नहीं हुआ, ऐसा कहना उचित नहीं होगा. लेकिन हमारे साथ नए युग का प्रारंभ करने वाले जापान और इज़रायल जैसे देश जिस मुकाम पर हैं, हम वैसी सफलता प्राप्त नहीं कर सके.

सरसंघचालक प्रहार मिल्ट्री स्कूल (प्रहार समाज जागृति संस्था) के रजत जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे. भारत 1947 में अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ, इज़रायल का जन्म 1948 में और द्वितीय विश्वयुद्ध की मार झेलने वाला जपान भी उसी समय खड़ा होने की कोशिश में था. आजादी के समय हमारे देश के खजाने में 30 हजार करोड़ रुपए की पूंजी थी और इंग्लैंड से हमें 16 हजार करोड़ रुपए वसूलना था.

दुनिया के मानचित्र पर नए सिरे से खड़े हुए इज़रायल ने अस्तित्व में आने के बाद अगले 40 वर्षों में उन्होंने पांच लड़ाइयां लड़ीं. वर्तमान रक्षा और कृषि के क्षेत्र में दुनिया इज़रायल का लोहा मानती है. वही टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में जापान सबसे अधिक उन्नत देश के रूप में उभर कर सामने आया है. बीते 70 वर्षों में भारत में कुछ नहीं हुआ, ऐसा नहीं है. कोई भी देशभक्त ऐसा कह भी नहीं सकता. लेकिन यदि इन देशों की तरक्की से तुलना की जाए तो भारत कहां है, इसका चिंतन करने की आवश्यकता है.

राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण की आवश्यकता

लोगों की भीड़ और जमीन का टुकड़ा, इसे देश नहीं कहा जा सकता. हमें यह समझना होगा कि जल, जमीन, जंगल और जनता इन सब का एकत्रीकरण ही देश होता है. हमारे यहां लोग देश की परिकल्पना के बारे में अब तक कोई ठोस फैसला नहीं कर पाए हैं. इसी वजह से “भारत तेरे टुकड़े होंगे” कहने वालों का पक्ष लेने वाले लोग भी समाज में सामने आ जाते हैं. भारत युवाओं का देश है. मनुष्य युवा अवस्था में सबसे अधिक साहसी होता है. इसलिए जिनके पास होश है, ऐसे लोगों ने जोश से भरे युवाओं को उचित मार्गदर्शन करना चाहिए. यह देश मेरा अपना है, इसके लिए जीना और मरना मेरी जिम्मेदारी है. यह भाव देश की नई पीढ़ी में जगाने की आवश्यकता है. ऐसे राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण ही भारत को विश्वगुरू बनाएगा.

उन्होंने कहा कि देश को बड़ा बनाने के लिए उद्यम करना पड़ता है, परिश्रम करना पड़ता है, सतत करना पड़ता है और सबको करना पड़ता है. अपने देश को बड़ा बनाना, ये ठेके पर देने का काम नहीं है, सरकार करेगी, पुलिस करेगी, सेना करेगी, ऐसा नहीं है. सारे समाज को करना पड़ता है. लड़ाई हुई तो सारे समाज को लड़ना पड़ता है. सीमा पर सैनिक जाते हैं, सबसे ज्यादा खतरा वो मोल लेते हैं, लेकिन ऐसा खतरा मोल के भी उनकी हिम्मत कायम रहे, उनको सामग्री कम ना पड़े, अगर किसी का बलिदान हो गया तो उसके परिवार को यहां कोई कमी ना रहे, ये सारी चिंता करने वाला कौन है, वो समाज को ही करनी पड़ती है.

अपने देश के लिए मरने का एक समय था, स्वतंत्रता जब नहीं थी. अब आजादी के बाद अपने देश के लिए मरने का समय सीमाओं पर रहता है, जब युद्ध होता है तब. अपने यहां पर युद्ध नहीं फिर भी शहीदियां होती हैं, इसका कारण है कि हम अपना काम ठीक नहीं कर रहे, किसी के साथ युद्ध नहीं तो सीमा पर सैनिक के मरने का कारण नहीं, लेकिन होता है, अब उसको भी ठीक करना है और देश को बड़ा बनाना है तो देश के लिए जीना भी सीखना पड़ेगा, देश के लिए जीना प्रत्येक को करना पड़ेगा.

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