राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूज्य सरसंघचालक जी द्वारा विजयदशमी पर दिए गए उद्बोधन के कुछ अंश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूज्य सरसंघचालक जी द्वारा विजयदशमी उद्बोधन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूज्य सरसंघचालक जी द्वारा विजयदशमी उद्बोधन

(भाग-१)

यह वर्ष विशेष क्यों?
१) स्वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध शिकागो अभिभाषण का 125 वॉं वर्ष है।

२) उनकी शिष्या भगिनी निवेदिता के जन्म का 150 वॉं वर्ष है।

० भगिनी निवेदिता ने स्वधर्म व स्वदेश के गौरव को मन में चेताकर अपने करोड़ों देशवासियों की अहर्निश सेवा करते हुए उनको अज्ञान व अभावों से मुक्ति दिलाकर संगठित पुरुषार्थ करने की प्रेरणा दी। साथ ही यह वर्ष पूज्य पद्मभूषण कुशोक बकुला रिनपोछे की जन्मशती का वर्ष भी है।

० कुशोक बकुला रिनपोछे तथागत बुद्ध के १६ अहर्ताओं में से बकुल के अवतार थे, ऐसी पूरे हिमालय के बोद्धों में मान्यता है।

० वर्तमान में आप लद्दाख के सर्वाधिक सम्मानित लामा थे।

० सम्पूर्ण लद्धाख में शिक्षा का प्रसार, कुरीतियों का निवारण एवं समाज सुधार व राष्ट्रभाव जागरण में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

० १९४७ में जब कबाइलियों के वेष में पाक सेना ने जम्मू कश्मीर पर आक्रमण किया तो उनकी प्रेरणा से वहॉं के नौजवानों ने नुबरा ब्रिगेड का गठनकर आक्रमणकारियों को स्कर्दू से आगे बढ़ने नहीं दिया।

० जम्मू कश्मीर की विधानसभा के सदस्य, राज्य सरकार में मंत्री व भारतीय संसद में लोकसभा सांसद के रूप में अखिल भारतीय दृष्टिकोण के साथ आपका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

० आप दस वर्ष मंगोलिया में भारत के राजदूत रहे। उस कालखंड में मंगोलिया में लगभग ८० वर्षों से चली आ रही कम्युनिष्ट शासन व्यवस्था के अंत के पश्चात् आपने बौद्ध परंपराओं को पुनर्जीवित करने के वहॉं के समाज के सफल प्रयासों में महत्वपूर्ण योगदान दिया और आप वहॉं सर्वदा श्रद्धेय बन गए।

० २००१ में मंगोलिया के नागरिक सम्मान पोलर स्टार से सम्मानित किए गए।

० आपने स्वामी विवेकानंद जी के शिकागो अभिभाषण में भारत की विश्व मानवता के प्रति घोषित राष्ट्रीय दृष्टि का व्यक्तिगत व सार्वजनिक जीवन में प्रकटीकरण किया।

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