पर्यावरण की पोषक जैविक खेती

imagesआज पूरे विश्व में पर्यावरण असंतुलन पर तरह तरह के विमर्श हो रहे हैं व चिंता प्रकट की जा रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, ओजोन परत टूट रही है, पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसके मुख्यत: दो कारण हैं – पहला बढ़ती जनसंख्या तो दूसरा मनुष्य की बढ़ती आवश्यकताएँ व संसाधनों के असीमित उपभोग की प्रवृत्ति। इससे पर्यावरण प्रभावित होता है। खेती का क्षेत्र बढ़ाने व औद्योगीकरण के नाम पर पूरे विश्व में प्रतिदिन 70,000 पेड़ों का जीवन रक्षा कवच नष्ट कर दिया जाता है। भारत में सरकारी आंकड़ों में 21 प्रतिशत जंगल हैं जबकि शोध पत्रों के अनुसार यहॉं 15 – 19 प्रतिशत जंगल ही बचे हैं। नदी नालों की संख्या भी दिन प्रतिदिन घट रही है। पुनर्भरण की तुलना में दोहन अधिक होने से भूजल स्तर कम हुआ है। पेड़ों के कटने से मृदा क्षरण बढ़ा है, जिससे बंजर भूमि का क्षेत्रफल लगातार बढ़ रहा है। रही सही कसर पूरी कर दी है रासायनिक खेती ने।
भारत में कृषि का इतिहास पॉंच हजार वर्ष पुराना है। तब यहॉं जैविक खेती होती थी। पूरे विश्व को जैविक खेती भारत की देन है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में रासायनिक खेती का चलन बढ़ा। युद्ध के बाद भारी मात्रा में बचे गोला बारूद के निस्तारण का संकट आया तो विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आगे आईं। उन्होंने पौधों की बढ़वार के लिए आवश्यक नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटेशियम (NPK) को रासायनिक खाद के रूप में तथा अन्य रसायनों को कीटनाशक व खरपतवारनाशक के रूप में बेचने के लिए व्यापक प्रचार किया। इससे उन्हें रासायनिक सामग्री का अधिकतम मूल्य तो मिला ही, विकासशील देशों में कृषि क्षेत्र के रूप में नया बाजार भी मिला। धीरे धीरे इनकी जड़ें जम गईं। भारत में साठ के दशक में हरित क्रांति आई। उस क्रांति के नाम पर रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों को बढ़ावा दिया गया। संकर बीज आयात किए गए। इन बीजों, रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों के प्रयोग से पैदावार तो बढ़ी, परंतु धीरे धीरे मिट्टी की गुणवत्ता खराब होने लगी। रसायनों का असर फसल के माध्यम से मानव शरीर पर पड़ने लगा। जिससे कैंसर, त्वचा सम्बंधी व अस्थमा जैसी कई तरह की बीमारियां बढ़ने लगीं। आज भारत में रासायनिक खादों व कीटनाशकों का सालाना बाजार लगभग 15,291 अरब रुपए का है। इन रसायनों की घातकता का अंदाजा 1965 में अमेरिका वियतनाम युद्ध के दौरान घटी एक घटना से लगाया जा सकता है। युद्ध के समय वियतनाम के कुछ सैनिक जंगलों में छुप गए थे। उन्हें निशाना बनाने के लिए अमेरिका ने वियतनामी जंगलों के ऊपर लगभग 4.16 करोड़ लीटर एजेंट ऑरेंज नामक रसायन का छिड़काव करवाया था। जिसके प्रभाव से वियतनाम के लाखों हेक्टेयर जंगल समाप्त हो गए और उनकी जैव विविधता नष्ट हो गई। प्रभावित सैनिकों व नागरिकों की दूसरी पीढ़ी तक विकलांग पैदा हुई। वही रसायन आज मॉन्सेंटो कम्पनी द्वारा राउंड अप के नाम से खरपतवारनाशक के रूप में धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रचार व कम मेहनत से अधिक पैदावार के लालच ने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से किसान, लोगों के स्वास्थ्य व पर्यावरण को नुकसान ही पहुंचाया है। अच्छी बात यह है कि लोग अब इनके प्रयोगों से होने वाले दुष्प्रभावों को समझने लगे हैं और वापस पारम्परिक जैविक खेती की ओर उन्मुख हुए हैं।
जैविक खेती एक ऐसी पद्धति है जिसमें उत्पादन के लिए सिर्फ जैविक उत्पादों का ही प्रयोग किया जाता है। जिससे जीव विविधता, जैविक चक्र और मिट्टी की जैविक संरचना प्रभावित नहीं होती। इसमें मिट्टी को जीवित माध्यम माना गया है। भूमि का आहार जीवांश है। इसलिए इस पद्धति में रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर गोबर, कम्पोस्ट, केंचुआ खाद, हरी खाद, हड्डी खाद आदि का प्रयोग किया जाता है। कीटनाशक व खरपतवारनाशक के तौर पर नीम, सरसों, अरंडी, करंज आदि की खली व तेल, गोमूत्र, पंचगव्य, सड़ी हुई छाछ, लकड़ी की राख, लहसुन / मिर्च आदि के फर्मेंटेशन से तैयार उत्पादों का उपयोग किया जाता है। मित्र बैक्टीरिया, वायरस व फंगस का कल्चर मृदाजनित रोगों व फसलों में लगने वाले अन्य रोगों में बहुत प्रभावी व उपयोगी है। ट्राइकोडर्मा एक मित्र फफूंदी है जो विभिन्न प्रकार की दलहनी, तिलहनी, कपास, सब्जियों व अन्य फसलों में पाए जाने वाले मृदाजनित रोगों को सफलतापूर्वक रोकती है। ग्रेनुसोसिस वायरस भी एक ऐसा ही मित्र सूक्ष्मजीव है। इसका प्रयोग कीटों, गन्ने की अगेता तना छेदक, इंटरनोड बोरर एवं गोभी की सुंडी आदि के विरुद्ध सफलतापूर्वक किया जाता है। शत्रु कीटों के भक्षण के लिए मित्र कीटों का पालन भी कीट प्रबंधन की एक तकनीक के तौर पर बहुतायत से किया जाता है। इस तरह के कीट प्रबंधन से फसल पर कोई विषाक्त प्रभाव नहीं पड़ता। रसायनों के लगातार प्रयोग से कीटों में उस रसायन के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। थोड़े समय के बाद उनकी प्रभावी क्षमता कम हो जाती है। जैविक उत्पादों के प्रयोग से ऐसे उदाहरण कम मिलते हैं। पारिस्थतिकी तंत्र के संतुलन से लाभकारी सूक्ष्मजीवों व कीटों की संख्या में अपेक्षित वृद्धि होती है। जैविक खेती प्रकृति के अत्यंत निकट है क्योंकि इसमें अजैविक तत्वों का प्रयोग नहीं होता। यह पर्यावरण की पोषक है। जैविक खेती के अनेक लाभ हैं। यह कृषकों, पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य तीनों के लिए हितकारी है। इससे भूमि की उपजाऊ क्षमता बढ़ती है, जिससे पैदावार अधिक होती है। भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ती है, जिससे पानी का वाष्पीकरण कम होता है। सिंचाई अंतराल में वृद्धि होती है, जिससे पानी व बिजली की बचत होती है। भूमि के जल स्तर में वृद्धि होती है। जैविक खाद रासायनिक खाद की तुलना में सस्ती होती है, जिससे कृषि लागत में कमी आती है। जैविक कचरे का प्रयोग खाद बनाने में होने से कचरे का ढेर नहीं लगता, जिससे बीमारियों में कमी आती है। जैविक फसल की गुणवत्ता, रासायनिक खादों के प्रयेग से पैदा होने वाली फसल की तुलना में अधिक होती है। यूरोपियन यूनियन की एक रिसर्च के अनुसार आमतौर पर मिलने वाले खाद्य पदार्थों के मुकाबले जैविक खेती द्वारा उत्पन्न उत्पादों में चालीस प्रतिशत अधिक एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं जो शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाले फ्री रेडिकल्स से हमारी रक्षा करते हैं।
वर्तमान में भारत में लगभग 45 लाख हेक्टेअर क्षेत्र में जैविक खेती हो रही है। जैविक खेती का वैश्विक बाजार 4437 अरब रुपए का है और 341अरब रुपए से अधिक की वार्षिक दर से बढ़ रहा है। भारत का ऑर्गेनिक निर्यात 300 करोड़ का है। अभी इसमें बहुत सम्भावनाएँ हैं।
आधुनिक रासायनिक खेती ने मृदा में उपस्थित सूक्ष्म जीवाणुओं को नष्ट कर दिया है। किसी खेत में लम्बे समय तक रासायनिक खेती करने के बाद उसे जैविक खेती योग्य बदलने में 2-3 वर्ष का समय लगता है, वह भी तब, जब इस बीच रसायनों का बिल्कुल उपयोग न किया जाए।
देश में सर्वप्रथम मध्य प्रदेश में 2001-2002 में जैविक खेती अपनाने के लिए एक आंदोलन चलाया गया। जिसके तहत प्रत्येक जिले के प्रत्येक विकास खंड के 1-1 गॉंव में जैविक खेती आरम्भ की गई और इन गॉंवों को जैविक गॉंव नाम दिया गया। प्रथम वर्ष में कुल 313 गॉंवों में जैविक खेती की शुरुआत हुई। आज पूरे देश में जैविक खेती को अपनाया जा रहा है। राजस्थान का शेखावाटी क्षेत्र जैविक खेती के लिए प्रसिद्ध है। यहॉं के किसान पर्यावरण संरक्षक बनकर सामने आए हैं। वे कपास, गेहूं व तमाम तरह की सब्जियां रसायन मुक्त पद्धति से उगा रहे हैं। यहॉं के लगभग 70,000 किसान इस मुहिम से जुड़े हैं। डूंगरपुर को राजस्थान का पहला जैविक खेती वाला जिला घोषित किया गया है। यहां के 2500 किसानों  को जैविक खेती से जोड़ा गया है। प्रत्येक किसान से उसकी एक एकड़ जमीन पर जैविक खेती कराई जा रही है। 5000 किसान अपने स्तर पर जैविक खेती कर रहे हैं। यहॉं किसान अरहर, उड़द, धान, मक्का जैसी कई फसलें जैविक रूप से उगा रहे हैं। उन्हें सामान्य के मुकाबले 30-40 प्रतिशत अधिक मुनाफा हो रहा है। रासायनिक खेती से जैविक खेती पर आने में आरम्भ के 2-3 वर्षों में पैदावार कम होती है, जिससे कई किसान वापस रासायनिक खेती पर आ जाते हैं। परंतु कुछ समय बाद पैदावार अच्छी होती है। जैविक उत्पादों का मूल्य भी रासायनिक उत्पादों की तुलना में अच्छा मिलता है। आज लोगों में जैविक उत्पादों को प्राप्त करने की चाहत बढ़ रही है। भारत में हर सप्ताह जैविक उत्पादों के लगभग 5 नए आउटलेट खुल रहे हैं। अलवर के रामसिंह व सीकर के हनुमान सिंह जैसे प्रगतिशील किसान खीरा, टमाटर, शिमला मिर्च आदि की जैविक खेती से सालाना 6-10 लाख रुपए का शुद्ध लाभ कमा रहे हैं। जैविक खेती पर्यावरण व किसान दोनों के लिए लाभकारी है। यह पर्यावरण संतुलन की ओर एक कदम बढ़ाने के साथ ही अपनी जड़ों की ओर लौटने जैसा है।
डॉ. शुचि चौहान

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