संघ के बारे में श्री तवलीन सिंह के विचार

तवलीन सिंह जी का स्तम्भ (कॉलम)

इंडियन एक्सप्रेस 20,मार्च ,2016

हिंदुत्व और जिहाद दोनों की तुलनात्मक विश्लेषण करते करते संघ के ऊपर आगयी।वैसे कोई भी popular organisation की जिम्मेदारी अनेक विधि से मूल्यांकित की जाती है।सामान्यतः जैसा मेने अनुभव किया संघ का जन्म और प्रशिक्षण और दार्शनिक शब्द रचना महाराष्ट्र में पैदा होने के कारन ,शेष भारत ने उन शब्दों को हमारे परिवर्तित स्वाभाव पर भी मढ़ा।इतना महत्वपूर्ण भूमिका में हम पहुचेंगे ,यह हम भी नहीं जानते थे।संघ की सोच में प्रशिक्षण महाराष्ट्र के अखाड़ो की परम्परागत खेलकूद,कुछ हथियार जैसे तलवार,लाठी,वेतचर्म थे। ये आज नहीं है क्योकि प्रादेशिक स्वाभाव को राष्ट्रीय स्तर पर वदलने का निरंतर प्रयास हुए।हिंदुत्व सावरकर द्वारा प्रतिपादित हिंदुत्व संघ का हिंदुत्व में बहुत विशाल अंतर भी है।लोकसेवा में हिन्दू प्रेरणाओं की भूमिका अधिक है।सारे विचारो को आधुनिक परिवेश में कैसे व्यक्त करे।कोई शोध संस्थानों स्थापित नहीं हुए, फिर भी संगठन में शीर्ष अधिकारियो के विचार ही मार्गदर्शन करते चले आरहे थे।मुस्लिम समाज के साथ भी घुले मिले।वाराणसी में संघ कार्यालय में नमाज़ पढ़ने के वाद 40 वर्षो तक सुदर्शन जी के पास बहुत मुस्लिम विद्वान निमंत्रण पर आते थे।क्या नाम दिया उस मिलन का भूल गया हु।गुलाम दस्तगीर जी संस्कृत भारती के अध्यक्ष थे।काशी आते थे।उनके विचारो से भी हम प्रभावित होते थे।हिंसा से दुरी बढ़ेगी ही ,यह सिद्दांत सब जगह लागु है।मेरे दोस्त् के घर से मेरे घर का गांव में हिंसक लड़ाई जैसी हो गयी1960में,11वर्ष के थे।हम दोनों में प्रेम था।स्कूल में साथ साथ रहते।अन्यो के लिए भाई भाई।एक गांव के,एक खानदान क,े परंतु गांव में पहुचने के वाद ,जबतक घरो में मेलमिलाप नहीं होगया ,मिलना मुश्किल था।मुस्लिम समाज क्या प्रयास करता है ।ज्ञात नहीं है।संघ क्या प्रयास करता है।यह भी ज्ञात है लेकिन उसका प्रभाव खत्म करने में कितना समय लगता है मीडिया को।मेलमिलाप का विस्वास कैसे वनता है।उसमे हम फिसड्डी भी है।या स्वीकार करे कि कमजोर है।संघ हिंसा विरोधी है परंतु कायर संगठन नहीं है।कानून का सत्कार करता है।क्योकि किसी आंदोलन में प्रत्यक्ष संघ भाग ही नहीं लेता है।सेवा,प्रशिक्षण,शिक्षा, स्वास्थ सेवा।इतने तक उसकी चादर है।विशुद्ध देशी संगठन होने के कारन इस्लाम का अध्ययन न के वरावर है।ये भी कुछ partition काल में पूर्वाग्रहों का बाजार भी गर्म था।और आक्रांता ही मुस्लिम वादशाह नवाव हुए।धर्मपरिवर्तन ,उत्पीड़न से भारत कराहता रहा।हिन्दू कराहट में मुस्लिम वनने की पीड़ा भी सम्मिलित थी।धार्मिक सामाजिकता बड़ी क्षिप्र गति से चली और हिन्दू दुरी भी उसी गति से बढ़ी।पाकिस्तान का वनाना अग्रेजो की चाल थी।मुस्लिम नेताओ की भागीदारी थी,हिंसा थी।कांग्रेस नेताओ की भागीदारी और स्वीकृति भी थी।वदनाम संघ को किया गया।जिसका अस्तित्व ही बहुत छोटा था।संघ में कौन आया कौन गया ,आजतक कोई लेखाजोखा नहीं है।कोई माह दो माह आकर आना बंद करदे ।उसका कोई लेखा जोखा नही था स्मरण ही थां।गांधीजी की हत्या के वाद वेतर्क कोई संघ पर आरोप नहीं,फिर भी प्रतिवंध लगा दिया,आयोग वैठे और जेल भी डेढ़ वर्ष तक रहे,हद ही थी।संविधान तो था ही नहीं।ब्रिटिश कानून छोड़कर गए थे।अच्छा ही हुआ कि इन्होंने कितने स्वयं सेवक मारे गए।उनका हिसाव किताव भी नहीं है ।आज सिखो का1984 का हिसाव है।गुजरात में मुस्लिम मृतको का है।न संघ उस समय लगा सका आरोप।न कोई सुनवाई भी संभव थी।गांधी जी के नाम पर हजारो जीवन लीलाये चली गयी,आसू भी न वहा सके।बड़ा पेड़ गिरा ,धरती हिली ,हजारो ही धरती में समागये, मेने विनोवजी से पूछा था,वे चुपरहे।चलो समाज झेलता है ,बेरुखी भी दरियादिलो की।मेरी समझ में भोला मुस्लिम भी है और भोले हिन्दू भी है ।दोनों ही भूमिका से अछूते है।पाकिस्तान या आतंकी संगठनो की हिंसक क्षमताये आरएसएस की तो ओखात् ही नहीं है कि उनका मुकावला हथियारों से कर सके। इतने हथियार कौन रखेगा, कहा रखेगा ,हिन्दू को विश्व में कौन पूछता है।जिसे अपने ही घर में जब तक धर्मनिरपेक्ष न हो जाय, वमपंथी न हो जाय, कौन यहाँ पूछता है,दीदी तवलीनसिहजी।संघ विशुद्ध राष्ट्र हितेषी भारतमाता पूजक संगठन है, जो कालांतर में और विस्तृत होगा।मुस्लिम भी सोचे कैसे सारे समाज एक होंगे।राजनेतिक प्रतिक्रियाएं ,आशंकाये निर्माण करती है।सत्य और स्वार्थ को अलग करना होगा।मुस्लिम भी सोचे हिन्दू भी सोचे।हिंसक वारदाते जॉइंट venture से अलगठलग हो ।जो समाज जस्टिस में विस्वास करे उस के लिए आवाहन करे।जस्टिस रामरतन committee BHU आंदोलनों के समय कुलपति डॉ श्रीमाली जी वेठाते थे।परिणाम आम छात्र की जवान पर होता था,किसको निकाला जायेगा।राजनेतिक सत्य सत्य नही होंगे तो कोन विस्वास करेगा।अतः सत्य के नज़दीक भी रहना होगा।

रमेन्द्र कुमार

मेरे बाबू जी संघ के स्वयंसेक रहे अपनी मृत्युकाल तक। पेसे से वकील भी। मुझे अच्छी तरह स्मरण है कि संघ से नफरत रखने( गुमराह या दिग्भर्मित रहने के कारण) वाले मुसलमान व्यक्तिगत रूप से अपने किसी भी समस्या में उन पर ज्यादा विशवास रखते थे सहयोग या सहायता के लिये। बलिया में ही पण्डित श्री जगरनाथ जी शुक्ल संघ के नगर संघचालक के यहां मुसलमानो की कतार लगती थी सहायता के लिए। जब मुसलमानो से कहा जाता की तुम संघ वालों के पास सहायता के लिए क्यों जाते हो किसी कांग्रेसी या साम्यवादी जिनका तुम समर्थन करते हो के पास क्यों नही जाते तो उनका उत्तर रहता कि वो सब कांग्रेसी या साम्यवादी कोइ सहायता नही करते उल्टे उन्हें केवल अपने पीछे घुमाते हैं व् रुपया पैसा कमाते हैं। बलिया में मैंने देखा की मुसलमान संघ का विरोध तो करता था राजनैतिक लेकिन उसका भरोसा संघ के स्वयंसेवको पर ज्यादा रहता अपनी हिफाजत या व्यकिगत कामों में।

बहुत पहले कानपुर गया था, माननीय बैरिस्टर साहब(अब स्व्.तत्कालीन प्रान्त संघचालक जी) के यहां ठहरा था, एक दिन जूते व् होल्डाल की दूकान पर गया ,जूता व् होल्डाल पसन्द किया लेकिन न लेने की गरज से कह दिया की मेरे पास पैसे कम हैं बाद में लूंगा। दुकानदार जो मुसलमान था बोला की बाबू कहाँ से आये हो व् कहाँ ठहरे हो तो मैंने कहा की मैं तो बलिया से आया हूँ संघ कार्य में व् बैरिस्टर साब के यहां ठहरा हूँ तो वह बोला बैरिस्टर साहब यानि नरेंद्र भाई के यहां, तब तुम बाकी लगा कर भी सामान ले जा सकते हो, मैं जानता हूँ संघ का स्वयंसेवक जान मार सकता है लेकिन किसी का रुपया पैसा या धन नहीं।
काशी में भी अपने संघ के बड़े लोगों के प्रति वहां के मुसलमानों में सम्मान का भाव देखा हूँ।श्री राम बहादुर राय व् श्री सुरेश अवस्थी जो अ. भा. वि. परिषद के पदाधिकारी थे के साथ एक बार राय साहब के कोदई चौकी आवास से घटाटे राम मन्दिर आ रहा था रास्ते में मुसलमानो की बस्ती पड़ती थी वहां भी मुसलमानों में राय साहब व् अवस्थी जी के प्रति मुसलमानो में सम्मान देखा।

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