23 जुलाई / जन्मदिवस – लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

th (2)नई दिल्ली. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐसे कई महानायक हैं, जिन्होंने अपने महान कार्यों से देश को स्वतंत्र कराने में अहम भूमिका निभाई है. ऐसे ही एक महान नेता हैं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक. बाल गंगाधर को आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है. उन्होंने स्वतंत्रता के साथ देश को आगे बढ़ाने के लिये शिक्षा पर जोर दिया था.

वह एक पारम्‍परिक सनातन धर्म को मानने वाले हिन्‍दू थे. उनका अध्‍ययन असीमित था. उनके शोध-प्रबंधों में उनके गहन-गम्‍भीर अध्‍ययन का परिचय मिलता है. अपने धर्म में प्रगाढ़ आस्‍था होते हुए भी उनके व्‍यक्तित्‍व में संकीर्णता का लेशमात्र भी नहीं था. अस्‍पृश्‍यता के वह प्रबल विरोधी थे. इस विषय में एक बार उन्‍होंने स्‍वयं कहा था कि जाति-प्रथा को समाप्‍त करने के लिये वह कुछ भी करने को तत्‍पर हैं. महात्‍मा फुले जैसे ब्राह्मण विरोधी व्‍यक्ति ने उनके व्‍यक्तित्‍व से प्रभावित होकर ही कोल्‍हापुर मानहानि मुकद्मे में उनके लिये जमानत करने वाले व्‍यक्ति की व्‍यवस्‍था की थी.

बीसवीं सदी के प्रारम्भ में भारतीय स्वतन्त्रता के आन्दोलन में एक मंच के रूप में कार्यरत कांग्रेस में स्पष्टतः दो गुट बन गये थे. एक नरम तो दूसरा गरम दल कहलाता था. पहले के नेता गोपाल कृष्ण गोखले थे, तो दूसरे के लोकमान्य तिलक. इतिहास में आगे चलकर लाल-बाल-पाल नामक जो त्रयी प्रसिद्ध हुई, उसके बाल यही बाल गंगाधर तिलक थे, जो आगे चलकर लोकमान्य तिलक के नाम से प्रसिद्ध हुये.

लोकमान्य तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था. बचपन से ही उनकी रुचि सामाजिक कार्यों में थी. वे भारत में अंग्रेजों के शासन को अभिशाप समझते थे तथा उसे उखाड़ फैंकने के लिये किसी भी मार्ग को गलत नहीं मानते थे. इन विचारों के कारण पूना में हजारों युवक उनके सम्पर्क में आये. इनमें चाफेकर बन्धु प्रमुख थे. तिलक जी की प्रेरणा से उन्होंने पूना के कुख्यात प्लेग कमिश्नर रैण्ड का वध किया और तीनों भाई फाँसी चढ़ गये.

वर्ष 1897 में महाराष्ट्र में प्लेग, अकाल और भूकम्प का संकट एक साथ आ गया. लेकिन क्रूरतापूर्ण ब्रिटिश शासन ने ऐसे में भी जबरन लगान की वसूली जारी रखी. इससे तिलक जी का मन उद्वेलित हो उठा. उन्होंने इसके विरुद्ध जनता को संगठित कर आन्दोलन छेड़ दिया. इससे क्रुद्ध होकर ब्रिटिश शासन ने उन्हें 18 मास की सजा दी. तिलक जी ने जेल में अध्ययन का क्रम जारी रखा और बाहर आकर फिर से आन्दोलन में कूद गये.

तिलक जी एक अच्छे पत्रकार भी थे. उन्होंने अंग्रेजी में ‘मराठा’ तथा मराठी में ‘केसरी’ साप्ताहिक अखबार निकाला. इसमें प्रकाशित होने वाले विचारों से पूरे महाराष्ट्र और फिर देश भर में स्वतन्त्रता और स्वदेशी की ज्वाला भभक उठी. युवक वर्ग तो तिलक जी का दीवाना बन गया. लोगों को हर सप्ताह केसरी की प्रतीक्षा रहती थी. अंग्रेज इसके स्पष्टवादी सम्पादकीय आलखों से तिलमिला उठे. बंग-भंग के विरुद्ध हो रहे आन्दोलन के पक्ष में तिलक जी ने खूब लेख छापे. जब खुदीराम बोस को फाँसी दी गयी, तो तिलक जी ने केसरी में उसे भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी.

अंग्रेज तो उनसे चिढ़े ही हुये थे. उन्होंने तिलक जी को कैद कर छह वर्ष के लिये बर्मा की माण्डले जेल में भेज दिया. वहाँ उन्होंने ‘गीता रहस्य’ नामक ग्रन्थ लिखा, जो आज भी गीता पर एक श्रेष्ठ टीका मानी जाती है. इसके माध्यम से उन्होंने देश को कर्मयोग की प्रेरणा दी.

तिलक जी समाज सुधारक भी थे. वे बाल-विवाह के विरोधी तथा विधवा-विवाह के समर्थक थे. एक अवसर पर उन्‍होंने स्‍वयं कहा था कि कहने भर से विधवा-विवाह को समर्थन नहीं मिलेगा. यदि कोई वास्‍तव में इसे प्रोत्‍साहन देना चाहता है, तो उसे ऐसे अवसरों पर स्‍वयं उपस्थि‍त रहना चाहिये और इनमें दिए जाने वाले भोजों में अवश्‍य भाग लेना चाहिये. निश्‍चय ही तिलक अपने समय के सर्वाधिक आदरणीय व्‍यक्तित्‍व थे. धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों में वे सरकारी हस्तक्षेप को पसन्द नहीं करते थे. उन्होंने जनजागृति के लिये महाराष्ट्र में गणेशोत्सव व शिवाजी उत्सव की परम्परा शुरू की, जो आज विराट रूप ले चुकी है.

स्वतन्त्रता आन्दोलन में उग्रवाद के प्रणेता तिलक जी का मानना था कि स्वतन्त्रता भीख की तरह माँगने से नहीं मिलेगी. अतः उन्होंने नारा दिया – ‘ स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर ही रहेंगे.’ इस नारे के साथ बाल गंगाधर तिलक ने इंडियन होमरूल लीग की स्थापना की. सन 1916 में मुहम्मद अली जिन्ना के साथ लखनऊ समझौता किया, जिसमें आज़ादी के लिये संघर्ष में हिन्दू- मुस्लिम एकता का प्रावधान था.

वे वृद्ध होने पर भी स्वतन्त्रता के लिये भागदौड़ में लगे रहे. जेल की यातनाओं तथा मधुमेह से उनका शरीर जर्जर हो चुका था. मुम्बई में अचानक वे निमोनिया बुखार से पीड़ित हो गये. अच्छे से अच्छे इलाज के बाद भी वे सँभल नहीं सके और एक अगस्त, 1920 को मुम्बई में ही उन्होंने अन्तिम साँस ली. उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए महात्मा गांधी ने उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता की उपाधि दी. आधुनिक भारत की नींव रखने वाले लोकमान्य तिलक को देश आज भी याद करता है. आज के नेताओं को इस महान व्यक्तित्व से प्रेरणा लेने लेने की आवश्यकता है.

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