वे ‘आजाद’ थे और हमेशा ‘आजाद’ ही रहे

23 जुलाई  क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद की जयंती

आज वीर क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद की जयंती है। आजाद को अंग्रेज सरकार ऐड़ी चोth (3)टी का जोर लगाने के बावजूद भी जिन्दा ​गिरफ्तार नहीं कर पाई। वे ‘आजाद’ थे और हमेशा ‘आजाद’ ही रहे। उन्होंने भारत माँ के लिए शहादत देकर अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित करा दिया। यह देश हमेशा उनका ऋणी रहेगा। उनके जन्म दिवस पर इस वीर सपूत को कोटि-कोटि नमन।

                                                                    जीवन परिचय
जन्म—23 जुलाई, 1906
स्थान—बदरका गांव, जिला उन्नाव, उत्तर प्रदेश।
पिता—श्री पंडित सीताराम तिवारी
माता—श्रीमती जगरानी देवी
सन् 1921—राष्ट्रव्यापी असहयोग आन्दोलन लेने पर विद्यार्थी आजाद को 15 बैंतों की सजा। हर बैंत पर मुख से ‘भारत माता की जय’ का उच्चारण।
सन् 1922—चौरा-चौरी घटना के बाद असहयोग आन्दोलन वापिस लेने पर क्रांतिकारी राह चुनी।
सन् 1924— ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकल एसोसिएशन’(हिन्दुस्तान प्रजातांत्रिक संघ) की सदस्यता।
9 अगस्त 1925—रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में काकोरी के रेलवे स्टेशन पर कलकत्ता मेल के सरकारी खजाने को लूटा।
25 अगस्त 1927— इस ति​थि तक सभी क्रांतिकारी पकडे गए। मुकदमें चले लेकिन आजाद हाथ नहीं आए। ।
19 दिसम्बर 1927—पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, अफशफाक उल्ला खां, रोशन सिंह आदि शीर्ष क्रांतिकारियों को फांसी पर लटका दिया।
सन् 1928—चन्द्रशेखर ने ‘एसोसिएशन’के मुख्य सेनापति की बागडोर संभाली।
3 फरवरी 1928—‘साईमन’की अध्यक्षतावाले कमीशन का लाला लाजपतराय के नेतृत्व में कडा विरोध। अंग्रेजी की सिर में लाठी लगने से लालाजी की मौत।
17 दिसम्बर 1928—दोषी अंग्रेज अधिकारी साण्डर्स को मौत के घाट उतारकर लालाजी की मौत का प्रतिशोध पूरा किया।
8 अप्रैल1929—असेम्बली में बम धमाके के बाद सरदार भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की गिरफ्तारी।
27 फरवरी 1931— आजाद ने इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस द्वारा चारों ओर से घेर लिया गया। आजाद ने अंग्रेजों का जमकर मुकाबला किया। अंत में उनके पास एक ही गोली बची। ब्रिटिश पुलिस के हाथों गिरफ्तारी की बजाय उन्होंने उस गोली से खुद को खत्म करना बेहतर समझा।

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