आध्यात्मिक कर्मयोगी: श्री गुरुजी-भाग 1

राष्ट्राभिमुख समाज रचना के पुरोधा आदरणीय माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्री गुरु जी’ के राष्ट्र समर्पित जीवन के अनेक प्रेरक प्रसंग हमारा मार्ग दर्शन कर सकते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी ने अपने 33 वर्षों के सक्रिय एवं संघर्षशील कालखंड में राष्ट्र पर आई प्रत्येक विपत्ति के समय देश की जनता और सरकार का मार्गदर्शन किया. ऐसे प्रत्येक अवसर पर अपने संगठन को लगाकर राष्ट्रविरोधी तत्वों को पराजित किया.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जी  21 जून 1940 को अपना शरीर छोड़कर ब्रह्मलीन हो गए. उन्हीं के निर्णय एवं आदेशानुसार श्री गुरुजी ने सरसंघचालक का दायित्व संभाला. उस समय देश को स्वतंत्र करवाने के प्रयास जोरों पर थे. महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 9 अगस्त 1942 को देशव्यापी ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की घोषणा की. उन्होंने भारत के कोने कोने में जाकर स्वयंसेवकों को इस संघर्ष में भाग लेने का आह्वान किया.

श्री गुरुजी ने आह्वान किया “हमारा अहोभाग्य है कि हम आज जैसी संघर्षशील परिस्थिति में पैदा हुए हैं. ऐसे संकटकाल में ही अपने सच्चे कर्त्तव्य, त्याग, और पौरुष को प्रदर्शित करने का अवसर उपस्थित होता है.” भारत की स्वतंत्रता के लिए कुछ समय ही चले इस भारत छोड़ो आंदोलन के समय श्री गुरुजी ने राष्ट्रव्यापी संगठित शक्ति के अभाव का अनुभव किया. और संघ कार्य को बढ़ाने के लिए पूरे देश में प्रवासरत रहने का निश्चय किया.

द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के प्रवास एवं कड़े परिश्रम के फलस्वरूप देश में संगठित हिन्दू शक्ति का जागरण हुआ. इसी संगठित शक्ति ने  मोहम्मद अली जिन्ना (मुस्लिम लीग) द्वारा घोषित सीधी कार्रवाई के तहत हिन्दुओं की सामूहिक हत्याओं की साजिश का प्रतिकार किया.16 अगस्त 1946 को प्रारंभ हुई इस सीधी कार्रवाई का उद्देश्य भारत में द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत को बल प्रदान करना था. श्री गुरुजी ने भारत के विभाजन का डट कर विरोध किया. कांग्रेस की कमजोर और अंग्रेजपरस्त मानसिकता, मुसलमानों की हिंसक एकजुटता और अंग्रेजों की साम्राज्यवादी साजिश का ही परिणाम था भारत का विभाजन और एक इस्लामिक देश पाकिस्तान का निर्माण.

03 जून 1947 को भारत के दो टुकड़े करने की घोषणा के साथ ही संभावित पाकिस्तान की धरती पर हिन्दुओं के संहार का खूनी तांडव शुरू हो गया. श्री गुरुजी ने संघ के स्वयंसेवकों को अपने समाज की रक्षा करने का आदेश दिया. उस संकटकालीन समय में स्वयंसेवकों द्वारा हिन्दू समाज की रक्षा करने, उन्हें सुरक्षित भारत में लाने, सम्मानपूर्वक बसाने जैसे पराक्रमी कार्यक्रम भारत के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय बन गए हैं.

भारत माता की एक भुजा को काटकर बनाए गए पाकिस्तान के मजहबी नेताओं ने भारत को भी पाकिस्तान बनाने के लिए हिंसक प्रयास करने प्रारंभ कर दिए. ‘हक से लिया है पाकिस्तान-लड़कर लेंगे हिंदुस्तान’ के नारे लगने शुरू हो गए. इसी मजहबी साजिश के अंतर्गत पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर की सीमा पर आक्रमण कर दिया. जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरीसिंह को अपनी रियासत का भारत में विलय करने के लिए तैयार करने में श्री गुरुजी ने मुख्य भूमिका निभाई.

18 अक्तूब 1947 को श्रीनगर में हुई महाराजा एवं श्री गुरु जी की भेंट एवं वार्ता भारत के गृहमंत्री सरदार पटेल जी के आग्रह पर हुई थी. इस भेंटवार्ता के परिणामस्वरूप महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्तूब 1947 को जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय करने के लिए ‘विलय पत्र’ पर हस्ताक्षर कर दिए. 27 अक्तूबर 1947 को भारत के गवर्नर जनरल लॉर्डमाउंटबेटन द्वारा इस विलय को स्वीकार कर लिया गया. श्री गुरुजी के आह्वान पर जम्मू-कश्मीर की रक्षा करने में संघ के स्वयंसेवकों ने बलिदान देकर अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को निभाया.

उल्लेखनीय है कि जम्मू कश्मीर का भारत में विलय करवाने में अपने महत्वपूर्ण योगदान का श्रीगुरु जी ने कहीं भी उल्लेख नहीं किया. केवल मात्र सरदार पटेल को चिट्ठी में इसकी जानकारी देकर वे चुपचाप अपने संगठन कार्य में लग गए. वे अपनी प्रशंसा, नाम, प्रसिद्धि और प्रचार से कोसों दूर रहते थे.

द्वितीय सरसंघचालक के नेतृत्व में बढ़ती संगठित हिन्दू शक्ति से अनेक कांग्रेसी नेता एवं मुस्लिम लीग नेता घबरा गए. संघ की शाखाओं और हिन्दुओं के घरों और आस्थास्थलों पर योजनाबद्ध हमले होने लगे. ऐसे संवेदनशील समय में 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी जी की हत्या हो गई. कांग्रेसी, मुस्लिम लीगियों, वामपंथियों और सरकार में मौजूद संघ के घोर विरोधियों ने इस जघन्य हत्या के लिए संघ को दोषी ठहराया स्वयंसेवकों पर अत्याचारों की झड़ी लगा दी.

श्रीगुरु जी ने सभी स्वयंसेवकों को शांत रहने का आदेश दिया. उन्होंने महात्मा जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा – “गांधी जी विभिन्न प्रवृत्तियों के लोगों को एक सूत्र में पिरोकर उनका सही मार्गदर्शन करने वाले एक कुशल कर्णधार थे.” कम्युनिस्टों, लीगियों और तथा कथित धर्मनिरपेक्ष कांग्रेसियों के दबाव में आकर 01 फरवरी 1948 को श्रीगुरु जी गिरफ्तार कर लिए गए. 04 फरवरी को संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

श्री गुरुजी ने दूरदर्शिता दिखाते हुए संघ को विसर्जित कर दिया. स्वयंसेवकों को शांत परंतु निडर रहने का आदेश देकर उन्होंने साहसपूर्वक सरकार को चुनौती देकर कहा – ‘आरोप सिद्ध करो या प्रतिबंध हटाओ.’ सभी प्रकार के आग्रह एवं पत्राचार के विफल होने पर श्री गुरुजी ने सत्याग्रह करने की घोषणा कर दी. 09 दिसंबर 1948 को प्रारंभ हुए इस पूर्णतया अहिंसक परंतु प्रचंड आंदोलन में 77090 स्वयंसेवक सत्याग्रह करके जेलों में पहुंच गए. ध्यान देने की बात यह है कि इस ऐतिहासिक सत्याग्रह में भाग लेने वाले संघ के स्वयंसेवकों की संख्या पूर्व में कांग्रेस द्वारा किए सत्याग्रह से 3 गुना थी.

श्री गुरुजी ने स्वयंसेवकों से स्पष्ट कहा था कि अभी-अभी देश स्वतंत्र हुआ है. ऐसी संवेदनशील घड़ी में विरोधियों के साथ थोड़ा सा भी टकराव देश की एकता के लिए घातक होगा. अतः अत्याचार सहते हुए भी शांत रहें. ऐसी थी उनकी राष्ट्र हितार्थ दूरदर्शी सोच.

अंत में सरकार झुकी और 12 जुलाई 1949 को सरकार ने बिना शर्त सभी आरोपों से मुक्त करते हुए संघ पर से प्रतिबंध हटा लिया. जेलों में बंद स्वयंसेवकों को तुरंत रिहा कर दिया गया. श्री गुरुजी ने तुरंत सारे देश का सघन प्रवास करते हुए स्वयंसेवकों का पूरे देश में शाखाओं का जाल बिछाने के लिए आह्वान किया.………………….क्रमशः

 

लेखक

नरेंद्र सहगल

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