रा. से. समिति की बैठक में पारित प्रस्ताव – जनसंख्या असंतुलन भारत के लिए विकट संकट

राष्ट्र सेविका समिति की अखिल भारतीय कार्यकारिणी एवं प्रतिनिधि मंडल बैठक

गत 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस पर देश के कई चिंतकों ने भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या पर चिंता व्यक्त की. राष्ट्र सेविका समिति का यह मत है कि बढ़ती हुई जनसंख्या के विभिन्न पक्षों पर विचार करते हुए अधिकांश चिंतकों ने हिन्दू जनसंख्या के बिगड़ते हुए संतुलन के कारणों पर कोई विचार नहीं किया. सन् 2011 की जनगणना के धर्म आधारित जनसंख्या के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. वास्तव में जनसंख्या केवल आंकड़े नहीं हैं, उस समूह की पहचान होती है. भारत की जनसंख्या का तेजी से बढ़ता हुआ असंतुलन न केवल भारत की पहचान समाप्त कर रहा है, अपितु भारत के अस्तित्व के लिए भी खतरा बनता जा रहा है. भारत की पहचान सर्वपंथ समादर, वसुधैव कुटुंबकम, नारी सम्मान आदि सद्गगुणों से है जो यहां के मूल निवासियों के कारण निर्माण हुई है. जनसंख्या में हिन्दुओं का घटता अनुपात न केवल भारत की पहचान व अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है, बल्कि देश के आर्थिक विकास, प्राकृतिक संसाधनों तथा कार्य क्षमता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा है.

सन् 1951 में कुल जनसंख्या का 88 प्रतिशत रहने वाला हिन्दू समाज लगातार घटते हुए पहली बार 80 प्रतिशत से कम हो रहा है. इसके विपरीत मुस्लिम समाज जो 9.8 प्रतिशत था, अब बढ़कर 15 प्रतिशत हो गया है. जिन जिलों या राज्यों में हिन्दुओं की संख्या कम हुई है, वहां की स्थिति को देखकर भविष्य के संकेत सरलता से समझे जा सकते हैं. पूरी कश्मीर घाटी, बिहार व बंगाल के तीन-तीन जिले, केरल के 2 जिले व आसाम के 9 जिले तथा उत्तर प्रदेश के कई जिलो में सांप्रदायिक सौहार्द लगभग समाप्त हो चुका है. इनमें से कई स्थानों पर तो राज्य सरकारें भी पंगु दिखाई देती हैं. इसीलिए कई मुस्लिम नेता धमकी देते हैं कि जब हम 20 प्रतिशत हो जाएंगे तो देश हमारी शर्तों पर चलेगा. जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण सड़कों व ट्रेन ट्रैक पर की जा रही नमाज उनकी शक्ति का प्रदर्शन है. जनसंख्या का यह असंतुलन भारत की अखंडता के लिए पहले भी संकट निर्माण कर चुका है क्योंकि इसी आधार पर 1947 में भारत विभाजन हुआ था.

राष्ट्र सेविका समिति जनसंख्या के बढ़ते असंतुलन के लिए रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की घुसपैठ, ईसाईयों व मुसलमानों द्वारा किए जा रहे धर्मांतरण, व मुस्लिम समाज द्वारा जनसंख्या बढ़ाने को अपना धार्मिक कर्तव्य मानना आदि को प्रमुख कारण मानती है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त हजारिका आयोग ने स्पष्ट लिखा है कि पूर्वोत्तर में बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण वहां के मूल निवासी 2047 तक अल्पसंख्यक बन जाएंगे. जिहादियों की हिन्दुओं के प्रति आक्रामक नीति के कारण कुछ क्षेत्रों में हिन्दुओं का पलायन भी हो रहा है, जिसके कारण उन क्षेत्रों में असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है. राष्ट्र सेविका समिति की यह प्रतिनिधि सभा भारत में जनसंख्या असंतुलन के कारणों और परिणामों पर गंभीर चिंता व्यक्त करती है तथा केंद्र सरकार से आग्रह करती है कि –

  1. संपूर्ण देश के लिए समान राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का निर्धारण करे जो देश के सभी समाजों पर समान रूप से लागू हो.
  2. सीमा पार से हो रही घुसपैठ पर पूर्ण रूप से अंकुश लगाया जाए. राष्ट्रीय नागरिक पंजिका (एनआरसी) पूरे देश में लागू की जाए व घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें भारत से निष्कासित किया जाए.
  3. भारत सरकार द्वारा उन्हें भारत की नागरिकता लेने से रोकने की पूर्ण व्यवस्था की जाए, साथ ही उनके द्वारा भारत में अचल संपत्ति खरीदने पर पूर्ण रोक लगाने की सुनिश्चित व्यवस्था करे.
  4. धर्मांतरण जनसंख्या असंतुलन के साथ-साथ देश की सुरक्षा पर संकट व सामाजिक संघर्ष भी निर्माण करता है. विश्व के अनेक देशों ने इसके दुष्परिणामों का भी अनुभव कर इसे ठीक करने का प्रयास भी किया है. इस पर प्रभावी रोक लगाने के लिए एक सशक्त विधान बनाया जाए.

राष्ट्र सेविका समिति सभी कार्यकर्ता बहनों एवं देशवासियों को आह्वान करती है कि वे जनसंख्या असंतुलन निर्माण करने वाले सभी कारणों की पहचान करते हुए देश को इस विकट संकट से बचाने के लिए सभी विधि सम्मत प्रयास करें.

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