अयोध्या – काश! बाबरी ढांचे का सच मुसलमानों को बताया होता ……

अयोध्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आ चुका है. पूरे देश को इस निर्णय का इंतजार था. सर्वोच्च न्यायालय ने रामलला के पक्ष में फैसला दिया है. अयोध्या का मामला अदालत के बाहर भी सुलझ सकता था, यदि देश के मुसलमानों को मुस्लिम नेतृत्व ने, खास तौर पर न्यायालय में मुस्लिम पक्षकारों ने, सत्य बताया होता. लेकिन वोट बैंक की राजनीति हावी होती चली गई. मुस्लिमों को बताया जाना चाहिए था कि राम जन्मभूमि पर वास्तविक प्रमाण क्या कह रहे हैं. शरियत में बाबरी ढांचे की क्या स्थिति है. प्रारंभ में मुस्लिम पक्षकारों ने एक अच्छी बात कही थी, जब 01 फरवरी 1986 को रामलला को मुक्त करने (जन्मभूमि का ताला खोलने) के न्यायालय के आदेश के विरुद्ध बाबरी मस्जिद समन्वय समिति गठित हुई. सैय्यद शहाबुद्दीन इसका नेतृत्व कर रहे थे. शहाबुद्दीन ने कहा कि यदि सिद्ध हो जाए कि मंदिर को गिराकार बाबरी ढांचा बनाया गया है तो वे खुद अपने हाथों से उसे ढहाकर जगह हिन्दुओं को सौंप देंगे. बाकायदा हस्ताक्षर करके जारी किए गए इस वक्तव्य में कहा गया था कि यदि यह सिद्ध हो जाता है कि वहां पहले मंदिर था तो शरीयत के अनुसार वह मस्जिद कहलाने की हकदार नहीं. उनकी इस बात को गंभीरता से लिया गया, और सबूत पेश करने की कवायद शुरू हुई.

वर्ष 1986 में जो साक्ष्य उपलब्ध थे, वे थे ब्रिटिश शासन काल के गजेटियर. जिनमें स्पष्ट रूप से ये कहा गया था कि अयोध्या में हिन्दुओं के अत्यंत पवित्र माने जाने वाले राम जन्मस्थान पर बने मंदिर को तोड़कर बाबर ने एक ढांचा खड़ा किया. ब्रिटिश दस्तावेजों में उक्त आशय की बात लिखने वालों में न्यायाधीश एफ ई ए चैमियर, पी कार्नेगी, ऑस्ट्रिया का एक जेसुआइट पादरी टीफेनथेलर, ब्रिटिश सर्वेक्षक मोंटगोमरी मार्टिन, गजेट लेखक एडवर्ड थार्नटन आदि. जब इन प्रमाणों को सामने रखा गया तो ‘अंग्रेजों की बात का क्या भरोसा करना’ और “अंग्रेज तो हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़वाना चाहते थे, इसलिए इस तरह की बातें उन्होंने लिख दी हैं” आदि कहकर इन प्रमाणों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया और कहा गया कि किसी अन्य स्रोत में ये बात कही गई हो तो हम मानेंगे.

हिन्दू पक्ष ने इस चुनौती को स्वीकार किया. डॉ. हर्ष नारायण ने मुस्लिम लेखकों द्वारा लिखे गए दस्तावेजी सबूत पेश किए. इनमें औरंगजेब की पौत्री द्वारा लिखी गयी ‘सहीफ़ा-ए-चहल नसाइह बहादुरशाही’ का सबूत था, जिसमें मथुरा, वाराणसी और अयोध्या में मंदिर तोड़ने का उल्लेख था. ‘नवाब वाजिद अली शाह और उनका अहद’ नामक किताब में मिर्जा जान नामक लेखक ने राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने और ‘कुफ्र का अंत’ करने की बात लिखी. बाबरी मस्जिद के मुअज्जन और खातिब मुहम्मद असगर द्वारा वर्ष 1858 में उल्लेख किया गया कि मस्जिद के बाहर हिन्दू सैकड़ों वर्षों से पूजा करते आए हैं, और इस जगह अपना दावा करते हैं. इसी तरह शेख मोहम्मद अजमत अली काकोरवी द्वारा रचित तारीख ए अवध में अयोध्या में राम मंदिर तोड़ने और वहां पर बाबरी मस्जिद बनाने का विवरण दिया है. इस प्रकार मुस्लिम लेखकों द्वारा रचित दस से अधिक प्रमाण प्रस्तुत किए गए तो मुस्लिम पक्षकारों ने इन पर चुप्पी साध ली और उनकी तरफ से वामपंथी इतिहासकारों इरफ़ान हबीब आदि ने कहना शुरू कर दिया कि मज़हबी जूनून में अपनी शेखी बघारने के लिए मुसलमान लड़ाके ऐसी बातें लिख दिया करते थे, इसलिए इनसे सिद्ध नहीं होता कि राम मंदिर तोड़कर बाबरी ढांचा खड़ा किया गया.

अन्य प्रामाणिक किताबों में भी कुछ लोगों ने हेर-फेर के प्रयास किए, जैसे मौलाना हकीम सैयद अब्दुल हई ने आज से लगभग सौ साल पहले एक किताब लिखी ‘हिंदुस्तान इस्लामी अहद में’. उनके बेटे मौलाना अबुल हसन अली नदवी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष और लखनऊ की एक प्रसिद्ध मुस्लिम संस्था नदवतुल उलेमा के रेक्टर रह चुके हैं. इस किताब में एक अध्याय है, ‘हिंदुस्तान की मस्जिदें’. जिसमें लिखा गया है कि अयोध्या में मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया. जब इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया गया, तब उसमें से अयोध्या का जिक्र गायब कर दिया गया.

प्रोफ़ेसर बी आर ग्रोवर ने अयोध्या के पुराने राजस्व दस्तावेज प्रस्तुत किए और सवाल उठाया कि इन दस्तावेजों में बाबरी ढांचे को ‘मस्जिद ए जन्मस्थान’ के नाम से क्यों दर्ज किया गया है? इसका कोई जवाब नहीं आया. जून 1992 में वह गड्ढा खोजा गया, जहां बाबर की फौज ने मंदिर विध्वंस के बाद मंदिर के अवशेषों को फेंका था. परन्तु इन प्रमाणों को “ इन्हें कारसेवकों द्वारा खोजा गया है, इसलिए ये अमान्य हैं,” ऐसा कह नकार दिया गया. अगस्त 1992 में अयोध्या में एक सेमीनार में भाग लेने के लिए देश के प्रमुख पुरातत्वविद एकत्रित हुए. इसमें जलमग्न द्वारिका की खोज करने वाले विश्वप्रसिद्ध डॉ. एस आर राव भी थे. इन सभी ने बाबरी ढाँचे का भी बारीकी से अवलोकन किया.

इसी दौरान दल के सदस्य डॉ. रत्नचंद्र अग्रवाल की नज़र प्रवेश द्वार पर लगे काले पत्थर के स्तंभ पर गई, तो उन्होंने पाया कि वहां पर ‘श्री’ खुदा हुआ है जो देवी लक्ष्मी का नाम है. स्वाभाविक रूप से ये स्तंभ बाबर द्वारा तोड़े गए राम मंदिर का था, जिसे ढांचे में पुनः इस्तेमाल किया गया. इसके बाद बाबरी ढाँचे की दीवारों पर और भी कई हिन्दू चिन्ह मिले. इन सभी प्रमाणों को प्रकाशित किया गया. लेकिन इन्हें भी मानने से इनकार कर दिया गया. सैयद शहाबुद्दीन जिन्होंने प्रमाण मिलने पर अपने हाथों से ढांचा तोड़ने की बात कही थी वो भी अपनी बात से मुकर गए और कहने लगे कि एक बार जहां मस्जिद बन गई और नमाज़ पढ़ ली गई तो फर्श से अर्श (आसमान) तक मस्जिद बन जाती है. उसे नहीं हटाया जा सकता. इस पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मुहम्मद खान ने उन्हें आड़े हाथों लेते हुए चुनौती दी थी कि वो अपने इस बयान को शरीयत के हिसाब से सही सिद्ध करके दिखाएं कि मस्जिद हट नहीं सकती. उन्होंने सउदी अरब में रास्ता चौड़ा करने के लिए उन तीन मस्जिदों को ढहाए जाने का उदाहरण दिया, जिनमें स्वयं पैगम्बर मुहम्मद ने नमाज़ पढ़ी थी.

सवाल उठते रहे परन्तु उत्तर नहीं आए. बाबरी ढांचे के ढहने के बाद उसमें से निकले पुरातात्विक अवशेष, अदालत की निगरानी में किए गए जन्मस्थान के रडार सर्वेक्षण से मिले मंदिर के प्रमाण और विवादित स्थल की खुदाई से निकले सबूतों से आंखें फेरकर मुकदमे को खींचा जाता रहा. सुप्रीम कोर्ट के वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की अपील सभी को याद है, जब उन्होंने न्यायालय से लोकसभा चुनाव होने तक मामले की सुनवाई रोकने का आग्रह किया था.

यह सब न होता तो इतिहास अलग होता. राम जन्मभूमि मामले में देश के अधिकाँश मुस्लिम नेतृत्व का रवैया वही रहा जैसा कि शाहबानो और तीन तलाक के मुद्दे पर रहा था. एक विदेशी हमलावर द्वारा किए गए अन्याय के परिमार्जन में बाधा डाली गई. मुक्त चर्चाओं के स्थान पर उत्तेजक बयानबाजी की गई. भारत के मुस्लिमों को बाबर से जोड़ने का प्रयास किया गया. जबकि समझदार लोग कहते रह गए कि देश के मुसलमानों का डीएनए राम से मिलता है, बाबर से नहीं. राम उनके आराध्य नहीं हैं, पर उनके पूर्वज अवश्य हैं. राम भारत के राष्ट्रीय महापुरुष हैं. इस नाते प्रत्येक भारतीय के हैं. काश ! देश के मुसलमानों को ये सब बताया गया होता…

प्रशांत बाजपई

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