अनुशासन, सादगीप्रिय और परिवार के संरक्षक श्री कृष्णप्पा जी

परिवार के संरक्षक श्री कृष्णप्पा (25 अगस्त/जन्म-दिवस)

इन दिनों सब तरफ लोग परिवार में हो रहे विघटन से चिन्तित हैं। पैसा बढ़ा है, पर लोगों के मन गरीब हो गये हैं। तेज वाहनों ने दूरियां घटायी हैं; पर पड़ोसी से सम्बन्ध टूट गये हैं। मोबाइल फोन ने सारी दुनिया को जोड़ा है; पर घरेलू सदस्यों में बात बंद हो गयी है। इसी का परिणाम है तलाक, आत्महत्या और अवसाद जैसे रोग। अनेक सामाजिक संस्थाएं इस बारे में विचार करती रहती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसकी जिम्मेदारी वरिष्ठ प्रचारक श्री कृष्णप्पा को दी। इससे ‘परिवार प्रबोधन’ जैसी अवधारणाएं विकसित हुईं।

श्री कृष्णप्पा जी

श्री कृष्णप्पा जी

मैसूर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (25 अगस्त, 1932) को एक पुरोहित परिवार में जन्म लेने के कारण इनका नाम ‘कृष्णप्पा’ रखा गया। उनसे बड़े एक भाई और भी थे। घोर गरीबी के कारण बचपन में ये एक अनाथालय में भोजन करने जाते थे। वहां इनकी मित्रता एस.एल.भैरप्पा से हुई, जोवन भर बनी रही। वे भी वहीं खाना खाते थे। ‘साहित्य अकादमी सम्मान’ प्राप्त श्री भैरप्पा आगे चलकर कन्नड़ के श्रेष्ठ साहित्यकार बने। उनके जीवन में देश, धर्म और समाज के प्रति प्रेम के संस्कार श्री कृष्णप्पा के कारण ही प्रविष्ट हुए।

यद्यपि एक समय श्री कृष्णप्पा शाखा पर पत्थर फेंकते थे; पर 13 वर्ष की अवस्था में वे स्वयंसेवक बने और 1954 में संस्कृत में बी.ए. उत्तीर्ण कर प्रचारक बन गये। उन पर सर्वश्री यादवराव जोशी, हो.वे.शेषाद्रि तथा सूर्यनारायण राव का विशेष प्रभाव रहा। बंगलोर, तुम्कुर, शिमोगा, मंगलूर आदि में जिला और विभाग प्रचारक रहने के बाद वे 1978 में कर्नाटक प्रांत बौद्धिक प्रमुख और फिर 1980 में कर्नाटक प्रांत प्रचारक बने। प्रवास में वे कार्यकर्ताओं के घर पर ही रुकते थे। 1975 में आपातकाल और संघ पर प्रतिबंध के समय वे मंगलौर में विभाग प्रचारक थे। संघ के निर्देश के अनुसार भूमिगत रहकर काम करते हुए एक दिन वे पुलिस की निगाह में आ गये। उन्हें पकड़कर ‘मीसा’ में बंद कर दिया गया। अतः वे आपातकाल की समाप्ति के बाद ही जेल से छूट सके।

1989 में उन्हें क्षेत्र प्रचारक की जिम्मेदारी दी गयी। उनके क्षेत्र में केरल, कर्नाटक तथा तमिलनाडु प्रांत थे। इसके बाद वे दक्षिण क्षेत्र के प्रचारक प्रमुख भी रहे; पर इसी दौरान वे प्रोस्टेट कैंसर के शिकार हो गये। अंग्रेजी चिकित्सकों ने कहा कि वे अधिकतम तीन वर्ष तक जीवित रह सकेंगे; पर कृष्णप्पा जी को आयुर्वेद, होम्योपैथी, पिरामिड, योग व प्राकृतिक चिकित्सा पर पूरा विश्वास था प्रतिदिन दूर्वा के रस का सेवन कर उन्होंने स्वयं को ठीक किया और अगले 28 वर्ष तक सक्रिय रहे।

वे बहुत समय से वर्ष में एक बार श्रीरंगपट्टनम में अपने भाई के घर आसपास के नवयुगलों को बुलाते थे। कावेरी में स्नान और पूजा के बाद सहभोज होता था। इससे ही ‘परिवार प्रबोधन’ का विचार विकसित हुआ। 2014 में संघ की ओर से यह काम मिलने पर वे कार्यकर्ताओं के पूरे परिवार के साथ बैठने लगे। परिवार में सुख, शांति, संस्कार और समन्वय बना रहे, इसे ध्यान में रखते हुए उन्होंने एक पुस्तक ‘मंगल भवन अमंगल हारी’ भी लिखी।

वे अध्यात्म और विज्ञान, दोनों में समन्वय बनाकर चलते थे। उनकी रुचि संस्कृत भारती, हिन्दू सेवा प्रतिष्ठान तथा वेद विज्ञान गुरुकुल में भी थी। गुरुकुल में आयुर्वेद, योग, वेद, गोसेवा, जैविक खेती आदि का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है। 10 से 16 वर्ष के छात्र और छात्राओं के लिए अलग-अलग तीन निःशुल्क गुरुकुल कर्नाटक में हैं। इनमें कोई लिखित पाठ्यक्रम नहीं है; पर वार्ता, अभ्यास और अनुभव के आधार पर प्रशिक्षण आगे बढ़ता रहता है।

अनुशासन और सादगीप्रिय श्री कृष्णप्पा का दस अगस्त, 2015 को बंगलौर संघ कार्यालय पर निधन हुआ। प्रबल इच्छशक्ति से कैंसर को हराने वाले इस महान योद्धा को संघ के सह सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होस्बले ने ‘मृत्युमित्र’ कहा है।

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