कभी पीछे न देखने वाले संन्यासी योद्धा स्वामी रंगनाथानंद

विवेकानंद केन्द्र और स्वामी रंगनाथानंद – 15 दिसम्बर/ जन्म-दिवस

स्वामी रंगनाथानंद

स्वामी रंगनाथानंद

स्वामी रंगनाथानन्द का जन्म केरल के त्रिकूर ग्राम में 15 दिसम्बर, 1908 को हुआ था। उनका नाम शंकरम् रखा गया। आगे चलकर उन्होंने न केवल भारत अपितु विश्व के अनेक देशों में भ्रमण कर हिन्दू चेतना एवं वेदान्त के प्रति सार्थक दृष्टिकोण निर्माण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। इससे उन्होंने अपने बचपन के शंकरम् नाम को सार्थक कर दिया।

1926 में वे मैसूर के रामकृष्ण मिशन से जुड़े। इसके बाद तो मिशन की गतिविधियों को ही उन्होंने अपने जीवन का एकमात्र कार्य बना लिया। रामकृष्ण परमहंस के प्रिय शिष्य, विवेकानन्द के गुरुभाई तथा मिशन के द्वितीय अध्यक्ष स्वामी शिवानन्द ने उन्हें 1933 मे संन्यास की दीक्षा दी। उन्होंने प्रारम्भ में मैसूर और फिर बंगलौर में सफलतापूर्वक सेवाकार्य किये। इससे रामकृष्ण मिशन के काम में लगे संन्यासियों के मन में उनके प्रति प्रेम, आदर एवं श्रद्धा का भाव क्रमशः बढ़ने लगा।

1939 से 42 तक वे रामकृष्ण मिशन, रंगून (बर्मा) के अध्यक्ष और पुस्तकालय प्रमुख रहे। इसके बाद 1948 तक वे कराची में अध्यक्ष के नाते कार्यरत रहे। भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपने जीवन पर उनके उपदेशों के प्रभाव को स्पष्टतः स्वीकार किया है। देश विभाजन के बाद 1962 तक उन्होंने दिल्ली और फिर 1967 तक कोलकाता में रामकृष्ण मिशन की गतिविधियों का स॰चालन किया। इसके बाद वे हैदराबाद भेज दिये गये।

1989 में उन्हें रामकृष्ण मिशन का उपाध्यक्ष तथा 1998 में अध्यक्ष चुना गया। भारत के सांस्कृतिक दूत के नाते वे विश्व के अनेक देशों में गये। सब स्थानों पर उन्होंने अपनी विद्वत्ता तथा भाषण शैली से वेदान्त का प्रचार किया। उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं। उनके भाषणों के कैसेट भी बहुत लोकप्रिय थे।

कन्याकुमारी में विवेकानन्द शिला स्मारक के निर्माण के समय वे प्रारम्भ से ही उसकी गतिविधियों से जुड़े रहे। शिला स्मारक के संस्थापक श्री एकनाथ रानडे से उनकी बहुत घनिष्ठता थी। 15 सितम्बर, 1970 को प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी विवेकानन्द शिला स्मारक समिति द्वारा आयोजित एक समारोह में आयीं। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वामी रंगनाथानन्द ने ही की। अपने अध्यक्षीय भाषण में स्वामी जी ने कन्याकुमारी और विवेकानन्द शिला स्मारक को भारत के नये प्रतीक की संज्ञा दी।

जब विवेकानन्द केन्द्र ने अपने कार्य के द्वितीय चरण में पूर्वोत्तर भारत में शैक्षिक एवं सेवा की गतिविधियाँ प्रारम्भ कीं, तो स्वामी रंगनाथानन्द ने सुदीर्घ अनुभव से प्राप्त अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिये। उन्होंने विवेकानन्द केन्द्र को समय की माँग बताया। एकनाथ जी एवं विवेकानन्द केन्द्र के साथ जुड़े समर्पित युवक एवं युवतियों को देखकर उन्हें बहुत प्रसन्नता होती थी।

स्वामी रंगनाथानन्द जी सदा आशावादी दृष्टिकोण अपनाते थे। एक निराश कार्यकर्त्ता को लिखे पत्र में उन्होंने कहा – यह एक दिन का कार्य नहीं है। पथ कण्टकाकीर्ण है; पर पार्थसारथी हमारे भी सारथी बनने को तैयार हैं। उनके नाम पर और उनमें नित्य विश्वास रखकर हम भारत पर सदियों से पड़े दीनता के पर्वतों को भस्म कर देंगे। सैकड़ों लोग संघर्ष के इस पथ पर गिरेंगे और सैकड़ों नये आरूढ़ होंगे। बढ़े चलो, पीछे मुड़कर मत देखो कि कौन गिर गया। ईश्वर ही हमारा सेनाध्यक्ष है। हम निश्चित ही सफल होंगे।

अपने शब्दों के अनुरूप कभी पीछे न देखने वाले इस संन्यासी योद्धा का देहान्त 26 अपै्रल, 2005 को हृदयाघात से हो गया।

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