सामाजिक विद्वेष से व्यथित युवक ने समरसता के लिए किया आत्मोत्सर्ग का प्रयास

जयपुर 9,अप्रेल 18 (विसंके)। देश में 2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान शहर में अचानक हुई हिंसा और अराजकता से व्यथित युवा दवा व्यापारी ने रविवार को वैशाली नगर के आम्रपाली सर्किल पर पेट्रोल छिड़कर आत्मदाह का प्रयास किया। उन्हेंं इलाज के लिए जयपुर से दिल्ली रेफर किया गया है। स्वयंसेवक होने के साथ समाज के प्रति गहरी संवेदना रखने के कारण समाज और राष्ट्र को इस प्रकार टूटता देख वह सहन नहीं कर पाए।

इससे पहले भारत माता के नाम तीन पन्नों का एक पत्र युवा स्वयंसेवक रघुवीर शरण ने लिखा है, पत्र से प्रकट होता है कि वे 2 अप्रैल को भारत बंद और 10 अप्रैल को भारत बंद की अफ्वाह जैसी देश को तोडने वाली घटनाओं से व्यथित थे।

raj-33979444623201-largeरघुवीर शरण जी के लिखे पत्र के कुछ अंश –

मां मां मां अचानक सपने से उठा तो मैं पसीने से तर था। उस सपने में मैंने अपनी भारत माता की वह करुण चीत्कार सुनी और देखा कि उसके चारों तरफ गिद्ध मंडरा रहे हैं। उसके आंचल में पड़े हुए उसी के पुत्रों का मांस नोचने की चेष्टा करते हुए बार-बार मेरी माता को लहूलुहान कर रहे हैं और मेरी भारत माता अपने अतीत को स्मरण करते हुए चीत्कार कर रही हैं।

वह पुकार-पुकार कर चीख-चीख कर कह रही हैं, हे मेरे पुत्रों समझो अपने विवेक से समझो अपने वह दिन याद करो जब तुम मेरे वैभवशाली आंचल मैं हष्ट पुष्ट बलशाली ज्ञान-विज्ञान संपन्न खेला करते थे। आज तुम्हारे अंदर आई स्वार्थ लोलुपता भेदभाव अपने ही बंधुओं से दूरी ने इन आताताइयों और विघटनकारी शक्तियों को निमंत्रण दिया हैं। अब तो इन सुखों की तुमको इतनी आदत पड़ गई है कि अपने स्वजनों का कष्ट भी तुम्हें दिखाई नहीं देता।

हां मां हां हम तेरे पुत्रों ने ही तेरी यह दशा की हैं, तू सत्य ही कहती हैं मां इसके दोषी हम ही हैं। आज तू जो हमारी मातृभूमि जिसका गुणगान संपूर्ण विश्व करता था। इस स्थिति में पहुंचाने का यह घृणित कार्य हमने ही तो किया है।

मां हमने ही तो अपने स्वजनों को कष्ट पहुंचाया हैं। उनकी महानता देखो मां हजारों वर्षों से भी कष्ट और प्रताड़ना सहन करने के बाद भी वे सदैव तेरे आंचल की रक्षा में आगे खड़े हैं। मां तेरा दुखी होना सत्य है, अब हमें विचार करना होगा। हमें अपनी भूलों का परिमार्जन करना ही होगा। अब और नहीं अब बिल्कुल नहीं। हम अपनी भूलों को ठीक करेंगे। अपने बंधुओं के प्रति हमारी जो जिम्मेदारी हैं, उसे पूर्ण करने के लिए तन-मन-धन से लगेंगे। इस ओर सकारात्मक प्रयास चारों तरफ से हो भी रहे हैं। अनेक महापुरुषों ने महान संतो ने मां आपके इन पुत्रों को सफल सामर्थ्यशाली बनाने के लिए अपना संपूर्ण जीवन अर्पित किया ही है। सकारात्मक कार्य में समय जरूर लगता है लेकिन वह उतना ही मजबूत भी होता है। लेकिन यह मेरे अपने बंधु जो कि बुद्धिजीवी हैं उनकी नाराजगी उचित हैं, वह युवा हैं, उनमें उत्साह और उनका मन भी ठीक है लेकिन मैं उनसे प्रार्थना करना चाहता हूं कि बंधुओं आपके समर्थ सहयोग के बिना हम अपनी इस भारत माता का सुंदर चित्र नहीं बना पाएंगे। आप सोचें और अपनी मदद करें तो पाएंगे कि जब हम दूसरों के बहकावे में आ जाते हैं तो चाहे कोई भी हो उसका स्वयं का विवेक शून्य हो जाता है और तब तक इतना भयंकर नुकसान हो जाता है कि वह एक एक तिनका जोड़कर बनाया हुआ घोंसला पल भर में छिन्न-भिन्न हो जाता है। मां अपने बंधुओं से मैं प्रार्थना करता हूं कि हमारे द्वारा अब कोई भी ऐसा काम ना हो जिसके कारण हमारे स्वजनों के मन को चोट पहुंचे। चाहे वह कोई भी माध्यम हो हमें अंधेरे में रखते हुए विशेष सावधानी से उन तत्वों का ध्यान रखना होगा, जो की दुष्टता पूर्वक संचार माध्यमों से आपस में कटुता बढ़ा रहे हैं। यह अपना नाम बदलकर हमसे विभेद कराना चाहते हैं। भाई से भाई को लड़वाकर अपने स्वार्थ सिद्धि करना चाहते हैं। मां इस भेद ने पहले भी तेर बहुत टुकड़े करवाएं हैं। आज भी जहां तेरे को मां कहने वाला यह समाज कम है वहीं से तेरे शरीर के टुकड़े करने की आवाज आ रही है। तुझे अपनी मां मानने वालों को वहां से प्रताड़ित कर भगाया जा रहा है। मां तेरी यह करुण पुकार अब तेरे पुत्रों के कानों में पहुंच रही हैं। वे जाग रहे हैं। अब इन षड्यंत्रों को पहचान रहे हैं क्योंकि जब जब भारत मां सबल और स्थिर होने लगती हैं। तब इसके चारों और मंडराने वाली मंडली भूखों मरने लगती हैं और नए-नए षड्यंत्र रचने लगती हैं। हमारे अंदर ही उपस्थित भेदिए उसको निमंत्रण देते हैं लेकिन मां तू अब चिंता मत कर तेरे पुत्र अब जाग गए हैं। वह अब कंधे से कंधा मिलाकर अपने मतभेद भूलकर और पूर्व में की गई भूलों को सुधार कर तेरी प्राण-प्रण से रक्षा करेंगे।

मां हम चाहें और कष्ट सह लेंगे लेकिन अब तेरे आंचल को इन गिदों को नोचने नहीं देंगे। हमें ध्यान और है कि दो भाइयों की लड़ाई में तीसरा फायदा उठा जाता है। मां तूने इतने कष्टों के बाद भी हमें आशीर्वाद ही दिया। मां तू वास्तव में कितनी ममतामई हैं। मां हम भोग भूमि कैसे बनने देंगे नहीं.. नहीं.. नहीं कभी नहीं।

तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहे ना रहे……….

वंदे मातरम।

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