हमारी सोच व्यक्तिगत न होकर समाज हित में होनी चाहिए – हितेश शंकर जी

हिमालय हुंकार के विशेषांक का लोकार्पण

 व्यक्ति के जीवन को समाज से अलग नहीं देखा जा सकता. एकात्म मानववाद का विचार हमें यही सिखाता है. संस्कार, शरीर, मन, बुद्धि व आत्मा को केन्द्र में रखकर ही हमें समाज हित में कार्य करने चाहिएं, तभी देश के प्रति हमारा उत्तरदायित्व पूर्ण हो सकता है. विश्व संवाद केन्द्र द्वारा प्रकाशित ‘हिमालय हुंकार’ पाक्षिक पत्रिका के ‘मेरा भारत और मैं’ विशेषांक के लोकार्पण समारोह में पाञ्चजन्य साप्ताहिक के सम्पादक हितेश शंकर जी ने संबोधित किया. राजपुर रोड स्थित साईं इन्स्टीट्यूट में समारोह आयोजित किया गया था.

उन्होंने कहा कि हमारी सोच व्यक्तिगत न होकर समाज हित में होनी चाहिए. यदि व्यक्ति की सोच समाज हित में होगी तो वह मर्यादित और समाज कल्याण की होगी. उन्होंने मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान राम ने सर्वसमाज को संगठित कर समाज हित में मर्यादित होकर कार्य किये. इसीलिए उन्हें मर्यादा पुरूषोत्तम कहा गया. भारत सभ्यता, संस्कृति, संस्कार व मर्यादाओं का देश है. यहां व्यक्तिगत लाभ को महत्व न देकर समाज हित व सामूहिक हितों को ध्यान में रखकर हर व्यक्ति कार्य करता है, जबकि पश्चिमी सभ्यता इसके ठीक विपरीत है. वहां संस्कार, मर्यादा व परहित से अधिक स्वहित पर ही ध्यान दिया जाता है. ज्यादा से ज्यादा धन अर्जित करना उनका मुख्य उद्देश्य है. उनकी मनोवृत्ति भौतिकवाद, पूंजीवाद और स्वकेन्द्रित रही है. जोकि समाज में टकराहट का बड़ा कारण है. समाज की इस विकृति को यदि हम दूर करना चाहते हैं तो रोटी, कपड़ा और मकान, शिक्षा, संस्कार और सम्मान इन छह बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है. तभी यह समाज और इस समाज में रहने वाले लोग मर्यादित व संस्कारित आचरण कर पाएंगे.

लोकार्पण समारोह की मुख्य अतिथि अर्जुन परस्कार विजेता एवं प्रख्यात पर्वतारोही डॉ. हर्षवन्ती बिष्ट जी ने कहा कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ‘मेरा भारत और मैं’ विषय बहुत ही उपयुक्त है और निश्चित रूप से यह विषय स्वयं में चिन्तन का विषय है. राष्ट्र के प्रति हमारा कुछ उत्तरदायित्व होता है, उसके प्रति यदि हम निःस्वार्थ व निष्काम भाव से कार्य करते हैं तो वही हमारा धर्म भी है. हमारे संस्कार, संस्कृति, पाश्चात्य संस्कृति से भिन्न होने के कारण ही हमें उनसे पृथक रखते हैं. हम दूसरों के हित में सोचते हैं. समाज उत्थान की बात करते हैं. प्रकृति को प्रेम करते हैं. समाज से हम जो गृहण करते हैं, उसके बदले में समाज को देने की प्रवृत्ति हमारे धर्म व संस्कारों में है. इसलिए यदि हम धर्म की बात करें तो जो धारण करने योग्य है वही धर्म है. हमारे यहां ‘जीयो और जीने दो’ व ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा रही है जो समाज को एकसूत्र में बांधती है.

कार्यक्रम के अध्यक्ष साईं ग्रुप ऑफ इन्स्टीट्यूट के अध्यक्ष हरीश अरोड़ा जी ने कहा कि इस प्रकार का आयोजन उनके परिसर में होना सौभाग्य की बात है. उपस्थित जनों का आभार व्यक्त करते हुए विश्व संवाद केन्द्र के अध्यक्ष सुरेन्द्र मित्तल जी ने कहा कि आज का आयोजन हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण और गरिमामय रहा है.

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