हिंदुत्व चिंतन ही विश्वशांति का आधार – नंदलाल जी

उदयपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राजस्थान क्षेत्रीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं वरिष्ठ प्रचारक नंदलाल जी ने कहा कि विश्व को यदि शांति चाहिए तो यह हिन्दुत्व की पावन परंपरा से ही संभव है. यही हिन्दुत्व भारत की आत्मा है, जो विश्व के कल्याण का विचार करता है, आज उसी को साम्प्रदायिक, संकीर्ण और असहिष्णु कहा जा रहा है. नंदलाल जी 8 दिसम्बर  को रावतभाटा रोड स्थित मानव विकास भवन में  ‘‘वर्तमान वैचारिक परिदृश्य में राष्ट्र हित’’ विषय क  प्रबुद्धजन संगोष्ठी में  बोल रहे थे.

नंदलाल जी ने कहा कि विश्व के कल्याण का उदात्त चिंतन भारत से ही निकला है. जब देश गुलाम हुआ तो राष्ट्रीय दृष्टिकोण समाप्त हो गया. तथाकथित विद्वानों ने भारत की सनातन धारा को विस्मृत करना शुरू कर दिया. वे लोग ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ और ‘‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’’ जैसे विचारों को भी बकवास कहने लगे. दूसरी ओर, वर्तमान में पूरे विश्व में भारतीय जीवन पद्धति को स्वीकार किया जा रहा है, जो लोग कल तक मोमबत्तियां जलाते थे, वे ही आज दीपावली के रूप में दीये जला रहे हैं. भारत की सहिष्णुता के कारण ही केरल में देश की प्रथम मस्जिद एक हिन्दु राजा द्वारा बनवाई गई तथा ईरान से मारकर और पीटकर भगाए गए पारसी समुदाय का भारतीयों ने हृदय से स्वागत किया. वे आज हिन्दुओं के साथ घुल मिल गए हैं.

उन्होंने कहा कि दुनिया के अनेकानेक विश्वविद्यालयों में गीता को विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है. पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने गीता का अध्ययन करते हुए इसे भारत का राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने का पक्ष लिया. उन्होंने कहा था कि गीता में भारत का तत्वज्ञान मौजूद है. हमारे देश में किसी विवि में पढ़ाने या फिर राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने का प्रस्ताव भी कोई दे तो वह साम्प्रदायिक हो जाता है. हिन्दुत्व का चिंतन ही विश्व में शांति का आधार बन सकता है. विश्व की वैचारिक पृष्ठभूमि में भी हिन्दुत्व की धारा से ही शांति संभव है. वैचारिक परिदृश्य में यही लगता है कि भारत को अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा.

संगोष्ठी के अध्यक्ष कोटा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. परमेन्द्र कुमार दशोरा ने कहा कि विश्व भर में आतंक फैल रहा है. मानवता को आश्रय केवल भारतीय चिंतन से ही मिल सकता है. हमें कमजोर करने वाली ताकतों का एकजुट होकर मुकाबला करना होगा. आज विशेष विचार से प्रभावित लोग अपने स्वार्थ के लिए असहिष्णुता की बात करते हैं. यह पूरी तरह से नियोजित कार्यक्रम है. हम ऐसी शक्तियों को अपनी सनातन परंपरा से परास्त करेंगे और भारत की मनीषा को जागृत करेंगे. मुख्य अतिथि जितेन्द्र निर्मोही ने कहा कि आज वैचारिक स्तर इतना निम्न हो गया है कि हमारी सनातन परंपरा को हिन्दु पद्धति कहने में लोग संकीर्णता महसूस करने लगे हैं. मार्क्सवादी चिंतन से प्रभावित लोगों द्वारा मार्क्सवादी लोगों को पुरस्कार दिए जाते रहे हैं, आज वे लौटाने का नाटक भी उन्हीं लोगों के कहने पर कर रहे हैं.

प्रबुद्धजन संगोष्ठी में मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार जितेन्द्र निर्मोही तथा समिति विभाग संयोजक त्रिलोकचन्द्र जैन भी उपस्थित थे.

 संगोष्ठी

 

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