इतिहास का विस्मरण कर कोई भी देश आगे नहीं बढ़ सकता – डॉ. संबित पात्रा

जयपुर (विसंकें). डॉ. संबित पात्रा ने कहा कि इतिहास का विस्मरण हो जाए तो आत्मविश्वास नहीं आता है और आत्मविश्वास खोने वाला देश कभी भी आगे नहीं जा सकता है. अपने गौरवशाली इतिहास को भूल जाना भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है. डॉ. पात्रा विश्व संवाद केंद्र और डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित देवर्षि नारद पत्रकारिता पुरस्कार समारोह, पुणे में संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि यह देश के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि देश ने राजनीतिक नेताओं को अपने सिर पर बिठा रखा है. संपन्नता के लिए संवाद आवश्यक है और  इसके लिए विश्व संवाद केंद्र का कामकाज बहुत महत्वपूर्ण है. पश्चिमी लोगों ने हमारे मन में यह बिठाया है कि आपके देश में कोई बड़ा व्यक्ति हो ही नहीं सकता. अंग्रेजों ने जानबूझ कर यहां का ज्ञान नष्ट किया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसे पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है. आत्मविश्वास खोया हुआ देश कभी आगे नहीं बढ़ सकता है. भारत से भारतीयता निकाल लें तो भारत भारत नहीं रहेगा. इसलिए हर वर्ग को भारतीय परंपराओं में अपने आदर्श खोजने चाहिएं. स्वास्थ्य क्षेत्र को चरक और धन्वंतरी को आदर्श मानना चाहिए, नौकरशाही को विश्वकर्मा को आदर्श मानना चाहिए और पत्रकारों के आदर्श नारद होने चाहिए. देश और राष्ट्र दो अलग चीजें हैं और हमें राष्ट्र पर ध्यान देना चाहिए.

पत्रकार के रूप में देवर्षि नारद की भूमिका का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा – सत्ता के पास रहते हुए भी सरकार से कुछ नहीं मांगना, यह नारद से सीखना चाहिए. साथ ही आने वाली पीढ़ियों के लिए देश के इतिहास को संरक्षित करना भी पत्रकारों की जिम्मेदारी है. देव और असुर सहित संपूर्ण मानव जाति के हित के लिए नारद ने काम किया. युवाओं को उनका आदर्श लेना चाहिए.

वरिष्ठ पत्रकार पुरस्कार आज का आनंद के समूह संपादक श्याम अग्रवाल, युवा नवोदित पत्रकार पुरस्कार दैनिक दिव्य मराठी के सिद्धाराम पाटिल, सोशल मीडिया पुरस्कार के लिए बारामती के शिवाजी गावडे और हिंदुस्तान टाइम्स मराठी विश्वनाथ गरुड़ को सम्मानित किया गया.

विश्व संवाद केंद्र के अध्यक्ष मनोहर कुलकर्णी और डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी के उपाध्यक्ष महेश आठवले, कार्यवाह श्रीकृष्ण कानेटकर और पुरस्कृत पत्रकार मंच पर उपस्थित थे.

श्याम अग्रवाल ने कहा कि यह केवल एक संयोग था कि मैंने पत्रकारिता में प्रवेश किया. समाचार पत्र चलाने के लिए केवल पैसा नहीं, बल्कि पागलपन चाहिए. आज के समय में समाचार संपादक और पत्रकारों का दायित्व काफी बढ़ गया है.

मनोहर कुलकर्णी ने कहा कि ऐसा नहीं कि देवर्षि नारद को केवल विश्व संवाद केंद्र ने पहला पत्रकार माना है. नारद विश्व के पहले संदेशवाहक हैं. सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय, यह उनका बीज वाक्य था. नारद का व्यक्तित्व बहुआयामी है, लेकिन हम पर्याप्त अध्ययन नहीं करते हैं.

महेश आठवले ने कहा वाक्य की व्याख्या करने के कई नियम हैं और पत्रकारों को उन्हें समझना चाहिए. छात्रों को अच्छे संस्कार मिलें, भाषा का अर्थ पता हो, इसके लिए डीईएस प्रयास कर रही है.

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