भारत यूरोप का ‘दादागुरू’—श्री दुर्गादास जी

—निवाई में बजरंग दल का शौर्य प्रशिक्षण शिविर
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टोंक, 13 जून। हमारा अतीत गौरवशा ली रहा है। जब यूरोपीय लोग जंगली अवस्था में घूमा करते थे तब भारत में व्यवस्थित खेती ​की जा रही थी। तकनीक, शस्त्र विद्या, शास्त्र विद्या, ज्ञान, विज्ञान, स्थापत्य कला, वस्त्र कला आदि क्षेत्रों में भारत विश्व में अग्रणी था लेकिन अंग्रेजी इतिहासकारों ने हमारे गौरवशाली अतीत के इतिहास को तोड.मरोड. कर प्रस्तुत किया। भारतीयों को वह पढाया गया जिससे हमारा न केवल आत्म विश्वास कमजोर हो बल्कि आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंचे। यह कहना है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, राजस्थान क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक श्री दुर्गादास जी का। श्री दुर्गादास जी सोमवार को निवाई के सरस्वती विद्या मंदिर में चल रहे बजरंग दल के सप्त दिवसीय शौर्य प्रशिक्षण शिविर में शिक्षार्थी को संबोधित करते हुए बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि हजारों उदाहरण ऐसे है जो भारतीयों की श्रेष्ठता को दर्शाते है जैसे भास्कराचार्य ने तब ही अपने ग्रंथ लीलावती में गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत का उल्लेख कर दिया था। महाभारत काल में तीरों से छलनी भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी। यह भारतीय खगोल शास्त्र की प्रमाणिकता का परिचायक ही है। यूरोपीय लोग गणित के अंकों को अरेषिक कहते हैं और अरब के लोग इन्हें हिन्दसा कहते हैं अत: भारत गणित की दृष्टि से भी यूरोप का दादागुरू हुआ। नौकाशास्त्र की दृष्टि से भारत विश्व में आगे रहा है। वास्को—डी—गामा चंदन नामक भारतीय व्यापारी का अनुशरण करते हुए अफ्रीका से भारत पहुंचा था। श्री दुर्गादास जी ने हिन्दू युवकों से आत्मसम्मान से जीने के लिए गौरवशाली अतीत पर गर्व करने और इतिहास का विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता पर बल भी दिया।
फोटो—विसंकेजयपुरfinal_bstSnapshot_277131

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